यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 02, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Savitribai Phule Jayanti 2024: 3 जनवरी को मनाई जाती है सावित्रीबाई फुले जयंती, यहां से पढ़ें उनके बारे में रोचक तथ्य
देशभर में प्रतिवर्ष 3 जनवरी के दिन सावित्रीबाई फुले जयंती को मनाया जाता है। सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के ...और पढ़ें

HighLights
- 3 जनवरी को प्रतिवर्ष मनाई जाती है सावित्रीबाई फुले जयंती।
- सावित्रीबाई फुले जयंती का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था।
- सावित्रीबाई को देश की पहली महिला शिक्षिका माना जाता है।
एजुकेशन डेस्क, नई दिल्ली। देशभर में प्रतिवर्ष 3 जनवरी के दिन को सावित्रीबाई फुले जयंती के रूप में मनाया जाता है। सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक गांव में हुआ था। उन्हीं को सम्मान देने के लिए प्रतिवर्ष इस दिन को सेलिब्रेट किया जाता है। सावित्रीबाई फुले को समाज सेविका, नारी मुक्ति आंदोलन में हिस्सा लेने वाली और देश की पहली अध्यापिका के रूप में जाना जाता है। सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं के लिए भी लम्बी लड़ाई लड़ी और उनकी स्थिति में सुधार के लिए बहुत योगदान दिया।
कठिनाइयों को पार कर बनीं देश की पहली शिक्षिका
सावित्रीबाई फुले का जन्म एक दलित परिवार में हुआ था। पहले के समय में दलितों को शिक्षा आदि से वंचित रखा जाता था लेकिन सावित्रीबाई फुले ने इन सब कुरीतियों से लड़कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। उनके समाज में छुआ-छूत का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने इन सबसे हार न मानकर अपनी शिक्षा जारी रखी। इसके बाद उन्होंने अहमदनगर और पुणे में अध्यापक बनने की ट्रेनिंग पूरी की और बाद में अध्यापिका बनीं।

पति के मिलकर शुरू किया पहला महिला स्कूल
सावित्रीबाई फुले जब 9 वर्ष की थीं तब उनका विवाह कर दिया गया। उनका विवाह ज्योतिबा फुले के साथ हुए, विवाह के समय उनकी आयु 13 वर्ष थी। अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर 1848 में पहला महिला स्कूल खोला। इसके बाद उन्होंने देशभर में कई अन्य महिला विद्यालयों को खोलने में मदद की। उनके इस कार्य के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें सम्मानित किया था।
कई आंदोलनों में लिया भाग
सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर कई आंदोलनों में भाग लिया जिसमें से एक सती प्रथा भी था। उन्होंने विधवा होने पर महिलाओं का मुंडन किया जाता था जिसके खिलाफ उन्होंने मुखर होकर नाइयों के खिलाफ आंदोलन किया था।
