नई दिल्ली,  जागरण संवाददाता। गंभीर बीमारी से पीड़ित छात्र को निर्धारित 75 फीसद से कम उपस्थिति होने के कारण परीक्षा देने से रोकने पर हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने कहा कि अगर गंभीर बीमारी से पीड़ित छात्र का बेहतर परिणाम रहा हो तो कम उपस्थिति होने पर भी उसे एक बार इससे छूट मिलनी चाहिए और परीक्षा में बैठने देने चाहिए।

पीठ ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय व परीक्षा समिति को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। साथ ही पीठ ने कहा कि इस तरह की स्थिति में विवि को अपनी परीक्षा नीति में बदलाव करना चाहिए। हालांकि, पीठ ने छात्र को यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि वह दो सदस्यीय पीठ के फैसले से बंधे हैं और वे इससे बाहर नहीं जा सकते। पीठ ने कहा कि किसी छात्र का पिछला रिकॉर्ड बेहतर है तो विषम परिस्थिति में उसे उपस्थिति से छूट दिए जाने पर विचार किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि यह जरूरी है कि व्यवसायिक शिक्षा के लिए 75 फीसदी उपस्थिति होनी चाहिए और यह नीति तब बनाई गई थी जब पढ़ाई के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध नहीं थी। लेकिन अब छात्र वीडियो कान्फ्रेंसिंग, यूट्यूब व अन्य तरीकों से भी पढ़ सकते हैं।

पीठ ने कहा कि विज्ञान व तकनीक ने तरक्की कर ली है और अब सभी काम के लिए स्वयं के मौजूद रहने की जरूरत नहीं है। पीठ ने कहा कि सभी मामलों में एक ही मानदंड लागू नहीं होता है। तीन वर्षीय एलएलबी छात्र की याचिका पर पीठ ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई से मेधावी छात्र हतोत्साहित होते हैं और इसे ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय व परीक्षा समिति को परीक्षा नीति पर विचार करना चाहिए। विश्वविद्यालय ने छात्र की शैक्षिक सत्र 2019-20 में कम उपस्थिति होने की वजह से उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया था। पीठ ने रिकॉर्ड पर लिया कि छात्र गंभीर बीमारी पीड़ित था और इसके कारण वह क्लास अटेंड करने में सक्षम नहीं था।

Posted By: Neel Rajput

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