आगरा, निर्लाेष कुमार। शक्तिशाली मुगल साम्राज्य को चुनौती देकर हिंदू स्वराज्य की स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज 356 वर्ष पूर्व आज ही के दिन औरंगजेब के सुरक्षा घेरे को तोड़कर कैद से बचकर निकलने में सफल रहे थे। फलों व मिठाइयों की टोकरी में बैठकर उन्होंने औरंगजेब को चकमा दिया था। यहां शिवाजी का 101 दिन का प्रवास रहा था, जिसमें से 99 दिन उन्होंने मुगलों की कैद में बिताए थे। औरंगजेब की कैद में ही उन्होंने हिंदू स्वराज्य की स्थापना का संकल्प लिया था और उसे साकार कर दिखाया था।

चली ये चाल, दुश्मन भी रह गया ताकता

छत्रपति शिवाजी की आगरा यात्रा का विस्तृत वर्णन इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक "औरंगजेब' में किया है। शिवाजी, राजा जयसिंह से पुरंदर की संधि के बाद अपने दल के साथ 11 मई, 1666 को आगरा आए थे। शहर की सीमा पर स्थित सराय मुलकचंद पर उन्होंने डेरा डाला था। इसके अगले दिन वह औरंगजेब के आगरा किला स्थित दीवान-ए-खास में सजे दरबार में गए थे। उचित सम्मान नहीं मिलने पर उन्होंने नाराजगी जताते हुए दरबार छोड़ दिया था।

12 मई को औरंगजेब ने शिवाजी को राजा जयसिंह के बेटे रामसिंह की छावनी के समीप सिद्दी फाैलाद खां की निगरानी में नजरबंद रखने का आदेश किया। 16 मई को उन्हें रदंदाज खां के मकान पर ले जाने का अादेश हुआ। इसके बाद शिवाजी ने बीमारी का बहाना बनाकर गरीबों को फल बांटने शुरू कर दिए। 18 अगस्त को उन्हें रामसिंह की छावनी के निकट फिदाई हुसैन की हवेली में रखे जाने का आदेश औरंगजेब ने किया। शिवाजी अपने पुत्र संभाजी के साथ 19 अगस्त को फलों व मिठाइयों की टोकरी में बैठकर निकल गए। उनकी जगह पर पलंग पर हीरोजी फरजंद लेटे रहे। शिवाजी के बचकर निकलने की जानकारी औरंगजेब को 20 अगस्त को हुई थी।

इतिहास की तिथियों में है अंतर

शिवाजी 11 मई से 19 अगस्त तक आगरा में 101 दिन रहे थे। कुछ इतिहासकारों ने शिवाजी के औरंगजेब की कैद से बचकर निकलने की तिथि 13 व 16 अगस्त लिखी हैं। इतिहासकार राजकिशोर राजे बताते हैं कि पुरानी व नई तिथियों की गणना में कुछ दिनों का अंतर होता है। यही वजह है कि इतिहासकारों ने अलग-अलग तिथियां लिखी हैं।

म्यूजियम का नाम ही बदला, काम नहीं हुआ

शिल्पग्राम के नजदीक निर्माणाधीन म्यूजियम का काम जनवरी, 2020 से ठप है। सितंबर, 2020 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुगल म्यूजियम का नामकरण छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद म्यूजियम का नाम बदल दिया गया, लेकिन बजट नहीं मिलने की वजह से काम आगे नहीं बढ़ा। इस पर 99 करोड़ रुपये व्यय हो चुके हैं।

Edited By: Prateek Gupta