अभिषेक पाठक ने ‘ग्रीनवेयर’ नाम से एक ऐसी कंपनी की नींव रखी है, जो विभिन्न प्रकार के ‘सोलरवस्त्र’ बनाती है। ये वस्त्र पर्यावरण के अनुकूल भी हैं, क्योंकि इसके सूत सोलर चरखे से काते जाते हैं, फैब्रिक की बुनाई सोलर लूम पर होती है और कपड़े की सिलाई सोलर सिलाई मशीन से की जाती है। वह काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरमेंट एवं वाटर (सीईईडब्ल्यू) और विलग्रो फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से चलाए जा रहे ‘पावरिंग लाइवलीहुड्स प्रोग्राम’ का हिस्सा भी हैं। अभिषेक का सपना देश में निर्मित फैब्रिक तैयार करना है। इसके अलावा, वह महिला बुनकरों के लिए रोजगार के अवसर सृजित करना चाहते हैं। वह कहते हैं कि आज युवा प्रयोग करने से संकोच नहीं कर रहे। सोच बदल रहा है। उद्यमिता में जाने को लेकर जो डर होता था, वह कम हुआ है। आत्मविश्वास आया है। मेट्रो शहरों के अलावा टियर 2 एवं 3 शहरों में भी स्टार्टअप संस्कृति का विस्तार हो रहा है।

दिल्ली के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फैशन डिजाइनिंग से टेक्सटाइल डिजाइनिंग करने के बाद अभिषेक पाठक ने अमेरिकी लग्जरी होम फैशन ब्रांड के साथ डिजाइन एवं प्रोडक्ट डेवलपमेंट हेड के रूप में काम करना शुरू किया। अगले दो वर्षों में उनका रुझान पारंपरिक टेक्सटाइल की ओर हुआ और उन्होंने ‘प्रकृति’ नाम से एक कंपनी की स्थापना की। इसके तहत वह राजस्थान के ब्लाक प्रिंटिंग बुनकरों के साथ काम करने लगे। वह बताते हैं, ' कालेज में पढ़ाई के दौरान क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत मुझे महेश्वर (मध्य प्रदेश) के स्थानीय बुनकरों के साथ काम करने का मौका मिला था। उनके परिवारों को करीब से देखने के बाद मेरी आंखें खुल गईं। देश में इतना हुनर छिपा है, लेकिन उसके कद्रदान नहीं हैं। उसी क्षण मन में संकल्प किया कि बुनकरों के आर्थिक उत्थान, उनके हुनर को पहचान दिलाने के लिए कुछ ठोस करना है। उनके उत्पादों को बाजार तक पहुंचाना है। इस तरह ‘ग्रीनवेयर’ की शुरुआत हुई।‘

फैब्रिक में इनोवेशन पर जोर : खास बात यह है कि अभिषेक के परिवार का उद्यमिता से किसी प्रकार का नाता नहीं रहा। फिर भी उन्होंने मेट्रो शहर की जगह लखनऊ में उद्यम शुरू करने का बड़ा फैसला लिया। इनका सफेदाबाद (बाराबंकी) में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट एवं सेग्रीगेशन सेंटर है। इसके अलावा बिहार के नालंदा, गया, भागलपुर एवं उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, वाराणसी एवं बिजनौर में भी यूनिट हैं। टीम में बुनकरों के अलावा रिसर्च, इनोवेशन, डिजाइनिंग, मार्केटिंग आदि से जुड़े पेशेवर लोग हैं। इस समय ये नालंदा की बावन बूटी साड़ी एवं पूरी तरह देसी बनारसी साड़ी के निर्माण पर काम कर रहे हैं। बताते हैं अभिषेक, ‘हम लगातार इनोवेशन करते रहने में विश्वास करते हैं। अलग-अलग प्रकार के फैब्रिक पर काम किया जा रहा है। जैसे इन दिनों टैमरिंड फैब्रिक के विकास को लेकर प्रयोग चल रहे हैं, जिसमें इमली के साथ काटन को मिक्स किया जाता है। इसी तरह, बनारसी साड़ी में उपयोग होने वाला अधिकांश सूत चीन से आता है। हमारा प्रयास देश में ही इसे विकसित करना है।

खादी को प्रोत्साहित करने की कोशिश : अभिषेक का कहना है कि देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संवारने एवं उसे मजबूती देने में खादी की अहम भूमिका हो सकती है। वह बताते हैं, दृष्टि फाउंडेशन के टेक्सटाइल एवं क्राफ्ट इनिशिएटिव में काम करने के दौरान उन्हें तत्कालीन एमएसएमई मंत्री का बुलावा आया था। उन्होंने उनसे सोलर चरखा की सहायता से खादी एवं इससे जुड़े उद्योग में सुधार लाने के सुझाव मांगे। इसके बाद ही मुख्यधारा की फैशन इंडस्ट्री में खादी को प्रमोट करने पर विचार हुआ। 2016 में अभिषेक भारतीय हरित खादी ग्रामोद्योग संस्था के सीईओ बनाए गए। 2018 में जब ‘मिशन सोलर चरखा’ की शुरुआत हुई, तो उन्हें इस अभियान को धार देने का अवसर मिला। वह बताते हैं, ‘हमारे यहां वर्षों से चरखे पर सूत बुना जा रहा है। लेकिन इसमें काफी समय लगता है। एक ग्लोबल रिसर्च के दौरान मुझे सोलर चरखा की जानकारी मिली थी, जिसे महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट आफ रूरल इंडस्ट्रियलाइजेशन ने विकसित किया था। इस सोलर चरखे की खासियत यह है कि इसकी पुली से एक पीएमडीसी मोटर को जोड़ा जाता है और वह एक सोलर पैनल द्वारा संचालित होता है। इससे चरखे को हाथ से चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आमतौर पर जो महिलाएं आठ घंटे में हाथ से 50 से 60 ग्राम सूत बुना करती हैं, वे इस सोलर चरखे से इतने ही समय में एक किलो सूत की बुनाई कर पाती हैं। इससे उन्हें घर की अन्य जिम्मेदारियां संभालने के लिए पर्याप्त समय भी मिल जाता है। सोलर चरखा मिशन का उद्देश्य भी अलग-अलग राज्यों में एक लाख लोगों को रोजगार देना है।‘

सोलर चरखा से महिलाओं का सशक्तीकरण: सोलर चरखा ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण का माध्यम बन सकता है, यह विचार जब अभिषेक के मन में आया तो उन्होंने एक नई शुरुआत करने का निर्णय लिया। उन्हें टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज की एक प्रतियोगिता में शामिल होने का अवसर मिला। उसमें वह रनरअप रहे। वहीं से उन्हें ‘जनहित जागरण अभियान’ की जानकारी मिली। इसमें सफलता हासिल करने के बाद अभिषेक को आइआइएम कलकत्ता स्थित इंक्यूबेशन सेंटर से पचास लाख रुपये की सीड फंडिंग मिली और उन्होंने ‘ग्रीनवेयर’ कंपनी लांच कर दी। आगे चलकर अमेरिका के सिएटल स्थित वेंचर से भी उन्हें करीब 35 लाख रुपये मिले। अभिषेक बताते हैं,‘आइआइएम कलकता इनोवेशन पार्क से हमें टेक्निकल असिस्टेंस, इमरजेंसी फंडिंग एवं अन्य सहयोग मिले। उन्होंने हमारे आइडिया पर विश्वास दिखाया। यह सबसे बड़ी सफलता थी। इसके अलावा, भारतीय हरित खादी ग्रामोद्योग संस्थान से हमें धागे मिल जाते हैं।‘

 अभिषेक पाठक

फाउंडर, ‘ग्रीनवेयर’

अंशु सिंह 

Edited By: Nandini Dubey

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