आगरा, अम्बुज उपाध्याय। देश विभाजन की विभीषिका को याद कर हर कोई सहम जाता है, तो जिन्होंने इसको झेला या सुना है उनकी आंखें नम हो जाती है। पाकिस्तान के मुल्तान स्थित डेरा गाजी खां में जमींदार रहे चौधरी लाल चंद डावर को अपना तीन मंजिला मकान छोड़ना पड़ा तो वर्ष 1947 में परिवार सहित खाली हाथ आगरा आए। मलपुरा में बने एक शिविर में शरण ली। जीवन यापन के लिए दूध बेचना शुरू किया तो इसके बाद कोयला का लाइसेंस लेकर व्यापार किया। कोयले का काम धीरे-धीरे चल पड़ा।

वर्ष 1974 में चौधरी का निधन हो गया तो बच्चों की जिम्मेदारी पत्नी सत्यवंती पर आ गई। उन्होंने बच्चों के शिक्षण कार्य में तंगी को आड़े नहीं आने दिया और परिवार काे संभाला। बेटों ने सरकारी नौकरी के लिए प्रयास किए। असफल होने के बाद जूते का रिटेल का काम शुरू किया, जिसके बाद छोटे स्तर पर निर्माता बने और पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज डावर फुटवियर 40 देशों में जूता निर्यात करती है।

कपड़े सिले और बेचा दूध

स्वर्गीय लाल चंद डावर ने विभाजन के दौरान बहुत कुछ झेला। मुलतान से भारत की यात्रा का जिक्र करने पर अक्सर उनकी आंखें नम हो जाती थी। वे अपने साथ पत्नी सत्यवंती, बेटा लक्ष्मणदास, बेटी सुदर्शन और दुर्गा के साथ आगरा आए थे। आगरा में दो पुत्रों ने जन्म लिया। वर्ष 1949 में जवाहर डावर और 1953 में पूरन डावर का जन्म हुआ। आगरा फुटवियर मैन्यूफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स चैंबर (एफमेक) अध्यक्ष पूरन डावर ने बताया कि कस्टोडियन ने शाहगंज में रहने की जगह दिलाई। परिवार ने कड़ा संघर्ष किया, पिता ने कपड़े सिले, तो दूध बेचने के अलावा और दूसरे काम भी किए।

स्व. चौधरी लाल चंद डावर के छोटे पुत्र पूरन डावर। 

परिवार की स्थिति देख वे अध्ययन में जुट गए। 1965 में बाल स्वयं सेवक बने तो इसके बाद विद्यार्थी परिषद में सक्रिय रहे। उन्होंने बताया कि माडल स्कूल से स्कूलिंग की और आर्थिक तंगी के कारण स्कूल यूनिफार्म को प्रेस के लिए तकिए के नीचे रखते थे। आगरा कालेज से एमए अर्थशास्त्र और एलएलबी करने के बाद सरकारी नौकरी के लिए जुट गए। बैंक की लिखित परीक्षा में पास हुए, लेकिन इंटरव्यू में सफलता नहीं मिल सकी। पारिवारिक मित्र के रिश्तेदार बैंक के चेयरमैन थे, लेकिन डावर को अपनी मेहनत पर भरोसा था। इसके बाद उनका मन बदल गया और वे कुछ बेहतर करने की सोचने लगे।

कोरोना काल में एफमेक द्वारा स्थापित अस्थायी अस्पताल में मरीजाें को फल वितरित करते पूरन डावर। 

छात्र राजनीति के दौरान वे भाजपा के दिग्गज नेता राजकुमार सामा के संपर्क में आए और उनसे जूता कारोबार के लिए प्रेरणा मिली और वर्ष 1977 में सदर बाजार में डावर्स नाम से जूता शोरूम खोला। पूरन डावर के जीवन में वर्ष 1983 खुशियां लेकर आया। संयुक्त परिवार ने हींग की मंडी में जूता फैक्ट्री खोली, तो इसी वर्ष उनका विवाह बुलंदशहर निवासी मधु डावर से हुआ। वर्ष 1984 में परिवार में जिम्मेदारियां बंटी और बड़े भाई जवाहर डावर पर सदर बाजार शोरूम और पूरन डावर पर हींग की मंडी फैक्ट्री का भार आया। उन्होंने फैक्ट्री के काम को आगे बढ़ाया और कुछ दिनों में ट्रांसपोर्ट नगर में फैक्ट्री बनाई। अब तक स्थानीय बाजार के साथ निर्यात शुरू हो गया था। वर्ष 2000 में सिकंदरा मंडी के निकट हाईवे पर डावर फुटवियर की स्थापना हुई और 100 प्रतिशत निर्यात शुरू हो गया।

इंग्लैंड के लिए किया पहला निर्यात

पूरन डावर ने बताया कि कंपनी ने अपना पहला निर्यात इंग्लैंड के लिए किया। जर्मनी, इटली, अमेरिका के शू फेयर में जाने लगे। जर्मनी फेयर में उन्हें छह हजार जोड़ियों का आर्डर मिला। कंपनी का उद्देश्य था कि तीन दिन के फेयर में वे किसी अन्य के पास नहीं जा सकें। उन्होंने आर्डर को छोड़ दिया और आज कई बड़ी कंपनियों के लिए वे निर्यात करते हैं।

एफमेक के हैं 2009 से अध्यक्ष

आगरा के जूता कारोबार के विकास के लिए वर्ष 1997 में जूता कारोबारियों के साथ जोड़ आगरा फुटवियर मैन्यूफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स चैंबर (एफमेक) की स्थापना कर जूता कारोबार को विश्व से जोड़ा। वर्ष 2009 से पूरन डावर वर्तमान तक एफमेक के अध्यक्ष हैं।

लॉकडाउन के दौरान आगरा से गुजरे श्रमिकाें को भाेजन वितरित करते पूरन डावर। 

90 देशों की कर चुके हैं यात्रा

पूरन डावर का कहना है कि सीखने का क्रम उम्रभर चलता है। विदेशों में जाकर भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है और ये आवश्यक भी है। उन्होंने बताया कि वे अमेरिका, स्वीडन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, फ्रांस, इंग्लैंड, हालैंड, डेनमार्क, नार्वे, आस्ट्रेलिया सहित अन्य देश सम्मिलित हैं।

पौने दो सौ करोड़ का है कारोबार

डावर फुटवियर इंडस्ट्रीज का पौने दो सौ करोड़ का कारोबार है। इसके साथ ही डावर इंफ्राविल्ड के माध्यम से इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में भी कार्य किया जा रहा है। इसमें वेयरहाउस बनाना आदि सम्मिलित हैं।

रोजाना हजाराें लोगाें को भाेजन

डावर मैमोरियल ट्रस्ट के माध्यम से समाज सेवा में बड़ा योगदान दिया जा रहा है। पूरन डावर ने बताया कि जिस व्यक्ति ने अभाव में जीवन बिताया हो तो वे सक्षम होने के बाद अपने जैसे लोगों के बारे में सोचना चाहिए। समाज के उस वर्ग को हाथ बढ़ाकर आगे बढ़ाने का प्रयास और उनके लिए कुछ करना ही आत्मीय संतुष्टि देता है। अंत्योदय अन्नपूर्णा योजना के माध्यम से गरीबों को विभिन्न स्थानों पर 10 रुपये में भर पेट भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।

छात्रों को बना रहे सक्षम

पूरन डावर के छोटे पुत्र सक्षम की 1998 में नौ वर्ष की आयु में छत से गिरने से मृत्यु हो गई थी। वे सेंट पीटर्स में पढ़ते थे। पिता ने उसी वर्ष सेंट पीटर्स में ट्रस्ट का गठन किया और गरीब, मेधावी बच्चों की मदद की शुरुआत की गई। इसके तहत 500 छात्र लाभ ले रहे हैं। डावर इंडस्ट्रीज में काम करने वाले कर्मचारी भी इसका लाभ ले रहे हैं। अगर किसी का एक बच्चा है तो उसकी पूरी फीस और दो बच्चें हैं तो दोनों की आधी फीस ट्रस्ट देता है।

Edited By: Prateek Gupta