औरंगाबाद, पीटीआइ। महाराष्ट्र पुरातत्व विभाग ने उस्मानाबाद जिले में सात धाराशिव गुफाओं में से एक क्षतिग्रस्‍त गुफा की मरम्‍मत कर उसे ठीक कर दिया है। इस क्षेत्र में हुई अत्‍याधिक बारिश के कारण इस गुफा को काफी नुकसान पहुंचा था। उस्मानाबाद शहर से लगभग आठ किमी दूर स्थित हैं बालाघाट के पहाड़ों में स्थित ये गुफाएं कलात्मक नक्काशी का एक ऐसा नमूना है जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।  

 राज्य पुरातत्व विभाग के सहायक निदेशक अजीत खंदारे ने पीटीआइ को बताया कि आगे इसे किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे इसके लिए संरचना को सहारा देने के लिए 12 स्तंभों का निर्माण करने का काम किया गया है।खंदारे ने बताया कि इन स्‍तंभों से गुफा की ऊपरी चट्टान को सहारा मिलेगा जिससे ये मजबूत रहेगी, यहां अभी अगले दो माह तक बहाली का कार्य जारी रहेगा।  

धाराशिव गुफाओं का इतिहास

महाराष्ट्र राज्य के बालाघाट पहाड़ों में उस्मानाबाद शहर से 8 किमी दूर स्थित धाराशिव गुफाएं 7 गुफाओं का गठबंधन हैं। गुफाओं को भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा नोट किया गया था और जेम्स बर्गेस द्वारा भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण पुस्तक में उल्लेख किया गया था। महाराष्ट्र सरकार द्वारा धाराशिव गुफाओं को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है।

धाराशिव गुफाओं का निर्माण 5वीं-7वीं शताब्दी के आसपास हुआ था। 10वीं शताब्दी में पहली गुफा की खोज की गई, इसके बाद इन गुफाओं पर बहस हुई है कि वे बौद्ध या जैन रचनाएं हैं या इनमें से कोई भी नहीं। ऐसा माना जाता है कि ये गुफा मूल रूप से बौद्ध रचना थी, लेकिन बाद में जैन धर्म के स्मारकों में परिवर्तित हो गयी।

यहां के पठान, तेर (टैगार) के शहरों के पास से जाने वाला व्‍यापार मार्ग धाराशिव के पास से होकर गुजरता था।  इस मार्ग पर इन गुफाओं को बालाघाट पर्वत श्रृंखला में बनाया गया था। ये गुफा सरस्वती गुफाओं के रूप में विख्‍यात हैं। बौद्ध, हिंदू और जैन समेत यहां कुल 11 गुफाएं बनी हुई है। यहां एक समाधि मंदिर भी है जिसे 17 वीं शताब्दी में बनाया गया था। यहां पत्थर से ढका हुआ एक शानदार प्रवेश द्वार है। प्रवेश द्वार के दोनों किनारों पर वंदला बनाये गये हैं। इसमें प्रवेश करते समय आप पत्थर के पत्थर में बने स्तूप के अवशेष देख सकते हैं। इस जगह पर पहले बौद्ध गुफाएं थीं। 

Posted By: Babita kashyap

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