मुंबई, ओमप्रकाश तिवारी। पुणे जिले के भीमा-कोरेगांव की दो सौ साल पुरानी जंग की बरसी से उपजे तनाव ने मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई शहरों को जातीय हिंसा में झुलसा दिया। जगह-जगह दलित और मराठा समुदाय के बीच झड़प हुई।

 

विवाद नववर्ष के पहले दिन सोमवार क अहमदनगर हाइवे पर झड़प के दौरान एक व्यक्ति की मौत से शुरू हुआ। मंगलवार को इस घटना के विरोध में पुणे, मुंबई और औरंगाबाद समेत 13 शहरों में हिंसा हुई। इस दौरान कई वाहनों व दुकानों में तोडफ़ोड़ की गई। अकेले मुंबई में 160 से अधिक बसों को नुकसान पहुंचा। यहां सौ से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है। मुंबई में रेल और हवाई यातायात तक प्रभावित हो गए। लोगों की ट्रेनें और विमान छूट गए। पुर्णे ंहसा में शहर के दो दक्षिणपंथी संगठनों के नेताओं

के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

 

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस ने पुणे हिंसा की जांच मुंबई हाई कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश से कराने का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि यह बड़ी साजिश का नतीजा लगता है। उन्होंने हिंसा में मारे गए युवक राहुल के परिजनों को 10 लाख रुपये मुआवजा देने की भी घोषणा की हिंसा के चलते केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने फडऩवीस से फोन पर हालात की जानकारी ली। रिपब्लिकन नेता एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर ने बुधवार को महाराष्ट्र बंद का आह्वान किया है।

 

दरअसल, एक जनवरी, 1818 को पुणे जिले के भीमा-कोरेगांव युद्ध में अंग्रेजों (ईस्ट इंडिया कंपनी) ने पुणे के बाजीराव पेशवा द्वितीय की सेना को हराया था। वहां अंग्रेजों ने अपनी विजय को यादगार बनाने के लिए स्मारक बनवाया था। नववर्ष पर इसी युद्ध स्मारक पर न सिर्फ करीब तीन लाख दलित श्रद्धांजलि देने पहुंच गए। इसकी पूर्व संध्या पर रविवार (31 दिसंबर) को पुणे में ही 'शनिवारवाड़ा यलगार परिषद' का भी आयोजन किया गया। यह आयोजन पेशवाओं के ऐतिहासिक निवास शनिवारवाड़ा के बाहर किया गया, जिसमें गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी, रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला और जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार का साथी और पूर्व छात्र उमर खालिद भी शामिल हुए।

 

आरोप है कि शनिवारवाड़ा यलगार परिषद में जिग्नेश मेवाणी ने भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 'नया पेशवा' करार देते हुए इनके विरुद्ध सभी पार्टियों को साथ आकर लडऩे का आह्वान किया। महाराष्ट्र में पेशवाओं का शासन ब्राह्मण शासन व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। इस परिषद का आयोजन पेशवाओं पर हमले के साथ-साथ वर्तमान ब्राह्मण मुख्यमंत्री के विरुद्ध भी 'यलगार' माना जा रहा है। 

 

पुणे हिंसा पूर्वनियोजित थी। युद्ध स्मारक पर हर साल मुश्किल से 1500 लोग पहुंचते थे। लेकिन इस बार तीन लाख लोग आए। हालांकि राज्य सरकार सतर्क थी, इसलिए भारी पुलिसबल का इंतजाम किया गया था। इसके कारण झड़प शुरू होते ही दूर-दूर से आए लोगों को बसों में बैठाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया।

- देवेंद्र फडऩवीस, मुख्यमंत्री

 

सुबह से ही शुरू हो गया था उपद्रव

रविवार को किए गए आह्वान के कुछ ही घंटों बाद सोमवार को युद्ध स्मारक पर जुटी लाखों की भीड़ और स्थानीय ग्रामवासियों के बीच हुई झड़प में 28 वर्षीय राहुल की मौत हो गई। इस पर प्रदर्शनकारियों ने 25 से अधिक वाहन जला दिए। मंगलवार को इस घटना की प्रतिक्रिया मुंबई सहित महाराष्ट्र के कई हिस्सों में दिखाई दी। मुंबई के दलित बहुल क्षेत्रों चेंबूर, घाटकोपर, पवई एवं वरली आदि में दलित कार्यकर्ताओं ने सुबह से ही सड़क जाम एवं दुकानें बंद कराना शुरू कर दिया था। 

 

ऐसा है भीमा-कोरेगांव युद्ध का इतिहास

दरअसल, एक जनवरी, 1818 को पुणे जिले के भीमा कोरेगांव युद्ध में अंग्रेजों (ईस्ट इंडिया कंपनी) ने पुणे के बाजीराव पेशवा द्वितीय की सेना को हराया था। अंग्रेजों की सेना में महाराष्ट्र के महार (दलित) समाज के 600 सैनिकों ने पेशवा की शक्तिशाली 28 हजार मराठा फौज को हरा दिया था। जंग में बड़ी संख्या में महार सैनिक शहीद हो गए थे, इसलिए दलित यहां जयस्तंभ नाम से बने स्मारक पर हर साल उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

 

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By Babita