मुंबई, अनुज अलंकार। फिक्की फ्रेम 2018 के दूसरे दिन मंगलवार को कुछ दिलचस्प सत्र हुए। एक ओर पा और हाल ही में रिलीज हुई फिल्म पैडमैन के निर्देशक आर. बाल्की के साथ मास्टर क्लास लगी, तो छोटे बजट की फिल्मों के मौजूदा हालात को लेकर सत्र हुआ। एक अन्य सत्र में निर्देशक श्याम बेनेगल ने सेंसर बोर्ड से जुड़े मुद्दों को लेकर सत्र को संबोधित किया। बायोपिक फिल्मों को लेकर हुए सत्र में हंसल मेहता, नंदिता दास और मिलन लथूरिया ने हिस्सा लिया। 

आर. बाल्की के साथ मास्टर क्लास का सत्र रोचक रहा। इस सत्र में आर. बाल्की ने अमिताभ बच्चन से जुड़े रोचक प्रसंग सुनाए कि किस तरह से उनका बच्चन के साथ जुड़ाव हुआ। बाल्की के निर्देशन में बनी सभी फिल्मों चीनी कम, पा, शमिताभ में बच्चन की प्रमुख भूमिका रही, जबकि का एंड की और पैडमैन में अमिताभ बच्चन ने मेहमान भूमिका निभाई। बाल्की ने बताया कि कैसे पहली बार उन्होंने एक विज्ञापन फिल्म के लिए बच्चन से संपर्क किया था और किस तरह से उनको पहली फिल्म के लिए एप्रोच किया था। बाल्की ने कहा कि अमिताभ बच्चन एक्टर नहीं, एक संस्था का नाम है, जो सिनेमा की हर विधा को अपने रंग में रंग लेते हैं।

 छोटे बजट की फिल्मों पर संकट गहराया 

छोटे बजट की फिल्मों और स्वतंत्र फिल्मकारों के मौजूदा हालत को लेकर हुए सत्र में रजत कपूर और फुकरे फेम निर्देशक अमरजीत लांबा ने हिस्सा लिया। रजत कपूर का कहना था कि छोटे बजट की फिल्मों को लेकर संकट गहराता जा रहा है, क्योंकि बड़े कारपोरेट घराने उनकी मदद करने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब मल्टीप्लेक्स आए, तो उनको उम्मीद थी कि इससे छोटे बजट की फिल्मों के स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए रास्ते खुलेंगे, लेकिन ये उम्मीद जल्दी ही निराशा में बदल गई।

अमरजीत लांबा का मानना था कि अगर कटेंट में दम है, तो बड़े फिल्मकार छोटे बजट की फिल्मों को सपोर्ट करते हैं, क्योंकि बड़ी फिल्मों के निर्माण में ज्यादा वक्त लगता है। उन्होंने कहा कि इसे लेकर बेहतर तालमेल की कमी है।

श्याम बेनेगल का सेंसर में व्यापक बदलाव पर जोर  सेंसर बोर्ड की भूमिका और जरूरत को लेकर हुए सत्र में वरिष्ठ फिल्मकार श्याम बेनेगल ने इस बात पर जोर दिया कि सेंसर में व्यापक बदलाव की जरूरत है। उन्होंने सेंसर सिस्टम को हटाने की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि कोई एक सिस्टम जरूर होना चाहिए, जो पब्लिक और फिल्मकारों के बीच ब्रिज की तरह काम करे।

बायोपिक में मनोरंजन पक्ष संतुलित हो: लथूरिया 

बायोपिक फिल्मों के बढ़ते दौर को लेकर हुए सत्र में निर्देशक मिलन लथूरिया ने कहा कि बायोपिक फिल्मों में भी मनोरंजन पक्ष को लेकर संतुलित होना जरूरी है, वरना वे डाक्युमेंट्री बनकर रह जाएंगी। हंसल मेहता का कहना था कि वे बायोपिक फिल्मों को एक दिलचस्प कहानी के नजरिए से देखते हैं। बायोपिक में अगर दर्शकों को अपने साथ जोडऩे की क्षमता है, तभी उसे सफलता मिलेगी, वरना नहीं। दंगल लिखने वाले लेखक पियूष गुप्ता ने कहा कि इन फिल्मों को बायोपिक कहने की जगह इवेंट बेस फिल्में कहा जाना चाहिए, क्योंकि इन फिल्मों में इवेंट को ही कहानी का रूप देते हैं।

By Babita