नागपुर MLC चुनाव: भाजपा के गढ़ में कांग्रेस ने कैसे दर्ज की शानदार जीत? ये हैं 5 मुख्य कारण
नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने भाजपा के गढ़ में जीत दर्ज कर बड़ा उलटफेर किया ...और पढ़ें

नागपुर विधान परिषद सीटे से जीते कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी।
HighLights
कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने 3,271 मतों से जीत दर्ज की।
भाजपा की हार का कारण आंतरिक कलह और कमजोर बूथ प्रबंधन।
निर्दलीय उम्मीदवार नीलेश मास्टर ने चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डिजिटल डेस्क, नागपुर। महाराष्ट्र की हाई प्रोफाइल सीट और आरएसएस के गढ़ नागपुर का चुनाव बड़ा ही दिलचस्प रहा। आरएसएस के गढ़ में कांग्रेस उम्मीदवार का विजयी होना बीजेपी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं माना जा रहा है।
नागपुर स्नातक क्षेत्र की विधान परिषद सीट पर ये बड़े उलटफेर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अगर मतदाता तक सही और स्पष्ट तरीके से बात रखी जाए तो कोई भी पार्टी आसानी से चुनाव जीत सकती है। यहां पर कांग्रेस के उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने बीजेपी के उम्मीदवार सुधाकर कोल्हे को हरा दिया है।
लंबे समय तक बीजेपी का रहा था दबदबा
नागपुर में हुए इस बड़े उलटफेर के पीछे की वजहों को जानते हैं कि आखिर कैसे बीजेपी अपने मूल संगठन आरएसएस के गढ़ में बढ़त बनाने में पीछे रह गई। दरअसल ये सीट काफी लंबे समय तक बीजेपी के पाले में ही रही थी। यहां पर कांग्रेस की ये लगातार दूसरी जीत है।
कितने वोटों से कांग्रेस उम्मीदवार जीते
कांग्रेस उम्मीदवार शुरुआती गिनती में पिछड़ते नजर आ रहे थे लेकिन बाद के दूसरे राउंड में उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को पीछे करते हुए 3,271 मतों से जीत दर्ज की। इसके साथ ही बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ गया।
क्यों मिली बीजेपी को हार
बीजेपी यहां पर अपने उम्मीदवार के पहले राउंड के वोटों पर ही ज्यादा विश्वास के साथ प्रचार कर रही थी जबकि उसे पहले राउंड में उम्मीद के मुताबिक वोट नहीं मिले। जब पहली प्राथमिकता की गिनती के दौरान कोई भी मुख्य उम्मीदवार कोटा सीमा तक नहीं पहुंच पाया तो दूसरी प्राथमिकता वाले वोट भारी संख्या में कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में चले गए जिससे पूरा खेल बदल गया।
निर्दलीय ने बिगाड़ा खेल
दरअसल यहां पर निर्दलीय उम्मीदवार नीलेश मास्टर ने पूरा खेल बिगाड़ दिया। उनको 24,249 मत मिले। जब कोई भी जीत के निर्धारित 75,438 के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया तब दूसरे वरीयता के लिए गिनती होती है। सारा खेल यहीं से बीजेपी के लिए बिगड़ गया। इस राउंड में कांग्रेस उम्मीदवार वंजारी लगातार बढ़ता बनाए हुए थे और आखिरी में तीन हजार से ज्यादा वोटों से जीत हासिल हुई। यहां बता दें कि निर्दलीय उम्मीदवार नीलेश मास्टर को मिले प्रथम वरीयता के मतपत्रों में दूसरी वरीयता के ज्यादातर मत अभिजीत वंजारी के थे जिससे उन्हें जीत हासिल हुई।
कई वोट हुए बर्बाद
कुल 1,65,906 डाले गए वोटों में से 15,032 वोट अमान्य घोषित कर दिए गए। कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि हर 11 शिक्षित स्नातक मतदाताओं में से लगभग 1 का मतपत्र गतल तरीके से भरा था, जिससे वो अमान्य हो गए। इसने 2020 में बने 11,540 अमान्य वोटों के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ दिया। इससे बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ा।
बीजेपी को भारी पड़ी बगावत
सुधाकर कोल्हे के चयन ने भाजपा और उसके मूल संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के भीतर आंतरिक कलह को जन्म दिया। पूर्व विधायक अनिल सोले ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ अपना बागी रुख बनाए रखा, जिससे स्थानीय कार्यकर्ता गुटों में बंट गए।
बूथ पर बीजेपी हुई कमजोर
इसके साथ ही बीजेपी जिस बूथ स्तर की ताकत के लिए जानी जाती वो ही बूथ लेवल पर कमजोर पड़ गई। पार्टी के प्रमुख गुटों के बीच अंदरूनी उठपटक और असंतोष के कारण, बीजेपी की आमतौर पर सुव्यवस्थित चुनावी मशीनरी कई अहम मतदान केंद्रों पर बंटी हुई और कमजोर नजर आई।
अभिजीत वंजारी की जमीनी मेहनत हुई कामयाब
कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत अपने पूरे कार्यकाल के दौरान लोगों से संपर्क बनाए रखा। विदर्भ क्षेत्र में स्नातक मतदाताओं के बीच लगातार आते जाते रहे। वहीं भाजपा ने अंतिम समय में हाई-प्रोफाइल प्रचार किया जो काम नहीं आ सका।
