मुंबई, ओमप्रकाश तिवारी। महाराष्ट्र में चल रहे राजनीतिक गतिरोध के बीच सबके मन में यही सवाल गूंज रहा है कि आगे क्या होगा ? राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी एक दिन पहले ही महाराष्ट्र के महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोणी को बुलाकर उनसे सरकार बनने या न बन पाने की सभी स्थितियों पर चर्चा कर चुके हैं। शुक्रवार शाम मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के इस्तीफे के बाद राज्यपाल ने उन्हें कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में अगली वैकल्पिक व्यवस्था तक काम करते रहने के निर्देश दिए हैं। लेकिन यह व्यवस्था अधिक दिनों तक नहीं चलाई जा सकती।

भाजपा और शिवसेना के बीच खत्‍म नहीं हुई संभावनाएं

राज्यपाल के पास पहला विकल्प सबसे बड़े दल या चुनाव पूर्व गठबंधन को अवसर देने का है। भाजपा नेता सुधीर मुनगंटीवार साफ कह चुके हैं कि भाजपा अल्पमत सरकार नहीं बनाएगी। दूसरी ओर तमाम कड़वाहटों के बावजूद शिवसेना-भाजपा दोनों ने गठबंधन तोड़ने की घोषणा नहीं की है। केंद्र सरकार में अभी भी शिवसेना के नेता अरविंद सावंत मंत्री बने हुए हैं। आज देवेंद्र फड़नवीस और उद्धव ठाकरे दोनों ने अपने-अपने संवाददाता सम्मेलनों में एक बार भी यह नहीं कहा कि भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार बनने की संभावनाएं खत्म हो गई हैं। दोनों नेता सिर्फ अपने अहं पर अड़े दिखाई दिए। माना जा रहा है कि नितिन गडकरी जैसा भाजपा का कोई बड़ा नेता मध्यस्थता की कोशिश करे तो बात अब भी बन सकती है।

शिवसेना को भी सरकार बनाने के लिए कर सकते हैं आमंत्रित

सबसे बड़े दल द्वारा सरकार बनाने में असमर्थता जताने की स्थिति में राज्यपाल दूसरे सबसे बड़े दल, यानी शिवसेना को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। लेकिन साथ ही वह शिवसेना से 145 विधायकों के समर्थन की सूची मांग सकते हैं, या राजभवन में उनकी परेड की शर्त रख सकते हैं। कांग्रेस-राकांपा के कई नेता पहले से इस पक्ष में हैं कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए शिवसेना को बाहर से समर्थन देकर सरकार बनवा दी जाए। लेकिन श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण की प्रखर समर्थक रही शिवसेना की सरकार को समर्थन देना इन दोनों दलों को भारी पड़ सकता है, जिसके नेता अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाए जाने के मामले में आरोपी रहे हों। वैसे भी इस मसले का फैसला आने के बाद शिवसेना इसका श्रेय लेने से तो चूकेगी नहीं।

तीसरे विकल्‍प के रूप में लग सकता है राष्‍ट्रपति शासन

प्रथम दो बड़े दलों के चूकने के बाद राज्यपाल के पास तीसरा विकल्प राष्ट्रपति शासन का ही बचता है। 70 फीसद स्ट्राइक रेट के साथ 105 सीटें जीतनेवाली सबसे बड़ी पार्टी भाजपा भी इसे अपने हित में पाती है। सत्ता में साथ रहकर उसके नेताओं को खरी-खोटी सुनानेवाली शिवसेना से अब उसका भी पेट भर चुका है। संभव है श्रीरामजन्मभूमि का फैसला मंदिर के पक्ष में आने के बाद उसे माहौल बनाने का अवसर भी मिल जाए। तब छह महीने या साल भर बाद होनेवाले मध्यावधि चुनाव में वह अकेले लड़कर सरकार सत्ता में वापसी की कोशिश कर सकती है। 

Posted By: Arun Kumar Singh

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