जातिवाद गलत है, लेकिन 'प्रति जातिवाद' भी सही नहीं: सुधींद्र कुलकर्णी
आईआईटी मुंबई में छात्र साहिल वाकोड़े की आत्महत्या के बाद SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर बहस तेज हो गई है। ...और पढ़ें

जातिवाद और प्रति जातिवाद दोनों गलत- सुधींद्र कुलकर्णी
HighLights
साहिल आत्महत्या के बाद SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर बहस।
सुधींद्र कुलकर्णी ने जातिवाद व प्रति जातिवाद दोनों को गलत कहा।
कानून का दुरुपयोग शिक्षक-छात्र संबंधों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।
ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मुंबई में छात्र साहिल वाकोड़े की आत्महत्या के बाद वहां हो रही राजनीति ने समूचे बौद्धिक-सामाजिक जगत को उद्वेलित कर दिया है।
एक तरफ पूर्व डीन प्रो. सूर्यनारायण दुल्ला की गिरफ्तारी की मांग हो रही है, जिसने उस छात्र को कथित तौर पर परीक्षा के दौरान स्मार्टफोन एवं एआइ की मदद लेते हुए पकड़ा, तो दूसरी ओर यह प्रश्न भी उठ रहा है कि यदि छात्रों को ऐसी छूट दी गई तो अन्य छात्रों का एवं ऐसे उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त संस्थानों का भविष्य क्या होगा?
इस घटना ने और भी कई सवालों को जन्म दिया है...। यदि साहिल के साथ बीते तीन महीने से कोई भेदभाव हो रहा था तो एक बार भी आईआईटी मुंबई में मौजूद आंबेडकर-पेरियार-फुले मंच तक अपनी शिकायत लेकर क्यों नहीं गया...उसने स्टूडेंट्स सेल में शिकायत क्यों नहीं की? या फिर यह एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग का मामला है, जो अब देश के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंच चुका है?
इन्हीं प्रश्नों से उद्वेलित जाने-माने चिंतक और आईआईटी मुंबई के पूर्व छात्र सुधींद्र कुलकर्णी ने देश में एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग रोकने की अपील जारी की है। उनकी यह अपील इसलिए मौजूं है, क्योंकि कर्नाटक के छोटे से गांव अथानी के गरीब परिवार से आने वाले कुलकर्णी ने इसी आईआईटी मुंबई में करीब 50 वर्ष पहले प्रवेश लेकर सिविल इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री हासिल की थी।
आईआईटी मुंबई के पूर्व छात्र होने के नाते पढ़ाई के दौरान विद्यार्थियों को आने वाली परेशानी, उससे उबरने के तरीकों और उसमें शिक्षकों की भूमिका से अच्छी तरह से परिचित कुलकर्णी खुद शुरुआती दो साल फेल हुए थे। उन्हें पढ़ाई समझने में दिक्कत हुई, लेकिन फिर खुद को अन्य विद्यार्थियों के समकक्ष लाकर खड़ा किया।
वह कहते हैं कि आईआईटी जैसे देश के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच के ताना-बाना को पूरी तरह से तोड़ देगा। इसका सबसे ज्यादा नुकसान दलित-पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को ही होगा। जातिवाद गलत है, लेकिन प्रति जातिवाद भी गलत है।
बीटेक की डिग्री लेकर कोई शानदार नौकरी करने के बजाय कुलकर्णी ट्रेड यूनियन में कूद गए थे। एक समय के चर्चित साप्ताहिक अखबार के कार्यकारी संपादक की जिम्मेदारी निभाते हुए राजनीति के करीब आए और प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के साथ पीएमओ में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई।
प्रस्तुत हैं आईआईटी मुंबई के हाल के घटनाक्रम पर दैनिक जागरण के महाराष्ट्र ब्यूरो प्रमुख ओमप्रकाश तिवारी से हुई उनकी बातचीत के प्रमुख अंश-
आईआईटी मुंबई में पिछले 21 वर्षों में 14 छात्रों ने आत्महत्या की है। साहिल वाकोड़े की आत्महत्या के बाद आपने एक लंबी अपील जारी की। इसकी वजह क्या रही?
ऐसी घटनाओं के बारे में अखबारों और मीडिया के जरिए पता चलता है, तो बहुत पीड़ा होती है। किसान आत्महत्या करते हैं, यह हम पढ़ते रहते हैं, लेकिन जब 18-20 साल का नौजवान, जो मेहनत करके आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी जगह बनाता है, एक-दो साल बाद अपनी जिंदगी खत्म कर लेता है, तो बहुत तकलीफ होती है।
मैं आईआईटी मुंबई का छात्र रहा हूं। साहिल की आत्महत्या के बारे में पता चला, तो मुझे अपने समय की घटनाएं याद आईं। मैंने 1975 में आईआईटी में प्रवेश लिया था। उस समय भी मेरे हास्टल के दो छात्रों ने आत्महत्या की थी। उनमें कोई दलित नहीं था। एक बहुत अमीर पारसी परिवार का छात्र भी था, जो पढ़ाई में अच्छा था।
बीटेक के बाद उसे अमेरिका की कार्नेल यूनिवर्सिटी में प्रवेश मिला था। उसने भी आत्महत्या कर ली थी। साहिल की घटना ने इन पुरानी यादों को ताजा कर दिया। इसी पीड़ा में मैंने अपील जारी की।
साहिल की आत्महत्या के बाद आईआईटी के भीतर और बाहर जो घटनाक्रम हुआ, उसे आप किस रूप में देखते हैं?
मेरी पीड़ा का एक कारण इस घटना को जातिवाद का मामला बना देना भी है। आइआइ के प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला को निशाना बनाया जा रहा है। संस्थान में मेरे अनेक मित्र हैं। मैंने उनसे बात की। उनका कहना है कि दुल्ला बेहतरीन प्रोफेसरों में हैं। वह दो कार्यकाल तक डीन स्टूडेंट अफेयर्स भी रहे हैं।
सभी छात्रों की समस्याएं सुलझाना और उनकी देखभाल करना इस पद की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह जिम्मेदारी दो बार निभाई है। मेरी जानकारी में ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है कि उन्होंने किसी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया हो। हालांकि, मामले की जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है।
खबरें आई हैं कि आत्महत्या से पहले साहिल ने अपनी एक मित्र से फोन पर बात की थी। बातचीत में उसने पेपर खराब होने और गलती होने की बात कही थी। इस बातचीत में जातिगत प्रताड़ना का उल्लेख नहीं था। इसे आप कैसे देखते हैं?
यह अहम सवाल है। एक माहौल बनाया जा रहा है कि जाति के आधार पर प्रताड़ना के कारण साहिल ने आत्महत्या की। जांच पूरी नहीं हुई है, इसलिए मीडिया में आई खबरों पर मैं टिप्पणी नहीं करना चाहता, लेकिन आईआईटी मुंबई सहित देश के सभी आईआईटी में एससी/एसटी वेलफेयर सेल हैं। इनका उद्देश्य है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों के साथ अन्याय या भेदभाव हो, तो वे शिकायत कर सकें।
साहिल ने इस सेल में शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। एफआइआर में कई महीनों से प्रताड़ना की बात कही गई है। यदि ऐसा था, तो साहिल, उसके मित्र या उसके माता-पिता शिकायत कर सकते थे। उनके माता-पिता का कहना है कि बेटा तीन-चार महीने से जातिगत प्रताड़ना की बात कर रहा था। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या उन्होंने संस्थान को कोई लिखित शिकायत दी थी?
आईआईटी मुंबई में दलित छात्रों और प्रोफेसरों का भी एक समूह है। क्या वहां शिकायत नहीं की जा सकती थी?
आईआईटी में आंबेडकर-पेरियार-फुले मंच काफी सक्रिय माना जाता है। यह मंच भेदभाव के मामलों पर नजर रखता है। इससे जुड़े कुछ प्राध्यापक इंटरनेट मीडिया पर भी सक्रिय रहते हैं। यदि साहिल या उसके मित्रों को प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा था, तो उन्होंने शिकायत क्यों नहीं की? मंच के पास शिकायत आती, तो वह उसे एससी/एसटी वेलफेयर सेल तक ले जा सकता था।
जब आप आईआईटी में पढ़ते थे, तब जातिगत भेदभाव के आरोपों और आंबेडकर-पेरियार आंदोलन की क्या स्थिति थी?
उस समय आंबेडकर-पेरियार-फुले मंच नहीं था। आंबेडकरवाद की चर्चा भी आज जैसी नहीं होती थी। यह बदलाव तो मंडल आयोग के बाद अधिक दिखाई दिया। मैंने आईआईटी में पांच साल पढ़ाई की। इस दौरान किसी प्राध्यापक को जाति के नाम पर भेदभाव करते नहीं देखा। विद्यार्थियों के बीच भी ऐसा कोई बड़ा भेदभाव नहीं दिखा। हालांकि, आरक्षित श्रेणी से आने वाले विद्यार्थियों को पढ़ाई और नए माहौल में ढलने में परेशानी होती थी।
आईआईटी का पाठ्यक्रम अंग्रेजी में था और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए इसे अपनाना कठिन होता था, लेकिन शैक्षणिक कठिनाइयों और जातिगत भेदभाव में अंतर है। मेरा मानना है कि किसी इक्का-दुक्का घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं करना चाहिए। इसका नुकसान अंततः दलित और आदिवासी विद्यार्थियों को भी हो सकता है।
साहिल की घटना के बाद फैकल्टी फोरम ने पहले प्रोफेसर दुल्ला का समर्थन किया, लेकिन अब उसके सदस्य बोलने से कतरा रहे हैं। इसकी वजह क्या है?
घटना के बाद आईआईटी के लगभग 700 फैकल्टी सदस्यों के मंच फैकल्टी फोरम ने दुल्ला के समर्थन में बयान जारी किया। उसमें कहा गया कि परीक्षा के दौरान उन्होंने प्रोफेसर के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वहन किया था।
संस्थान के नियमों के अनुसार परीक्षा में स्मार्टफोन ले जाना और सवालों के जवाब खोजने या लिखने के लिए एआई का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है। फोरम ने दुल्ला के समर्थन में दो बयान जारी किए हैं, जिन्हें वापस नहीं लिया गया है। आईआईटी दिल्ली, मद्रास और अन्य संस्थानों के फैकल्टी फोरम ने भी उनका समर्थन किया है। मुझे जानकारी मिली है कि फैकल्टी फोरम को ऊपर से निर्देश दिया गया कि वह इस मामले पर बात न करे।
यदि जांच पूरी होने तक संस्थान के लोग बयान न दें, तो इसे समझा जा सकता है। लेकिन कुछ प्राध्यापक इंटरनेट मीडिया पर जातिगत अन्याय के आरोप लगा रहे हैं। उन पर कोई पाबंदी क्यों नहीं लगाई जा रही है। जांच पूरी होने तक उन पर भी पाबंदी लगनी चाहिए।
प्रोफेसर दुल्ला पर एससी/एसटी एक्ट लगाया गया है और उन्हें छुट्टी पर भी भेज दिया गया है। इस पर आपकी क्या राय है?
मैंने अपनी अपील में इसका विरोध किया है। न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि जब तक दोष साबित न हो, व्यक्ति निर्दोष है। लेकिन यहां जांच शुरू होने से पहले ही उन्हें दोषी मान लिया गया। यह कहां का न्याय है ?
मेरी अपील का शीर्षक था-‘ स्टाप मिस यूज आफ एससीएसटी एक्ट इन आईआईटीज’ यानी आईआईटी जैसे संस्थानों में एससी एसएटी एक्ट का दुरुपयोग बंद हो। मेरा मानना है कि एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग केवल आईआईटी में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में रुकना चाहिए।
क्या आपको लगता है कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है?
आज आईआईटी के एक प्रोफेसर पर एससी/एसटी एक्ट लगने की चर्चा पूरे देश में हो रही है, लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार या छत्तीसगढ़ के किसी छोटे गांव में किसी व्यक्ति पर यह कानून लगता है और उसे जेल जाना पड़ता है, तो उसके बारे में कोई बात नहीं करता।
मेरा दावा है कि इस कानून के तहत दोषसिद्धि की दर बहुत कम है। कुछ राज्यों में यह सात-आठ प्रतिशत तक बताई जाती है। इसका अर्थ है कि कई मामलों में आरोप साबित नहीं हो पाते। लेकिन आरोप लगने के बाद व्यक्ति और उसके परिवार की बदनामी होती है। उसे जेल जाना पड़ सकता है और अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
इससे उसकी जिंदगी प्रभावित होती है। दलितों और आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए यह कानून जरूरी है। लेकिन यदि इसका दुरुपयोग होता है, तो उसे रोकना भी जरूरी है। कानून का इस्तेमाल किसी को प्रताड़ित करने के हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए।
इस कथित दुरुपयोग का समाज पर क्या असर पड़ रहा है?
इसका नुकसान दलित समाज को भी उठाना पड़ सकता है। दूसरे लोगों के मन में डर पैदा हो सकता है और वे उनसे दूरी बनाने लग सकते हैं। कर्नाटक में एक व्यक्ति ने मुझसे कहा कि वह दलित को अपनी संपत्ति बेचना नहीं चाहता।
उसका तर्क था कि यदि कोई विवाद हुआ, तो उस पर एससी/एसटी एक्ट लगा दिया जाएगा। कुछ लोग दलितों को घर किराये पर देने से भी कतराने लगे हैं। यह स्थिति समाज में अविश्वास बढ़ा सकती है। कानून का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना है, न कि ऐसा भय पैदा करना जिससे सामाजिक संबंध प्रभावित हों।
शिक्षण संस्थानों में इसका क्या असर हो सकता है?
यदि किसी शिक्षक पर एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होता है, तो दूसरे शिक्षकों के मन में भी आशंका पैदा हो सकती है। वे सोच सकते हैं कि आरक्षित श्रेणी के विद्यार्थी से दूरी रखना ही सुरक्षित है। इससे शिक्षक और छात्र के बीच सहज संबंध प्रभावित होंगे। आईआईटी मुंबई में छात्र और फैकल्टी एक ही परिसर में रहते हैं।
छात्र अक्सर अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रोफेसरों के घर भी जाते थे। वहां का माहौल गुरुकुल जैसा था। यदि शिक्षकों के मन में शिकायतों का डर बैठ गया, तो वे छात्रों से बातचीत करने में भी हिचकेंगे। किसी छात्र के फेल होने पर भी शिक्षक के खिलाफ जातिगत भेदभाव की शिकायत हो सकती है। इसका नुकसान विद्यार्थियों को ही होगा।
आपने अपनी अपील में ‘रिवर्स कास्टिज्म’ की बात कही है। यानी प्रति जातिवाद...इसे कैसे समझेंगे?
मैंने इस शब्द का इस्तेमाल सोच-विचार कर किया है। मेरा कहना है कि जातिवाद गलत है और उसके नाम पर दूसरों के साथ अन्याय करना भी गलत है। एससी/एसटी एक्ट दलितों और आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए बनाया गया है। इसकी जरूरत है।
लेकिन यदि इसका दुरुपयोग करके किसी दूसरे व्यक्ति के साथ अन्याय किया जाता है, तो क्या वह भी भेदभाव या ‘रिवर्स कास्टिज्म’ (प्रति जातिवाद) नहीं है ? मेरा मानना है कि ‘जातिवाद’ गलत है, और ‘प्रति जातिवाद’ भी गलत है। लोगों को लगेगा कि मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि मैं स्वयं ब्राह्मण हूं, लेकिन मैं स्वयं को ब्राह्मण नहीं मानता। मैं स्वयं को सिर्फ एक हिंदू मानता हूं।
क्या आईआईटी की घटना को चर्चित ‘यूजीसी एक्ट’ से जोड़कर देखा जा सकता है?
मेरा मानना है कि विश्वविद्यालयों से संबंधित यूजीसी के नियमों और एससी/एसटी एक्ट के बीच ज्यादा अंतर नहीं है। इसी कारण यूजीसी के नियमों का विरोध हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसीलिए इस पर स्थगन लगाया है।
आईआईटी, आइआइएम और कोटा जैसे शिक्षा केंद्रों से छात्रों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं। इसके पीछे किस तरह का दबाव है?
जब मैंने आईआईटी मुंबई में पढ़ाई की थी, तब देश में पांच आईआईटी थे। बीएचयू को भी आईआईटी का दर्जा मिलने के बाद इनकी संख्या छह हुई। आज देश में 23 आईआईटी हैं। विद्यार्थियों की संख्या भी बहुत बढ़ी है। यह आवश्यक है, क्योंकि जनसंख्या और शिक्षा की अपेक्षाएं बढ़ी हैं। लेकिन विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के साथ शिक्षकों की संख्या भी बढ़नी चाहिए।
आंकड़ों के अनुसार, 23 आईआईटी में 38.1 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली हैं। देश के पहले आईआईटी खडगपुर में यह रिक्ति 50 प्रतिशत बताई जाती है। जब शिक्षकों के इतने पद खाली होंगे, तो उन पर काम का दबाव भी बढ़ेगा। हम केवल छात्रों के तनाव की बात करते हैं, लेकिन शिक्षकों पर बढ़ते दबाव को भी समझना होगा।
क्या यही कारण है कि निजी विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ रही है?
हां, यह भी एक कारण है। गरीब परिवार भी कर्ज लेकर अपने बच्चों को निजी विश्वविद्यालयों में पढ़ने भेजते हैं।
आईआईटी की घटना के बाद राजनीतिक दलों ने परिसर के बाहर प्रदर्शन किए। इसे कैसे देखते हैं?
जाति के आधार पर समाज को बांटने की राजनीति से शिक्षण संस्थानों का माहौल प्रभावित हो सकता है। यदि हर व्यक्ति को उसकी जाति और उपजाति से पहचाना जाएगा, तो विद्यार्थियों के बीच संबंधों पर असर पड़ेगा।
कैंपस में छात्रों का सबसे बड़ा सहारा उनके मित्र होते हैं। जातिगत विभाजन बढ़ने पर विद्यार्थी अपने ही समुदाय के लोगों तक सीमित हो सकते हैं। इससे उनका सामाजिक सहयोग तंत्र कमजोर होगा।
क्या ऐसी घटनाओं और आंदोलनों का आईआईटी जैसे संस्थानों की गुणवत्ता पर असर पड़ता है?
आईआईटी की तकनीकी शिक्षा की दुनिया में पहचान है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है। चीन ने विदेशों में पढ़ने और काम करने वाले अपने प्रतिभाशाली प्रोफेसरों, विज्ञानियों और शोधकर्ताओं को वापस बुलाने के लिए अभियान चलाया। उन्हें बेहतर सुविधाएं दी गईं। इससे वहां के विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता और वैश्विक रैंकिंग में सुधार हुआ है।
भारत में भी विदेशों में काम कर रहे अनेक भारतीय मूल के प्रोफेसर वापस आना चाहते हैं। लेकिन यदि वे आईआईटी मुंबई जैसे संस्थान में किसी प्रोफेसर पर एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की खबर देखते हैं, तो आने से पहले सोचेंगे। इसका असर देश के शैक्षणिक संस्थानों पर पड़ सकता है।
क्या यह सही है कि आईआईटी मुंबई में बीटेक के दौरान आप दो बार असफल हुए थे? कैसे उबरे?
हां, बिलकुल। यह बात सही है कि उन दिनों में भी रिजर्वेशन कैटेगरी से विद्यार्थी आते थे और उन्हें तालमेल बिठाने में तकलीफ होती थी। एक तो आईआईटी का पूरा पाठ्यक्रम अंग्रेजी में होता है और दूसरा ग्रामीण परिवेश...तकलीफ होगी ही होगी। उनको क्यों भाई, मुझे स्वयं बहुत तकलीफ हुई। मेरी प्राथमिक शिक्षा कन्नड़ में हुई थी।
मैं कर्नाटक में सेकेंड टापर था, लेकिन यहां आकर दो साल तक फेल होता रहा। अवसादग्रस्त हो गया। तो उन्हें तो तकलीफ होगी ही, लेकिन मैंने यह कभी नहीं देखा कि ये हमारे नहीं हैं, ये इस जाति के हैं या उस जाति के हैं।
आज भी छात्रों में मुझे लगता है कि कोई इक्का-दुक्का ही ये सब करता होगा, लेकिन इसको बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया जाना चाहिए। तूल नहीं देना चाहिए। क्योंकि इसका नुकसान उन्हीं दलित और आदिवासी समाज के छात्रों को होता है।
