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संघ किसी सत्ता या शक्ति का भूखा नहीं, बल्कि समाज के सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण के लिए समर्पित- मोहन भागवत

Published: Sat, 07 Feb 2026 10:19 PM (IST)Updated: Sun, 08 Feb 2026 07:25 AM (IST)

मोहन भागवत ने मुंबई में संघ के शताब्दी वर्ष समारोह में कहा कि संघ सत्ता का भूखा नहीं, बल्कि समाज ...और पढ़ें

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत। (रॉयटर्स)

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राज्य ब्यूरो, मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कि संघ किसी सत्ता या शक्ति का भूखा नहीं है, बल्कि समाज के सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण के लिए समर्पित है। शनिवार को मुंबई में आयोजित '100 वर्ष की संघ यात्रा - नए क्षितिज' व्याख्यान माला के अवसर पर देशवासियों को संबोधित किया।

संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में नेहरू सेंटर, वर्ली में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ किसी सत्ता या शक्ति का भूखा नहीं है, बल्कि समाज के सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण के लिए समर्पित है। डॉ. भागवत ने कहा कि संघ की तुलना दुनिया के किसी अन्य संगठन से नहीं की जा सकती।

उन्होंने एक संस्कृत श्लोक उद्धृत करते हुए कहा कि जैसे आकाश की तुलना केवल आकाश से और समुद्र की समुद्र से की जा सकती है, वैसे ही संघ भी अपनी तरह का अनूठा संगठन है। उन्होंने जोर दिया कि संघ को दूर से या सतही रूप में नहीं समझा जा सकता, इसे जानने के लिए इसका हिस्सा बनना और इसका अनुभव लेना आवश्यक है।

डॉ. भागवत ने संबोधन में स्पष्ट किया कि 'हिंदू' शब्द को किसी संकीर्ण दायरे में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक सभ्यतागत पहचान है और इस देश में रहने वाले सभी लोग इसी व्यापक सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारी माता है और इसका विकास युवाओं की देशभक्ति पर टिका है।

शताब्दी वर्ष के संकल्पों को दोहराते हुए सरसंघचालक ने 'पंच परिवर्तन' पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हर हिंदू परिवार को अपने जीवन में पांच महत्वपूर्ण बदलाव अपनाने चाहिए।

इनमें पहला है विदेशी वस्तुओं के बजाय स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देना। दूसरा है परिवारों में भारतीय संस्कारों और संवाद को बढ़ावा देकर कुंटुंब प्रबोधन करना। तीसरा, जातिगत भेदभाव को पूरी तरह समाप्त कर समाज को एकजुट करना। चौथा, प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीना, और पांचवां नागरिक अनुशासन, अर्थात देश के कानूनों और नागरिक कर्तव्यों का पालन करना।

इस दो दिवसीय कार्यक्रम में उद्योग, कला, साहित्य और खेल जगत की 1200 से अधिक हस्तियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज के प्रभावशाली वर्गों को संघ की विचारधारा और पिछले 100 वर्षों के कार्यों से अवगत कराना था। अपने भाषण के अंत में डॉ. भागवत ने आह्वान किया कि भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए हमें अपने आचरण और चरित्र से उदाहरण पेश करना होगा, ना कि केवल भाषणों से। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य सबके लिए है, क्योंकि संघ सबका है।