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'डिग्री खोए हुए अंग की भरपाई नहीं कर सकती', MACT ने मुंबई की बीटेक ग्रेजुएट युवती को दिलाया 3 करोड़ का मुआवजा

Published: Wed, 21 Oct 2026 09:34 AM (IST)

मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने मुंबई की एक बीटेक ग्रेजुएट स्नेहल जांजुरणे को बस दुर्घटना में दाहिना हाथ गंवाने पर लगभग 3 करोड़ का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

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डिजिटल डेस्क, मुंबई। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल(एमपीएससी) ने अहम फैसला सुनाते हुए निजी बस के मालिक और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया है कि वे दुर्घटना का शिकार हुई स्नेहल जांजुरणे को ब्याज सहित लगभग 3 करोड़ का मुआवजा संयुक्त और अलग-अलग रूप से अदा करें।

ट्रिब्यूनल की सदस्य गौरी कवडीकर ने स्पष्ट किया कि छात्रा तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी डिग्री पूरी कर ले, उसके दांए हाथ के खोने की भरपाई किसी भी तरह से नहीं कर सकता। न्यायाधिकरण ने माना कि यह हादसा बस चालक की तेज गति और लापरवाही से गाड़ी चलाने के कारण हुआ था।

डिग्री पूरी करने से हाथ गंवाने का दर्द कम नहीं होता: ट्रिब्यूनल

बीमा कंपनी ने दलील दी थी कि स्नेहल ने फर्स्ट क्लास से बी.टेक की पढ़ाई पूरी कर ली है और वह एमपीएससी परीक्षा की तैयारी कर रही हैं, इसलिए उनकी कमाई की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा है।

न्यायाधिकरण ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि भले ही दावेदार ने मजबूत इच्छाशक्ति, दृढ़ संकल्प और समर्पण दिखाते हुए फर्स्ट क्लास में बी.टेक पूरा किया हो, लेकिन छात्रा के ये व्यक्तिगत गुण किसी भी तरह से उसके दाहिने हाथ के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते।

अदालत ने कहा कि किसी अंग का कटना न केवल शारीरिक घाव छोड़ता है, बल्कि गहरा मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और मानसिक आघात भी पहुंचाता है। इससे शारीरिक क्षमता में गिरावट, आत्मसम्मान और सामाजिक जीवन पर सीधा असर पड़ता है।

क्या है पूरा मामला?

दावे के अनुसार, 18 जून 2019 को लगभग 1:45 बजे स्नेहल सतारा से सूरत की जा रही थीं, स्नेहल उस समय 20 वर्ष की थी। वेस्टर्न एक्सप्रेसवे पर तेज रफ्तार के चलते चालक ने नियंत्रण खो दिया और बस पलट गई। हादसे के बाद उन्हें बोरीवली के भगवती अस्पताल, सतारा के भोसले अस्पताल और हड़पसर के जेड प्लस एक्सीडेंट अस्पताल में भर्ती कराया गया।

मामले में ममता नगर पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता और मोटर वाहन अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। सूरत और सतारा के सिविल सर्जनों द्वारा जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्रों और डॉक्टरों की गवाही के आधार पर अदालत ने माना कि पीड़िता को 65% स्थायी दिव्यांगता का सामना करना पड़ा है।

बीमा कंपनी की आपत्तियां हुईं खारिज

बस मालिक ओमप्रकाश सदवानी के खिलाफ 27 जून 2023 को एकपक्षीय कार्रवाई की गई थी। इसके बाद बीमा कंपनी ने दावा खारिज कराने के लिए कई दलीलें पेश कीं। कंपनी का आरोप था कि चालक के पास वैध लाइसेंस नहीं था, बस का परमिट समाप्त था और दावेदार के पास बस का टिकट भी मौजूद नहीं था।

न्यायाधिकरण ने इन सभी तर्कों को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि वाहन के पास 13 मई 2019 से 12 मई 2024 तक का वैध परमिट था और बीमा कंपनी लाइसेंस की अनुपस्थिति साबित करने के लिए आरटीओ के किसी भी अधिकारी को गवाह के तौर पर पेश करने में विफल रही।

साथ ही एफआईआर, केस डायरी और घटना स्थल के पंचनामे से स्नेहल के दावों की पुष्टि हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस के पास चालक को झूठा फंसाने का कोई कारण नहीं था।

मुआवजे का निर्धारण कैसे किया गया?

ट्रिब्यूनल ने इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग से स्नातक के आधार पर स्नेहल की मासिक आय 25000 तय की। इसके तहत 60% फंक्शनल दिव्यांगता मानी गई, 18 का मल्टीप्लायर लगाया गया और भविष्य की संभावनाओं के लिए 40% की बढ़ोतरी जोड़ी गई।

कुल मुआवजे में विवाह की संभावनाओं के नुकसान के लिए ₹5 लाख और शारीरिक विकृति के लिए ₹2 लाख भी शामिल किए गए। इसके अलावा दर्द और पीड़ा, सुविधाओं की हानि, चिकित्सा व्यय, विशेष आहार, और वाहन खर्च का मुआवजा भी दिया गया।

भविष्य के कृत्रिम अंग के लिए ऑटोबॉक (चेंबूर) के काउंसलर की गवाही पर गौर किया गया, जिसके मुताबिक हर पांच साल में कृत्रिम अंग को बदलने की जरूरत होती है। छात्रा की उम्र और जीवन प्रत्याशा को ध्यान में रखते हुए अदालत ने जीवनकाल में 9 बार कृत्रिम अंग बदलने और उनके रखरखाव का पूरा खर्च भी मुआवजे में शामिल किया।