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'विकास की प्रक्रिया में समाज के अंतिम व्यक्ति को केंद्र में रखना जरूरी', यवतमाल में बोले मोहन भागवत

Published: Tue, 29 Sep 2026 08:25 PM (IST)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने यवतमाल में कहा कि विकास का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति का कल्याण होना चाहिए, जिसे 'अंत्योदय' कहते हैं।

विकास का लाभ सभी तक पहुंचना चाहिए। (पीटीआई)

विकास का लाभ सभी तक पहुंचना चाहिए। (पीटीआई)

HighLights

  1. विकास का उद्देश्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण हो।

  2. अंत्योदय का अर्थ है अंतिम व्यक्ति को अधिकतम सुखी बनाना।

  3. किसानों के कल्याण के साथ भूमि की उर्वरता बनाए रखें।

राज्य ब्यूरो, मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि विकास का उद्देश्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण होना चाहिए। विकास की प्रक्रिया में समाज के अंतिम व्यक्ति को केंद्र में रखना जरूरी है।

देश की वास्तविक खुशहाली तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन में भी सुख और समृद्धि आए। विकास के उच्चतम और निम्नतम स्तर के बीच की खाई यथासंभव कम होनी चाहिए।

महाराष्ट्र के यवतमाल में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भागवत ने अंत्योदय की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि समाज के अंतिम व्यक्ति को अधिकतम सुखी बनाना ही ‘अंत्योदय’ है। समाज का अंतिम व्यक्ति जितना अधिक खुश होगा, देश भी उतना ही खुशहाल होगा। इसी को अंत्योदय कहते हैं।

विकास का अर्थ यह नहीं है कि समाज के सभी लोग एक ही स्तर पर पहुंच जाएं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह विकास की उस अवधारणा को स्वीकार नहीं करते थे, जिसमें अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण करने की बात कही जाती है।

उनका मानना था कि विकास का लाभ सभी तक पहुंचना चाहिए। भागवत ने महात्मा गांधी के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसमें किसी भी निर्णय के समय समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के हितों को ध्यान में रखने की बात कही गई है।

भागवत ने कहा कि विकास के तहत प्रत्येक व्यक्ति की भोजन, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए। इसके साथ ही सभी को शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए। समाज में दूसरों का आतिथ्य करने और जरूरतमंदों की सहायता करने की भावना भी विकसित होनी चाहिए। स्पष्ट किया कि विकास प्रकृति की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

किसानों के कल्याण के साथ भूमि की उर्वरता बनाए रखने पर दिया जोर

कृषि क्षेत्र का उल्लेख करते हुए भागवत ने किसानों के कल्याण के साथ भूमि की उर्वरता बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने मिश्रित और जैविक खेती, पशुपालन तथा बीज, खाद और कीटनाशकों के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की आवश्यकता बताई।

कहा कि कृषि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे किसान कर्ज के जाल में न फंसें और आत्मनिर्भर बन सकें। समाज के विकास की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। इसमें पूरे समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सादगीपूर्ण जीवन और जनसेवा के प्रति समर्पण को याद करते हुए कहा कि उनका एकात्म मानववाद कोई नई अवधारणा नहीं है। यह हमारी पूर्ववर्ती पीढ़ियों की जीवनशैली से निकला विचार है, जिसे व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से अपनाया जा सकता है।