धर्मेद्र जोरे, मिड-डे। महाराष्‍ट्र में जारी सियासी संकट में नित नए मोड़ आ रहे हैं। आए दिन ऐसे वाकये हो रहे हैं जिनको लेकर तरह तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत ने गुरुवार को जब यह बयान दिया कि एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायक अगर वापस लौटे तो पार्टी एमवीए से अलग होने पर विचार करेगी तो राकांपा, कांग्रेस के साथ-साथ शिवसेना के कुछ निष्ठावान नेताओं को भी आश्चर्य हुआ कि क्या यह पूरा नाटक शिवसेना और भाजपा के पुनर्मिलन के लिए रचा गया है।

क्‍या कहती हैं एमवीए खेमे की सुगबुगाहटें

राउत के बयान के बाद भले ही राकांपा और कांग्रेस ने राजनीतिक संकट में अंतिम क्षण तक शिवसेना का साथ देने का संकल्प व्यक्तत किया है, लेकिन एमवीए खेमे में इस बात की अटकलें लगाई जा रही हैं कि इतनी बड़ी संख्या में विधायक अपने नेतृत्व के खिलाफ आखिर क्यों जाएंगे। अफवाहें कहती हैं कि यह पूरा प्रकरण शिवसेना-भाजपा के पुनर्मिलन के लिए रचा गया है।

कांग्रेस और राकांपा खेमों को झटका

अपील और चेतावनी मिश्रित राउत के बयान से कांग्रेस और राकांपा खेमों को गहरा झटका लगा। अजीत पवार ने कहा कि वह शिवसेना नेतृत्व से पूछेंगे कि क्या उनके दिमाग में ऐसी ही बात है।

शिवसेना में इतनी बड़ी बगावत पहले कभी नहीं हुई

कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने भी स्पष्टीकरण की मांग की। लेकिन इन अटकलों को इस तथ्य से बल मिला है कि शिवसेना में इतनी बड़ी बगावत पहले कभी नहीं हुई, वो भी तब जबकि वह सत्ता में है।

दोनों के लिए हाथ मिलाना संभव नहीं

वहीं कुछ लोगों ने कहा कि पिछले ढाई साल में शिवसेना और भाजपा के बीच जैसे हालात रहे उसके कारण दोनों के लिए हाथ मिलाना संभव नहीं था क्योंकि दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ काफी कुछ कहा और काम किया। अतीत की तरह न तो भाजपा और न ही शिवसेना चीजों को सुलझा सके।

यह शिवसेना का नहीं, भाजपा का काम

शिवसेना की पहली जीवनी लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलकर कहते हैं, वर्तमान स्थिति से पहले के घटनाक्रमों पर गौर करें तो बगावत की पटकथा निश्चित रूप से भाजपा ने लिखी है, शिवसेना ने नहीं। पटकथा पर पिछले ढाई साल से काम चल रहा होगा।

शिवसेना ने बदले तेवर

अकोलकर ने कहा, यह मान लेना किसी की भी कल्पना से परे है कि भाजपा की ओर से काफी अपमान और हमलों के बाद ठाकरे इस नाटक में मौन पक्ष बन सकते हैं। मैं तो कहूंगा कि शिवसेना ने अपने रुख में सुधार किया है। अपने पिता के कठोर तरीकों के उलट, जिन्होंने बगावत का झंडा बुलंद करने वालों जैसे छगन भुजबल, गणेश नाइक और नारायण राणे को तत्काल बर्खास्त कर दिया था, उद्धव ने शिंदे और अन्य बागियों से निपटने में समझौते का रुख अपनाया है। 

Edited By: Krishna Bihari Singh