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महाराष्ट्र में सूखे के बीच उम्मीद की किरण बन रहा ‘जलतारा रिचार्ज मॉडल’

By Omprakash TiwariEdited By: Garima Singh
Published: Tue, 29 Sep 2026 05:47 PM (IST)Updated: Tue, 29 Sep 2026 05:53 PM (IST)

महाराष्ट्र में सूखे की गंभीर स्थिति के बीच, डॉ. पुरुषोत्तम वायाळ द्वारा विकसित 'जलतारा रीचार्ज मॉडल' भूजल संरक्षण की एक नई उम्मीद बनकर उभरा है।

डॉ. वायाळ ने 'जलतारा रीचार्ज मॉडल' से भूजल स्तर बढ़ाया

डॉ. वायाळ ने 'जलतारा रीचार्ज मॉडल' से भूजल स्तर बढ़ाया

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ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। महाराष्ट्र में इस वर्ष बारिश की कमी ने खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। राज्य सरकार ने 358 में से 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 18 सितंबर के बीच महाराष्ट्र में 755.9 मिमी बारिश हुई, जबकि इस अवधि में सामान्य वर्षा 932.3 मिमी होती है। यानी राज्य में सामान्य से 18.8 प्रतिशत कम बारिश हुई है। मराठवाड़ा समेत कई क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर रही है।

ऐसे चुनौतीपूर्ण दौर में मराठवाड़ा के जालना जिले से विकसित हुआ ‘जलतारा रीचार्ज मॉडल’ भूजल संरक्षण की दिशा में उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आया है।

आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन तथा जलतारा सेव ग्राउंड वॉटर फाउंडेशन से जुड़े किसान-पुत्र और शोधकर्ता डॉ. पुरुषोत्तम वायाळ द्वारा वर्ष 2020 में खोजे गए इस वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) मडल का मूल उद्देश्य है बारिश के पानी को खेत से बाहर बहने देने के बजाय अधिकतम मात्रा में जमीन के भीतर पहुंचाना और भूजल का पुनर्भरण करना।

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'जलतारा रीचार्ज मॉडल' से भूजल स्तर बढ़ाया

डॉ. वायाळ ने कोविड काल में वर्ष 2020 में अपने गांव के खेत में इस माडल का पहला प्रयोग किया। उन्होंने खेत के उस स्थान पर, जहां बारिश का पानी हर वर्ष बहकर दूसरे खेतों की ओर चला जाता था, पांच फुट लंबा, पांच फुट चौड़ा और छह फुट गहरा रीचार्ज पिट बनवाया। इसमें लगभग साढ़े पांच फुट तक बड़े पत्थर भरे गए।

पहली ही बारिश में प्रयोग का परिणाम सामने आया। पूरे खेत से बहकर आने वाला पानी इस रीचार्ज पिट में समाने लगा और खेत से बाहर जाने वाले पानी की मात्रा कम हो गई।

इसके बाद खेत के कुएं के जलस्तर में आसपास के कुओं की तुलना में उल्लेखनीय अंतर दिखाई दिया। खेत की मिट्टी का कटाव भी कम हुआ और रबी की फसल के लिए मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रही।

इसी सफल प्रयोग को डा. वायाळ ने ‘जलतारा रीचार्ज मॉडल’ का नाम दिया। इसके बाद उन्होंने अपने खेत के प्रत्येक ऐसे स्थान पर रीचार्ज पिट तैयार किए, जहां बारिश का पानी बहकर खेत से बाहर निकल जाता था।

जलतारा माडल की विशेषता इसकी सरलता और कम लागत है। सामान्य क्षेत्र में प्रत्येक एकड़ में एक रीचार्ज पिट तथा आवश्यकता के अनुसार अधिक पिट बनाए जा सकते हैं।

पहाड़ी और ढलान वाले क्षेत्रों में जलप्रवाह के अनुसार दो-तीन या उससे अधिक रीचार्ज पिट भी बनाए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य किसी एक खेत तक सीमित न रहकर पूरे गांव के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल को जमीन के भीतर पहुंचाना है।

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डा. वायाळ के अनुसार, यदि किसी गांव के पूरे क्षेत्र में इस प्रकार के रीचार्ज पिट बनाए जाएं तो बारिश के चार महीनों में बड़ी मात्रा में पानी जमीन के भीतर पहुंचता है।

इससे धीरे-धीरे भूजल स्तर ऊपर आता है और कुओं तथा नलकूपों में पानी की उपलब्धता लंबे समय तक बनी रह सकती है। अपने खेत में सफलता मिलने के बाद डा. वायाळ ने इस माडल को आसपास के किसानों और गांवों तक पहुंचाने का काम शुरू किया। उनके अनुसार महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में अब तक पांच लाख से अधिक जलतारा रीचार्ज पिट तैयार किए जा चुके हैं और इससे हजारों किसान लाभान्वित हुए हैं।

जालना जिले की परतूर-मंठा तहसील के पांढुर्णा गांव में भी इस माडल को बड़े पैमाने पर अपनाया गया। किसान परमेश्वर शिंदे के अनुसार, गांव में 750 जलतारा सोक पिट तैयार किए गए हैं।

इसके बाद गांव में पानी की उपलब्धता में बदलाव महसूस किया गया है। ग्रामीणों के अनुसार, जिस क्षेत्र में दिसंबर तक कुएं सूखने लगते थे, वहां पिछले कुछ वर्षों में टैंकरों पर निर्भरता में कमी आई है।

डॉ. वायाळ द्वारा उपलब्ध कराए गए जीआईएसटी (GIST) इम्पॅक्ट असिस्टमेंट सर्वेक्षण अध्ययन के अनुसार, परतूर-मंठा क्षेत्र के एक गांव में जलतारा माडल लागू किए जाने के बाद एक वर्ष पश्चात इसके प्रभाव का आकलन किया गया।

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अध्ययन में एक बारिश के मौसम के बाद भूजल स्तर में 14 फुट तक की वृद्धि, भूमि में 58 प्रतिशत नमी, किसानों की आय में 120 प्रतिशत तक वृद्धि, रबी मौसम की फसल में 42 प्रतिशत वृद्धि, रोजगार में 88 प्रतिशत वृद्धि तथा 100 प्रतिशत फसल एवं मृदा संरक्षण जैसे परिणाम दर्ज किए जाने का दावा किया गया है।

हालांकि इन आंकड़ों को व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले विभिन्न क्षेत्रों और अलग-अलग भूगर्भीय परिस्थितियों में स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा इन परिणामों का सत्यापन महत्वपूर्ण हो सकता है।

एक साथ चार समस्याओं का समाधान

1- बारिश का पानी खेत से तेजी से बहकर बाहर निकलने के बजाय जमीन में पहुंचता है, जिससे भूजल पुनर्भरण होता है।
2- तेज बारिश के दौरान पानी के बहाव से होने वाला मृदा कटाव कम होता है और उपजाऊ मिट्टी खेत में बनी रहती है।
3- जमीन के भीतर नमी बढ़ने से खेत की जैविक गतिविधियों और मिट्टी की प्राकृतिक उत्पादकता के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होता है।
4- अत्यधिक वर्षा का पानी सीधे नदियों, नालों और बांधों की ओर जाने से कुछ हद तक रोका जा सकता है, जिससे खेतों और मिट्टी को नुकसान से बचाने में मदद मिल सकती है।

दो फसल से बहुफसली खेती की ओर

डा. वायाळ का कहना है कि भूजल के लगातार गिरते स्तर के कारण किसान अक्सर खरीफ और रबी की दो फसलों तक सीमित रह जाता है। खरीफ की आमदनी कई बार लागत निकालने में ही चली जाती है और रबी तक खेत में पर्याप्त नमी तथा कुओं में पानी नहीं बचता। जलतारा माडल का लक्ष्य इसी चक्र को बदलना है।

उनका कहना है कि यदि एक गांव के पूरे क्षेत्र में वर्षाजल का पुनर्भरण व्यवस्थित तरीके से किया जाए तो भूजल स्तर में वृद्धि के साथ खेतों में नमी लंबे समय तक रह सकती है। इससे किसान अधिक फसलें लेने की स्थिति में आ सकता है और कृषि आय बढ़ने की संभावना बनती है।

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‘कम खर्च, सरल तकनीक और पूरे क्षेत्र का पुनर्भरण’

डा. वायाळ के अनुसार, जलतारा रीचार्ज पिट माडल देश को जल-सुरक्षित और जल-समृद्ध बनाने की दिशा में सरल, कम खर्चीला, तकनीकी रूप से व्यावहारिक और कम समय में बड़े क्षेत्र में लागू किया जा सकने वाला माडल है।

उनका मानना है कि जल संकट का स्थायी समाधान केवल नए बांध बनाने या बाहर से पानी लाने में नहीं, बल्कि जहां बारिश होती है, वहीं उसके पानी को जमीन के भीतर सुरक्षित करने में है।

खेत की मेड़, जलप्रवाह की दिशा और प्राकृतिक ढलान को ध्यान में रखकर यदि हर गांव के जलग्रहण क्षेत्र में रीचार्ज पिटों का नेटवर्क तैयार किया जाए तो वर्षाजल का बड़ा हिस्सा स्थानीय भूजल तंत्र में वापस पहुंचाया जा सकता है।