अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस: बुजुर्गों को सहारा ही नहीं देते, अपनेपन का अहसास भी कराते हैं ये ‘वृद्ध मित्र’
वृद्ध मित्र पहल बुजुर्गों को अकेलापन दूर कर भावनात्मक और व्यावहारिक सहारा देती है, जिससे वे अपने घरों में सम्मान से रह सकें।

बुजुर्गों को सहारा ही नहीं देते, अपनेपन का अहसास भी कराते हैं ये ‘वृद्ध मित्र’।
HighLights
वृद्ध मित्र पहल बुजुर्गों को अकेलापन दूर करने में मदद करती है।
संस्था स्वास्थ्य, दवा और दैनिक जरूरतों में सहायता प्रदान करती है।
यह पहल देशभर में 63,000 से अधिक बुजुर्गों तक पहुंची है।
ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। पढ़ाई, रोजगार और नौकरी के सिलसिले में बच्चे तो दूसरे शहर और विदेश में जाकर स्थापित हो जाते हैं, लेकिन पीछे छूट जाते हैं नाते-रिश्ते और बुजुर्ग माता-पिता। वे माता-पिता, जिनके लिए कभी ये बच्चे ही पूरी दुनिया हुआ करते थे।
उम्र के उत्तरार्द्ध में जब अपनों की मौजूदगी कम हो जाती है तो आर्थिक सुरक्षा के बावजूद अकेलापन ही इनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरता है। इस स्थिति में ये चाहते हैं कि कोई दो बातें करने वाला हो, दवा दे देने वाला हो, अस्पताल तक साथ चलने वाला हो या कुछ देर पास बैठ कर अपनेपन का अहसास कराने वाला हो।
ऐसे में अपनों से दूर इन बुजुर्गों के जीवन में ‘वृद्ध मित्र’ बनकर पहुंच रही है एक संस्था। ये संस्था न सिर्फ इनकी देखभाल करती है, इनकी जरूरतों को पूरा करने के साथ अपनत्व का अहसास भी कराती है।
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सोसायटी ऑफ कम्युनिटी हेल्थ ओरिएंटेड ऑपरेशनल लिंक्स संस्था की ‘वृद्ध मित्र’ इकाई के वॉलंटियर्स अकेले रहने वाले बुजुर्गों के घर पहुंचते हैं। उनका हालचाल लेते हैं। उनकी जरूरतों को समझते हैं और आवश्यकता के अनुसार सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं से जोड़ने से लेकर दवा, अस्पताल और रोजमर्रा की जरूरतों में मदद तक करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वॉलंटियर्स उनके संपर्क में बने रहते हैं, ताकि किसी परेशानी के समय बुजुर्गों को मदद के लिए अकेले इंतजार न करना पड़े।
वर्ष 2018 में पुणे में 600 बुजुर्गों के साथ शुरू हुई यह पहल अब देशभर में करीब 63 हजार बुजुर्गों तक पहुंच चुकी है। पुणे में यह संख्या 36 हजार तक पहुंच गई है।

मुंबई में 2800 बुजुर्ग इससे जुड़े हैं, जबकि भोपाल, ग्वालियर, वाराणसी, दिल्ली, खैरथल (अलवर) और लखनऊ में भी करीब चार-चार हजार बुजुर्गों तक संस्था की पहुंच है। यानी महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक बुजुर्गों के लिए समुदाय आधारित सहारे का यह नेटवर्क लगातार विस्तार ले रहा है।
डॉ. बेनजीर पाटिल, सीईओ, सोसायटी ऑफ कम्युनिटी हेल्थ ओरिएंटेड ऑपरेशनल लिंक्स का कहना है कि बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में बच्चों के दूसरे शहरों या विदेश में बस जाने से बड़ी संख्या में माता-पिता पीछे रह जाते हैं।

आर्थिक रूप से संपन्न बुजुर्ग भी भावनात्मक अभाव से जूझते हैं। वहीं, गरीब और बीमार बुजुर्गों के लिए अकेलेपन की चुनौती और कठिन हो जाती है। दवा लाने, अस्पताल जाने, राशन जुटाने और रोजमर्रा के काम तक के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है। इन्हीं बुजुर्गों की सहारा बनती है हमारी संस्था।
अनुप्रिता दीक्षित, संस्था की प्रकल्प सलाहकार का कहना है कि ऐसे बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम समाधान नहीं हो सकता। दरअसल, अधिकांश बुजुर्ग अपना घर और परिचित परिवेश छोड़ना नहीं चाहते। वे अपने ही घर में सम्मान के साथ जीवन बिताना चाहते हैं। ‘वृद्ध मित्र’ इसी सोच के साथ उनके घर तक पहुंचकर देखभाल और साथ उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं।

देखभाल से आगे सम्मान का रिश्ता
सोसायटी ऑफ कम्युनिटी हेल्थ ओरिएंटेड ऑपरेशनल लिंक्स ने बुजुर्गों की देखभाल को केवल चिकित्सा या जरूरत की सहायता तक सीमित न रखते हुए समुदाय आधारित व्यवस्था विकसित करने की पहल की है। संस्था नीति आयोग के साथ मिलकर बुजुर्गों की देखभाल से जुड़ी नीतियों और प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में भी सहयोग कर रही है।
प्रयास ऐसा तंत्र विकसित करने का है, जिसमें बुजुर्ग अपने घर और परिचित परिवेश में ही सम्मान के साथ जीवन जी सकें। उम्र बढ़ने के साथ सहारे की जरूरत स्वाभाविक है, लेकिन किसी बुजुर्ग के लिए इससे बड़ी पीड़ा कुछ नहीं कि वह खुद को दूसरों पर बोझ समझने लगे।
ऐसे में नियमित रूप से किसी का हाल पूछना, उनकी बात सुनना और जरूरत के समय साथ खड़ा होना उनके भीतर सुरक्षा और सम्मान का भाव मजबूत करता है।
देश में तेजी से बढ़ रही बुजुर्ग आबादी
देश में जीवन प्रत्याशा लगातार बढ़ी है। 1872-1881 के दौरान देश में औसत आयु करीब 24.5 वर्ष थी, जो अब बढ़कर करीब 70.2 वर्ष से अधिक हो गई है। इसके साथ बुजुर्ग आबादी भी तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 1901 में देश में करीब 1.2 करोड़ बुजुर्ग थे, जो 2001 में बढ़कर 7.5 करोड़ हो गए। आने वाले वर्षों में इसमें और तेजी से वृद्धि का अनुमान है।
2050 तक देश की करीब 21 प्रतिशत आबादी के 60 वर्ष से अधिक आयु की होने का अनुमान है। ऐसे में बुजुर्गों की देखभाल केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, समाज के सामने उभरती बड़ी जरूरत भी है।
दरअसल, इस पहल की खासियत सिर्फ यह नहीं कि किसी बुजुर्ग की दवा पहुंच गई या उसे अस्पताल तक ले जाया गया। असली जरूरत उस भरोसे की भी है कि कोई उनका हाल पूछने वाला है, उनकी बात सुनने वाला है और जरूरत पड़ने पर उनके साथ खड़ा होगा।
जिन रिश्तों में दूरी आ गई है, उनके बीच ‘वृद्ध मित्र’ खून के रिश्ते का दावा नहीं करता, लेकिन इंसानियत और अपनत्व का रिश्ता जरूर बना रहा है। देखभाल और सेवा के इस रिश्ते में बुजुर्गों को यह भरोसा मिलता है कि उम्र के इस पड़ाव पर वे अकेले नहीं हैं।
