मुंबई, ओमप्रकाश तिवारी। गोवा की विधानसभा के लिए चुनाव 14 फरवरी यानी वेलेंटाइन डे को होना है। लेकिन उसके पहले ही गोवा में टिकट के तमाम दावेदार और विधायक नए-नए दलों में पाला बदलते दिखाई दे रहे हैं। गोवा में अब तक दस विधायक और मंत्री पार्टियां बदल चुके हैं। सबसे तगड़ा झटका भारतीय जनता पार्टी को लगा है, जहां उसके एक साथ एक मंत्री और दो विधायक कांग्रेस में चले गए।

भाजपा का ग्रामीण और ईसाई चेहरा माने जाने वाले मंत्री माइकल लोबो ने यह कहते हुए पार्टी छोड़ दी कि अब वहां जगह नहीं रही, तो प्रसाद गांवकर और प्रवीण झांटये जैसे विधायक भी भाजपा को राम-राम कर चुके हैं। अब भाजपा स्वयं को बचाने के लिए फिर से कांग्रेस एवं अन्य दलों से लोगों को तोड़ने में लगी है। वह भी अब तक अन्य दलों से चार विधायक तोड़ चुकी है। इस जोड़-तोड़ के खेल से इतना तो साफ हो गया है कि इस बार भी किसी को बहुमत नहीं मिलने वाला है और चुनाव के बाद ये तोड़-फोड़ और तेज होगी। दरअसल, गोवा में चुनाव के पहले और चुनाव के बाद पाला बदलने की परंपरा बहुत पुरानी है। इसलिए यहां कोई मुख्यमंत्री शायद ही अपना कार्यकाल पूरा कर पाता है।

इस बार का चुनाव भाजपा के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि एक तो उसके पास अब पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर र्पीकर जैसा चेहरा नहीं है, दूसरा वर्तमान मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत का कद इतना बड़ा नहीं हो पाया है कि वह भाजपा की नैया अपने दम पर पार लगा ले जाएं। उधर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी हर रोज किसी न किसी नेता को शामिल करके माहौल बना रही हैं। गोवा में यह पहला मौका है जब कुल मिलाकर सात पार्टियां चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में हर कोई किसी न किसी पार्टी से उम्मीदवार बन सकता है। लेकिन इस सबका नुकसान यह हो रहा है कि गोवा के चुनावी मुद्दे और गोवा की जनता के प्रति प्रतिबद्धता जैसी बातें अब नेपथ्य में चली गई हैं। जबकि पूर्व की अस्थिरता से ऊब चुकी राज्य की जनता को एक स्थिर और काम करने वाली सरकार की दरकार है।

ओमिक्रोन की दहशत के कारण गोवा में इस बार 40 फीसद पर्यटक भी नहीं पहुंचे हैं। किनारों पर रंगीन होने वाले शेक और कसीनों से लेकर क्लब तक सब सूने पड़े हैं। इस बार गोवा का मशहूर सनबर्न भी नहीं होगा और न ही गोवा कार्निवाल की रौनक होगी। गोवा देश का वह राज्य है, जो आजादी के 14 वर्षो बाद भारतीय गणराज्य का हिस्सा बना। वर्ष 1961 में गोवा मुक्ति आंदोलन के साथ ही यहां पुर्तगाल का शासन समाप्त हुआ। मार्च 1510 में अलफांसो द अल्बुकर्क के आक्रमण के बाद से यहां पुर्तगाली राज करने लगे थे। मराठा शासकों ने कई बार हमले किए। लेकिन जीत नहीं पाए। ब्रिटिश सरकार से समझौते के कारण पुर्तगाली शासन कायम रहा।

आखिर 19 दिसंबर 1961 को भारत सरकार की मदद से ‘आपरेशन विजय’ के साथ ही गोवा को मुक्ति मिली और वह भारतवर्ष का हिस्सा बन सका। केवल 40 सदस्यीय विधानसभा वाला यह राज्य आरंभिक वर्षो को छोड़कर लगातार राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है। यहां हर दल में टूट-फूट होना सामान्य बात रही है। अब फिर से फरवरी में चुनाव होने हैं और इस बार दो नए राजनीतिक दलों- आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के जमकर मैदान में उतरने के कारण लड़ाई दिलचस्प हो गई है। पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत नहीं मिला और कांग्रेस 17 विधायकों के साथ बहुमत के करीब थी। लेकिन सरकार भारतीय जनता पार्टी के मनोहर र्पीकर ने बना ली और कांग्रेस अपने केंद्रीय नेतृत्व की निष्क्रियता के कारण देखती रह गई। बाद में कांग्रेस के 11 और विधायक भी टूटकर भाजपा में चले गए।

इस सबके बीच गोवा और यहां के लोग कई परेशानियों से जूझ रहे हैं। पिछले लगभग दो वर्षो से कोविड महामारी के कारण यहां के लोगों को सबसे ज्यादा रोजगार देनेवाला पर्यटन उद्योग ठप हो गया है, तो दूसरी तरफ तीन वर्षो से सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि माइनिंग बंद होने के कारण सरकार की तिजोरी भी खाली और विकास कार्य ठप पड़े हैं। ऐसे में रोजगार और माइनिंग फिर से शुरू करने का मुद्दा सबसे बड़ा है।

असल में गोवा में माइनिंग एक उलझा हुआ मुद्दा है। वर्ष 2012 में चुनाव के लिए मनोहर र्पीकर ने इसे मुद्दा बनाया था और फिर माइनिंग को बैन कर दिया था। बाद में कुछ समय के लिए माइनिंग चालू हुई। लेकिन फिर 2018 में बैन हो गई। तब से इन खदानों को फिर से शुरू करने का मुद्दा बना हुआ है। गोवा में खनन का काम आजादी से पहले पिछली सदी के चौथे दशक में उस समय की पुर्तगाल सरकार के दिए गए पट्टों से शुरू हुआ था। बाद में आजादी के बाद इनको नियमित कर दिया गया। गोवा के खान मालिकों का कहना है कि उनको पूरे देश की तरह ही कानून के तहत दूसरा लीज एक्सटेंशन दिया जाए। यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। गोवा के लोग चाहते हैं कि इन खदानों के लीज एक्सटेंशन का मुद्दा संसद में संबंधित विधेयक लाकर सुलझाया जाए, ताकि लोगों को तुरंत रोजगार मिल सके।

वास्तव में गोवा की जीडीपी का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा माइनिंग रेवेन्यू से आता था और इसके साथ ही लौह अयस्कों की प्रति टन बिक्री का करीब 35 प्रतिशत राजस्व के तौर पर मिलता था। इसके साथ ही सभी कंपनियों को गोवा मिनरल फंड में पैसा देना जरूरी है, ताकि गांवों में सुविधाओं का विकास हो सके। लेकिन माइनिंग बंद होने का बड़ा असर गोवा की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। यही कारण है कि इस चुनाव में राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ माइनिंग का मुद्दा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

[मुंबई ब्यूरो प्रमुख]

Edited By: Sanjay Pokhriyal