यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 18, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
यह है देश का पहला लेडीज स्पेशल स्टेशन माटुंगा
स्टेशन पर गाड़ी का रुकना, यात्रियों का उसमें चढऩा-उतरना आम है, लेकिन माटुंगा स्टेशन पर नजारा थोड़ा बदला हुआ होता है।

मुंबई के माटुंगा रेलवे स्टेशन पर अब तैनात है महिला ब्रिगेड। मुस्तैदी से ट्रेन की आवाजाही सुनिश्चित करती हुईं और यात्रियों की हर मुश्किल का ध्यान रखती हुईं। यह देश का पहला लेडीज स्पेशल स्टेशन है। यहां हर किसी की निगाहें ठिठकती जरूर हैं। अपनी जिम्मेदारियों को अंजाम दे रही महिलाएं भी गौरवान्वित हैं। स्वर्णिम इतिहास का हिस्सा बनकर सभी खुश हैं......
मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन से लाखों लोग रोजाना यात्रा करते हैं। स्टेशन पर गाड़ी का रुकना, यात्रियों का उसमें चढऩा-उतरना आम है, लेकिन माटुंगा स्टेशन पर नजारा थोड़ा बदला हुआ होता है। टिकट काउंटर से लेकर सुरक्षा तक का जिम्मा महिलाएं संभाल रही हैं। महिला सशक्तिकरण की ओर बढ़ा यह कदम यात्रियों को भी सुहा रहा है। आते-जाते इसका जिक्र उनकी जुबान पर होता है। कुछ यात्रीगण महिला स्टाफ को विशेष रूप से बधाई देने आते हैं और उनके कार्य की सराहना करते हैं।

निडर होकर किया काम
दादर और सायन के मध्य में स्थित इस लेडीज स्पेशल स्टेशन पर पांच महिला सुरक्षा कर्मी समेत 34 महिला कर्मियों का स्टाफ है। यहां की स्टेशन प्रबंधक हैं ममता वी. कुलकर्णी। मुंबई डिवीजन की पहली महिला स्टेशन मास्टर होने का गौरव भी उन्हें ही प्राप्त हुआ था। ममता की आदर्श पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी रही हैं। उनकी इच्छा किरण की तरह साहसिक काम करने की थी। पुलिस के बजाय उन्हें यह मौका रेलवे में मिला। रेलवे स्टेशन की चुनौतियों के बारे में ममता कहती हैं, स्टेशन पर काम करना आसान नहीं होता। हर पल गुजरती गाडिय़ां, कान फोड़ू हॉर्न। उस पर हर मिनट होती घोषणाएं कानों को
सुकून नहीं लेने देतीं। फिर भी कर्मचारी हंसते मुस्कुराते अपनी सेवाएं देते हैं। ड्यूटी के बाद वे शोर-शराबे से दूर रहना पसंद करते हैं।
ममता के अनुसार केबिन में काम करने पर दस से बारह फोन होते हैं। ट्रेन के हॉर्न अलग-अलग संकेत देते हैं। उन्हें पहचानना भी आना चाहिए। कोई दुर्घटना हो गई है या जंजीर खीची गई है। सबके हॉर्न के संकेत अलग होते हैं। स्टेशन पर थोड़ा रिलैक्स है। यहां पर फोन ज्यादा नहीं होते। ट्रेन और स्टेशन का सुपरविजन होता है, मगर हर पल सजग रहना पड़ता है। हम ड्यूटी छोड़कर नहीं जा सकते हैं। हमें सुख-दुख भुलाकर काम करना होता है। एक बार में मैं ड्यूटी पर थी। तब खबर मिली कि मेरे ससुर का निधन हो गया है। इस दुखद खबर को सुनने के बाद भी तुरंत घर नहीं जा सकती थी। दो घंटे बाद मुझे रिलीव मिला, तब मैं घर जा पाई थी। महिलाओं की टीम के साथ काम करके बेहद खुश हैं ममता।
उनकी ख्वाहिश है कि इसी स्टाफ के साथ अपने रिटायरमेंट तक काम करें। वह कहती हैं, अर्से बाद मुझे महिलाओं के साथ काम का अवसर मिला है। इससे पहले मैंने सिर्फ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। यहां महिलाओं के होने से हम आपसी सुख-दुख भी आपस में बांट लेते हैं।
स्टेशन नया जिम्मेदारी पुरानी
महिला स्टेशन बनने से जिम्मेदारियों में फर्क आने से चीफ बुकिंग सुपरवाइजर (सीबीएस) नीता इंकार करती हैं। वह भी पिछले 25 वर्षों से रेलवे में सेवारत हैं। उनके मुताबिक महिलाओं के एकसाथ काम करने से परिवार सरीखा माहौल है। वह कहती हैं, जिम्मेदारियां नई नहीं हैं। मैं पिछले आठ साल से इस पद पर कार्यरत हूं। यहां हर जिम्मेदारी महिलाओं के कंधे पर है। काम में वे एक-दूसरे का पूरा सहयोग कर रही हैं। थोड़े दिन पहले रात में करीब डेढ़ बजे एक टिकट बुकिंग क्लर्क को दौरा आया। प्वाइंटमैन ने उसकी जानकारी हमारी सीनियर मैडम को दी। उन्होंने तुरंत दूसरे स्टेशन से महिला क्लर्क को भेजा। वह माहिम से उन्हें रिलीव करने आर्इं। उन्होंने काउंटर संभाला। रात में ड्यूटी के बाद भी वह शाम की ड्यूटी में आईं, ताकि बीमार क्लर्क अपना इलाज करा सके। यह सब महिला होने के कारण ही संभव हो सका।
यात्रियों की करती हैं मदद
पहले महिला टिकट चेकर की भूमिका मुख्य रूप से महिला यात्री का टिकट चेक करने की होती थी। अब वे पुरुष यात्रियों के भी टिकट चेक कर रही हैं। माटुंगा स्टेशन के आसपास स्कूल-कॉलेज ज्यादा हैं। लिहाजा छात्रों का आवागमन ज्यादा होता है। चीफ टिकट इंस्पेक्टर अस्मिता मांजरेकर के मुताबिक उनकी भूमिका सिर्फ जुर्माना वसूलने तक नहीं रही है। कई बार उन्होंने यात्रियों की मदद भी की है। वह बताती हैं, मांटुगा में अभी तक गंभीर समस्या से नहीं जूझना पड़ा है, मगर पुराने कई मामले अभी भी हमारे जेहन में ताजा हैं। एक बार एक महिला को बेटिकट यात्रा करते पकड़ा।
उसके चेहरे पर काफी चोटें थीं। उसने जुर्माना भरने से इंकार कर दिया, जबकि उसके पास पैसे थे। बहुत पूछने पर फूट-फूटकर रोने लगी। उसने बताया कि पति मारपीट करता है। वह घर से भागी है। हमने कहा पुलिस में शिकायत करो तो उसने कहा कि मेरा पति खुद पुलिस में है। मेरी फरियाद नहीं सुनी जाएगी। हमने उसे एक एनजीओ का नंबर दिया। इस प्रकार की परेशानियां महिलाओं के साथ ही साझा हो सकती हैं। अधिकारियों से मिलने वाले सहयोग का वह विशेष रूप से जिक्र करती हैं। वह बताती हैं कि टिकट चेकिंग के दौरान अलर्ट रहना पड़ता है। कई बार लोग डरकर भागने लगते हैं। मुझे याद है कि मैं हार्बर लाइन के 'रे रोड पर कार्यरत थी। वहां पर कुछ समस्या हो गई थी। एक यात्री ने हंगामा खड़ा कर दिया था। अचानक से भीड़ इकट़ठा हो गई थी। हम मुट़ठीभर स्टाफ थे। हम पर पत्थरबाजी होने लगी, अत: हम कमरा बंद करके बैठे रहे। जब हमारे अधिकारियों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने तुरंत आरपीएफ को भेजा। फिर हमें सुरक्षित निकाला गया। यहां पर भी सभी अधिकारियों का हमें पूरा सहयोग मिल रहा है।
महिला ने खींचा मंगलसूत्र
हेड टीसी बागेश्री खोपडे भी पिछले 25 साल से रेलवे में कार्यरत हैं। वह भी अपने खट्टे-मीठे अनुभवों को साझा करती हैं। वह कहती हैं, एक बार एक मां बेटी का मैंने टिकट चेक किया। अचानक से मां ने मेरा मंगलसूत्र खींच लिया। मैं कुछ समझ पाती कि वह टूटकर बिखर चुका था। सिर्फ उसका पेंडेंट मेरे हाथ में रह गया था। मैंने पूछा यह क्या किया? मैंने तो सिर्फ टिकट मांगा था। हमारी दोपहर की ड्यूटी थी। इस
मामले को सुलझाने में रात हो गई। फिर उसके परिजन आए। उन्होंने बताया कि वह मानसिक रूप से विक्षिप्त है। ऐसी भी चुनौतियां पेश आई हैं। पिछले दो दशक में रेलवे की सेवाओं में काफी बदलाव आया। वहीं
यात्रियों में बदलाव को इन महिलाओं ने नोटिस किया। अस्मिता भी कहती हैं, हमारे वक्त में 50 रुपये फाइन होता था। वह बड़ी रकम लगती थी। फिर भी लोग शांतिपूर्वक भर देते थे। अब जुर्माने की राशि बढ़कर
250 रुपये है। हालांकि अब लोग आक्रामक हो गए हैं। कुछ यात्री तो अभद्रता पर उतर आते हैं।
सुरक्षा में मुस्तैद
माटुंगा स्टेशन की सुरक्षा की बागडोर महिला आरपीएफ बखूबी संभाल रही हैं। उनकी तैनाती के बाबत सीनियर डीएससी सचिन भलोद कहते हैं, महिला स्टेशन बनाने के दौरान महिला कांस्टेबल की तैनाती सुनिश्चित हुई थी। महिला कांस्टेबल को शुरुआती ट्रेनिंग उनके पुरुष समकक्ष की तरह प्रदान की जाती है। वे किसी मामले में उनसे कमतर नहीं होतीं। वे हर प्रकार की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं। विकट स्थिति आने पर दादर स्टेशन निकट है, जहां से उन्हें तत्काल सहायता मुहैया कराई जाएगी।
यात्री भी हैं खुश
लेडीज स्पेशल स्टेशन बनने से पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ है। स्थानीय लोग भी इस उपलब्धि से गौरवान्वित महसूस करते हैं। महिला स्टाफ को बधाई देने पहुंचे पुरुष यात्री वसंता हरूर कहते हैं, यह उम्दा पहल है। कई और स्टेशन की बागडोर महिलाओं को सौंपी जानी चाहिए। महिलाएं ज्यादा आर्गेनाइज्ड रहती हैं। मैं अक्सर माटुंगा आता-जाता हूं। मैं आते-जाते चीजों को ऑब्जर्व करता हूं। मैंने इन
सभी महिलाओं को ड्यूटी पर मुस्तैद पाया है। एक बार देखा कि एक टीसी ने स्टाफ बोलने वाले का कार्ड भी चेक किया। मुझे यह देखकर खुशी हुई।
स्मिता श्रीवास्तव
