मुंबई, एएनआइ। रमजान का पाक माह अब खत्‍म होने को है। 5 जून को ईद है। इस माह में रोजा रखना हर किसी के लिए जरूरी होता है। इसके अपने नियम कायदे हैं, जिन्‍हें मानना होता है। यह नियम कुछ सख्‍त होते हैं। यदि कोई इस माह में रोजा नहीं रख पाता है तो उसके लिए यह मायूसी का सबब बन जाता है। लेकिन कैसा हो यदि कोई इस मायूसी को खुशी में बदल दे। ये भले ही आपको किसी कहानी का हिस्‍सा लगता हो, लेकिन महाराष्‍ट्र के बुलढ़ाणा में ये हकीकत में सामने आया है। 

बुलढ़ाणा महाराष्‍ट्र के अमरावती जिले में आता है। यहां पर डिविजनल फॉरेस्‍ट ऑफिसर के रूप में तैनात हैं संजय एन माली। उनके ड्राइवर का नाम है जफर। जफर की इच्‍छा थी कि वह भी इस बार रोजा रखे, लेकिन उसकी खराब सेहत ने ऐसा नहीं होने दिया। दरअसल, माली ने जफर से 6 मई को ही इस बात की जानकारी रखी थी कि वह इस बार रोजा रखेंगे या नहीं। लेकिन जफर ने मायूस होकर बताया कि उसकी तबियत खराब है जिस वजह से वह इस बार रोजा नहीं रख सकेगा। इस पर उनके अधिकारी माली ने जो जवाब दिया उसको सुनकर किसी को भी गर्व होगा। माली ने जफर से कहा कि इस बार वह उसके लिए रोजा रखेंगे। माली ने अपनी कही बात पर अमल कर जिस आपसी सदभाव की मिसाल दी वह तारीफ के काबिल है। माली ने जो किया वही भारत की संस्‍कृति भी है, जहां सदियों से हिंदू-मुस्लिम साथ रहते आए हैं और हर सुख-दुख को आपस में बांटते रहे हैं।

इस्लाम धर्म में रमजान माह का खास महत्व है। मान्यता है कि इस माह में आसमान से पवित्र पुस्तक कुरान शरीफ को धरती पर लाया गया था। इसे बरकतों और रहमतों का पाक माह भी कहा जाता है। रमजान का महीना सब्र और सुकून का है। कुरान शरीफ में कई जगह रोजा रखने को जरूरी बताया गया है। हाजी जाकीर अली ने बताया कि खुदा के हुक्म से सन दो हिजरी से मुसलमानों पर रोजा अनिवार्य किया गया। इसका महत्व इसलिए बहुत ज्यादा है क्योंकि रमजान में शब ए कद्र के दौरान अल्लाह ने कुरान जैसी नेमत किताब दी। रमजान में जकात दान का खास महत्व है। किसी के पास अगर साल भर उसकी जरुरत से ज्यादा नगदी और सामान है तो उसका ढाई फीसदी दान के रूप में गरीबों और जरूरतमंदों के बीच बांट देना चाहिए।

क्या है रोजा
रोजा को अरबी भाषा में सौम कहा जाता है। सौम का मतलब होता है रूकना, ठहरना यानी खुद पर नियंत्रण या काबू पाना। यह वह महिना है, जब हम भूख को शिद्दत से महसूस करते है और सोचते है कि एक गरीब इंसान भूख लगने पर कैसा महसूस करता होगा। बीमार इंसान जो कुछ नहीं खा सकता उसकी बेबसी को महसूस करते है। रमजान के महीने में रोजा रखने पर यह तर्क दिया जाता है कि इस महिने में लोग खुद को बुरी आदतों से दूर रखते है। रोजा हमें सिखाता है कि हमें कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए। जिससे दूसरे को कष्ट हो। रोजा संयम और समर्पण का नाम है। रोजेदार को पता है कि इस माह में उनके द्वारा जो भी नेक काम किया जाएगा, उसका पुण्य 70 गुना ज्यादा मिलेगा। इसके माध्यम से पूरे साल जाने अनजाने में हुए गुनाह के लिए रोजेदार खुदा से माफी मांगते हैं। सलामती के लिए दुआ मांगी जाती है।

रमजान के नियम
रमजान के पवित्र माह में सहरी का विशेष महत्व है। सुबह सूरज निकलने से डेढ़ घंटे पहले जागना पड़ता है। कुछ खाने के बाद रोजा प्रारंभ होता है। शाम को सूरज डूबने के बाद रोजा खोला जाता है। इसके लिए समय निश्चित होता है। रमजान के दिनों में तरावीह की नमाज अदा की जाती है। यह समय रात्रि के लगभग नौ बजे का होता है।

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Posted By: Babita

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