मुंबई, प्रेट्र। Maharashtra: बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को भी कोविड से बचाव के टीकाकरण पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई जारी रखी। कोर्ट ने घर-घर जाकर टीकाकरण न करने की नीति पर केंद्र सरकार से पुनर्विचार करने के लिए कहा। हाईकोर्ट ने कहा कि इस बारे में केंद्र सरकार का रुख निराश करने वाला और संवेदनहीन है। बीएमसी भी उसी की राह पर चल रही है। दोनों का ध्यान वृद्धों और लाचारों की ओर नहीं है, जो टीका लगवाने के लिए वैक्सीनेशन सेंटर पर नहीं जा सकते। चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की पीठ ने कोविड-19 के टीकाकरण की प्रक्रिया के निर्धारण के लिए बने विशेषज्ञ दल के प्रमुख से कहा कि वह घर-घर जाकर टीकाकरण करने के मामले में केंद्र सरकार को सुझाव दें। इससे केंद्र सरकार उस पर निर्णय ले सकेगी। यह कार्य दो जून को होने वाली मामले की सुनवाई से पूर्व किया जाए।

अगर विशेषज्ञ दल अभियान को शुरू करने के लिए सकारात्मक फैसला लेता है तो फिर कोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा किए बगैर अभियान शुरू किया जाए। अभी इस तरह के अभियान के खिलाफ विशेषज्ञ दल का तर्क है कि इससे बड़ी मात्रा में वैक्सीन की बर्बादी होगी। साथ ही, जिस व्यक्ति को वैक्सीन दी जाएगी, उस पर उसका तात्कालिक नकारात्मक असर देखने के लिए इंतजाम नहीं हो पाएगा। अभी वैक्सीन दिए जाने के बाद वैक्सीनेशन सेंटर पर ही आधा घंटे तक व्यक्ति को बैठाकर उसका असर देखा जाता है। पीठ ने कहा कि जब ब्रिटेन में घर-घर जाकर टीकाकरण हो सकता है तो भारत में क्यों नहीं? इससे पहले बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (बीएमसी) ने कोर्ट में दाखिल शपथ पत्र में केंद्र सरकार के दिशानिर्देश के बगैर घर-घर जाकर टीकाकरण करने पर अपने हाथ खड़े कर दिए। कोर्ट ने बीएमसी के रुख पर नाखुशी जाहिर की।

समय देकर लोगों को वैक्सीन लगाई जाए

हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया है कि जो लोग कोविन पोर्टल के जरिये समय लेकर टीका लगवाना चाहें उन्हें वैक्सीनेशन सेंटर आने का समय दिया जाए और निर्धारित समय पर उन्हें टीका लगाया जाए। इससे वैक्सीनेशन सेंटर पर भीड़ नहीं लगेगी और लोग सुरक्षित तरीके से टीका लगवा सकेंगे।

कैदियों को भी लगाई जाए वैक्सीन

हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा है कि क्या जेल में बंद कैदियों को भी कोविड से बचाव का टीका लगाया जा रहा है ? अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो उसमें ढिलाई न बरती जाए और जेलों में भी टीकाकरण अभियान चलाया जाए। कैदियों को भी जीने का हक होता है।

Edited By: Sachin Kumar Mishra