मुंबई, प्रेट्र। बांबे हाई कोर्ट ने भीमा कोरेगांव मामले में बुधवार को वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को जमानत दे दी। सुधा को यूएपीए के प्रविधानों के तहत अगस्त 2018 में एलगार परिषद-माओवादी लिंक मामले में गिरफ्तार किया गया था। हालांकि कोर्ट ने वरवर राव, सुधीर धावले और वर्नोन गोंजाल्विस समेत आठ लोगों की याचिकाएं खारिज कर दीं।जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एनजे जमादार की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि भारद्वाज, जिन पर केंद्र सरकार के खिलाफ साजिश का हिस्सा होने का आरोप है, ऐसी जमानत की हकदार हैं। पीठ ने निर्देश दिया कि भायखला महिला जेल में बंद भारद्वाज को आठ दिसंबर को मुंबई की विशेष एनआइए अदालत में पेश किया जाए। उनकी जमानत शर्तें और रिहाई की तारीख अदालत तय करे। इस मामले में गिरफ्तार 16 लोगों में भारद्वाज पहली शख्स हैं, जिन्हें डिफाल्ट जमानत मिली है। वरवर राव फिलहाल मेडिकल जमानत पर बाहर हैं। स्टेन स्वामी की बीती पांच जुलाई को एक निजी अस्पताल में जमानत का इंतजार करते हुए मौत हो चुकी है। अन्य सभी, विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं।

गौरतलब है कि पेश से वकील सुधा भारद्वाज ने करीब तीन दशकों तक छत्तीसगढ़ में रहकर काम किया है। उन्होंने सुधा पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाया। अगस्त 2018 में पुणो पुलिस ने उन्हें भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा और माओवादियों से कथित संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया था। 1967 में पश्चिम बंगाल के एक गांव नक्सलबाड़ी में जमींदारों के खिलाफ हथियारबंद आंदोलन हुआ था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) यानी सीपीएम से अलग हुए एक धड़े ने नक्सल मूवमेंट के जनक माने जाने वाले चारू मजूमदार के नेतृत्व में यह संघर्ष चलाया था। उनका मानना था सीपीएम राजनीति इच्छा को लेकर मकसद से भटक गई है। बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन का दमन हो गया। हालांकि इस विचारधार से जुड़े लोग नक्सल कहलाए। वे खुद को नक्सलवादी धारा से जुड़ा मानते थे, इसलिए उन्हें नक्सल कहा गया। 2004 में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (माओवादी) का एक दस्तावेज आया। इसमें अर्बन प्रासपेक्टिव शब्द का उल्लेख किया गया और इसकी व्याख्या की गई। रणनीति के तहत शहरी क्षेत्रों में नेतृत्व तलाशने की कोशिश की जाती है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि माओवादी शहरों में अपना नेतृत्व तलाश रहे हैं।

Edited By: Sachin Kumar Mishra