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कान्हा अभयारण्य में बाघों पर CDV का खतरा बरकरार, 167 गांवों में कुत्तों के टीकाकरण के बाद भी 6 महीने में 9 बाघ मरे

By Sanjay Kumar SharmaEdited By: Ravindra Soni
Published: Mon, 19 Oct 2026 07:27 PM (IST)

कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) का खतरा बना हुआ है, इस साल 11 बाघों की मौत हुई ...और पढ़ें

बाघ शावक का शव। (फाइल फोटो)

बाघ शावक का शव। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. कान्हा में CDV से अप्रैल में हुई थी पहली मौत।

  2. इस साल अब तक 11 बाघ गवां चुके हैं जान।  

  3. रिजर्व से सटे गांवों में 3000 कुत्तों का टीकाकरण।

संजय कुमार शर्मा, उमरिया। कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघों की सुरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों के बावजूद कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) का खतरा कम नहीं हो रहा है। रिजर्व में इस वर्ष अब तक 11 बाघों की मौत हो चुकी है, जिनमें अप्रैल से अक्टूबर के बीच छह महीने में नौ बाघों की मौत वायरस के संक्रमण से हुई है। संक्रमण की रोकथाम के लिए बफर क्षेत्र के गांवों में हजारों आवारा कुत्तों का टीकाकरण और उन्हें बूस्टर डोज देने के बावजूद बाघों की मौत ने वन प्रबंधन की चिंता बढ़ा दी है।

हाल ही में 6 अक्टूबर को एक बाघिन और 18 अक्टूबर को एक बाघ शावक मृत मिला था। कान्हा प्रबंधन ने इन दोनों वन्यप्राणियों को दूसरे जंगलों से आया हुआ बताया है। मृत शावक को रिजर्व के बफर क्षेत्र से लगे वन विकास निगम के जंगल में स्थित अरौली गांव से पकड़ा गया था। इन घटनाओं के बाद संक्रमण के संभावित स्रोत को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।

तीन हजार कुत्तों का टीकाकरण, फिर भी नहीं थमा संक्रमण

कान्हा में 21 अप्रैल को सरही क्षेत्र में एक बाघ शावक की मौत के बाद CDV संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए अभियान चलाया गया था। इसके तहत टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र से लगे 167 गांवों में करीब तीन हजार आवारा कुत्तों का टीकाकरण कराया गया। लगभग एक महीने बाद इन कुत्तों को बूस्टर डोज भी दिए गए।

इसके बावजूद अक्टूबर में बाघिन और शावक की मौत हो गई। इससे संक्रमण की रोकथाम के लिए अपनाए जा रहे उपायों की प्रभावशीलता और वायरस के वास्तविक स्रोत का पता लगाने की जरूरत सामने आई है। प्रबंधन का मानना है कि संक्रमण बफर जोन के बाहर से भी आ सकता है, हालांकि इसके स्रोत की पुष्टि होना अभी बाकी है।

छोटे मांसाहारी वन्यजीव भी हो सकते हैं संक्रमण की कड़ी

वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. नितिन गुप्ता के मुताबिक, CDV के प्रसार में आवारा कुत्तों की भूमिका हो सकती है, लेकिन संक्रमण के स्रोत की तलाश केवल उन्हीं तक सीमित नहीं रखी जानी चाहिए। जंगल में रहने वाले छोटे मांसाहारी वन्यजीव भी संक्रमण की कड़ी हो सकते हैं। ऐसे में इन वन्यप्राणियों की जांच कर वायरस के संभावित स्रोत का पता लगाना जरूरी है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक संक्रमण के स्रोत और उसके फैलने के रास्तों की पहचान नहीं होगी, तब तक रोकथाम के उपायों की प्रभावशीलता का आकलन करना मुश्किल रहेगा।

जंगल में रिसर्च जरूरी

एक अन्य वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. अवध बिहारी श्रीवास्तव का कहना है कि CDV संक्रमण के स्रोत का पता लगाने के लिए जंगल के भीतर विशेष अनुसंधान किया जाना चाहिए। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि वायरस किन वन्यजीवों के माध्यम से फैल रहा है और बाघों तक इसका संक्रमण कैसे पहुंच रहा है।