इंदौर की रेल सुविधाओं की बात हो और वरिष्ठ अभिभाषक नागेश नामजोशी का जिक्र न हो तो विषय कभी पूरा नहीं हो सकता। बचपन से सामान्य बालक की तरह रेलवे के प्रति विशेष आकर्षण रखने वाले इस शख्स ने रेलवे में ऐसी महारत हासिल की कि तर्कों में वे अफसरों को भी चारों खाने चित कर देते हैं।

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पर्दे के पीछे रहकर दिन-रात शहर की रेल सुविधाओं को लेकर चिंतित रहने वाले 70 साल के नामजोशी के पास हर ट्रेन की शुरुआत को लेकर अलग कहानी है। 70 के दशक में रेलवे में सक्रिय हुए। तब वे मिल ऑनर्स एसोसिएशन के पदाधिकारी और जोनल रेल उपयोगकर्ता सलाहकार समिति के सदस्य रखबचंद भंडारी के पास अपने सुझाव लेकर जाते थे। भंडारी से उन्होंने सीखा कि किस तरह अफसरों से अपनी बात मनवाई जाती है? 1878 में मीटरगेज और 1956 में ब्रॉडगेज लाइन इंदौर आ चुकी थी। तब छोटी लाइन पर भाप के इंजन चलते थे जिनकी दिशा बदलने के लिए यहां टर्न टेबल नहीं थी।

नागेशजी ने तब छोटी-छोटी समस्याओं को दूर करने के लिए संघर्ष किया। इनमें प्लेटफॉर्म शेड का विस्तार, पीने के पानी का इंतजाम जैसे काम महत्वपूर्ण थे। उस समय इंदौर में मॉडर्न सिग्नलिंग सिस्टम नहीं था और ट्रेनों को सामने से आने वाली ट्रेनों के लिए घंटों खड़ा रहना पड़ता था। लगातार मांग के बाद रेलवे ने इंदौर में पुराना सिग्नलिंग सिस्टम हटाया, जिससे ट्रेनों और यात्रियों को काफी सुविधा हुई।

1956 में पहली लंबी दूरी की ट्रेन के रूप में इंदौर-बिलासपुर नर्मदा एक्सप्रेस शुरू होने के बाद शहर के लोग इंदौर को दिल्ली-मुंबई से जोड़ने की मांग कर रहे थे। तब इंदौर से रेल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए प्रीतमलाल दुआ, दिनकर सोमण और विमल झांझरी के साथ मिलकर नागेशजी ने पार्लियामेंट्री पिटीशन फाइल की जिस पर इंदौर के पक्ष में फैसला आया।

इसी बीच भोपाल-दिल्ली के बीच सांची एक्सप्रेस चलाने की घोषणा हुई। इंदौर के लोगों का प्रतिनिधिमंडल भोपाल गया, जहां अटलबिहारी वाजपेयी से भोपाल-सांची ट्रेन को इंदौर से चलाने की मांग की गई। तब अटलजी ने ऐलान किया कि यदि ट्रेन इंदौर से नहीं चली तो वे अनशन पर बैठ जाएंगे।

आखिरकार रेल मंत्रालय को झुकना पड़ा और 23 जनवरी 1983 को इंदौर से नई दिल्ली के बीच मालवा एक्सप्रेस शुरू हुई। इसके बाद 1 अप्रैल 1985 को इंदौर-मुंबई अवंतिका एक्सप्रेस शुरू हुई। 1992 में जयपुर-मुंबई ट्रेन चलाने की घोषणा हुई और अवंतिका को मुंबई सेंट्रल के बजाय बांद्रा पर टर्मिनेट किया जाने लगा। इसके खिलाफ दिनकर सोमण और नागेश नामजोशी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने रेलवे को आदेश दिए कि ट्रेन को बांद्रा के बजाय मुंबई सेंट्रल तक चलाया जाए।

दिलचस्प बात यह है कि रेलवे के फैसले से नाराज इंदौर के वकीलों ने तब रेलवे का केस लड़ने से मना कर दिया और रेलवे को जबलपुर से वकील लेकर आना पड़ा। 1989 में वर्तमान लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन पहली बार इंदौर की सांसद बनीं और नामजोशी रेलवे की मुख्य धारा से जुड़ते चले गए।

स्पीकर की मदद से उन्होंने इंदौर-नई दिल्ली के बीच रोजाना ट्रेन चलाने का प्रस्ताव मंत्रालय को दिया। इसी दौरान कोटा से दिल्ली के बीच नई ट्रेन चलाने का ऐलान हुआ जिसे काफी प्रयासों के बाद इंदौर से चलाया गया। 1993 में ब्रॉड गेज की पहली डेमू ट्रेन इंदौर-भोपाल के बीच शुरू हुई। नामजोशी लगातार अध्ययन कर नई ट्रेनों के प्रस्ताव देते रहे और महाजन उन्हें आगे बढ़ाती रहीं।

इसी का परिणाम है कि इंदौर एक-एक करके देश के सारे महानगरों से जुड़ता चला गया। अब हावड़ा, तिरुअनंतपुरम, देहरादून, हरिद्वार, नागपुर, उदयपुर, जोधपुर, छिंदवाड़ा, पटना, जबलपुर, ग्वालियर, कोटा, चंडीगढ़, यशवंतपुर, जम्मूतवी, वैष्णोदेवी, पुणे, बरेली, कोचूंवेली, गुवाहाटी, भुवनेश्वर, रायपुर, पुरी, लिंगमपल्ली, गांधी नगर, राजकोट और वेरावल से इंदौर जुड़ चुका है। आने वाले समय में बीकानेर, गोरखपुर के अलावा वे इंदौर-भोपाल नॉन स्टॉप इंटरसिटी ट्रेन चलाने के प्रयास में लगे हुए हैं।

By Krishan Kumar