इंदौर। नई दुनिया प्रतिनिधि: देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्ता विचार शून्य है। जब तक विचार नहीं होंगे तब तक शहर विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। विचारों का अकाल आ गया है। विचार है जो दिमाग को दुरुस्त रखने में काम आता है। किसी देश और शहर को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। शिक्षा चरित्र का निर्माण करती है। सब मानते हैं कि शिक्षा में परिवर्तन होना चाहिए लेकिन ये कोई नहीं बताया कि परिवर्तन क्या होना चाहिए। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि भारतीयों के पास शक्ति तो है लेकिन उन्हे उसका ज्ञान नहीं है। देश की विरासत, संस्कृति की जानकारी ही बच्चों को नहीं दी जाती। यह बात 'नईदुनिया" के अभियान माय सिटी माय प्राइड के अंतर्गत राउंड टेबल कांफ्रेंस में समाजसेवी मनीष गहलोत ने दिए।

उन्होंने बताया कि वे 20 सालों से अमेरिका में रह रहे हैं। वहां की शिक्षा का बारीकी से अध्यन किया है। जब भारत की शिक्षा पर गौर किया तो देखा कि सभी अपने बच्चे को अमेरिका भेजना चाहते हैं। दूसरे देशों में बच्चों की शिक्षा देने का तरीका दूसरा है, बच्चा खुद को पहचान ही नहीं पाता और उसे किताबों और स्कूल के होमवर्क से दबा दिया जाता है। जबकि अन्य देशों में सात साल तक बच्चा स्कूल नहीं जाता, जिससे बच्चे को अपना कैरेक्टर पहचानने में मदद मिलती है। इस आयोजन में शहर की सामाजिक संस्थाएं, वकील व सामाजिक संस्थाओं के अलावा कई अलग-अलग क्षेत्र में काम कर रहे लोगों ने हिस्सा लिया। इस दौरान शहर विकास के कई मुख्य पांच बिंदु शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था पर अपने सुझाव दिए।

 

रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लागएं
नर्मदा नदी का फ्लो पिछले वर्षों के अपेक्षा 23 प्रतिशत कम हुआ है। नर्मदा में पानी कम हुआ है, स्थिति खराब होती जा रही है। पानी नहीं होगा तो शहर खाली हो जाएगा। इसके साथ ही पानी का दोहन भी बहुत अधिक हो रहा है। कुछ प्रयोगों के द्वारा हमने पानी के इस दोहन को रोका है। 8 साल पहले के सर्वे में 134 फीसदी पानी उपयोग करते थे, लेकिन अब 101 पर आ गए हैं। इसका कारण है कि रेन वॉटर सिस्टम पर काम किया, जिससे पानी रीचार्ज होना शुरू हुआ। इसको लेकर नगर निगम को बड़े स्तर पर प्लानिंग करना होगी।

खाने में मिलावट बंद होना चाहिए
खाने में मिलावट होने के कारण शरीर कमजोर हो रहा है। एक समय था जब महाराणा प्रताप 150 किलो का कवच रखकर युद्द लड़ते थे, लेकिन अब स्थिति यह है कि लोग पांच किलो वजन लेकर एक किलोमीटर भी पैदल नहीं चल सकते। लोगों को साफ हवा नहीं मिल रही है, पेड़ खत्म हो रहे हैं। हमने भी 25 लाख पौधे ट्री गो कार्यक्रम के अंतर्गत लगाए हैं। इसकी पहल सभी को करना होगी, लोगों को आत्मनिर्भर बनना होगा। शराब या अन्य किसी भी प्रकार के नशे को छोड़ना होगा, तभी हमारा शहर विकसित शहर कहलाएगा।
सतीश शर्मा, समाजसेवी

विभाग बनाएं आपस में तालमेल
विभागों के आपसी तालमेल के कारण विकास में बहुत सी अड़चने आती हैं। बीच शहर में सड़क खोद दी जाती है, लेकिन मलवा उठाने वाली संस्था समय पर काम नहीं करती। लोगों को घर के सामने खुद ही मलवा साफ करना पड़ता है। बीच शहर में बीआरटीएस बना है, प्रशासन चाहता है कि इसका उपयोग लोग अधिक से अधिक करें, जिससे ट्रैफिक कम हो। समस्या ये है कि लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करना चाहते भी हैं लेकिन उन्हे अपना वाहन पार्क करने के लिए जगह नहीं मिलती। सड़क बनाने के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं।
निखिल दवे अध्यक्ष, मृत्युंजय भारत ट्रस्ट

लोगों में जागरूकता जरूरी
एमवाय शहर का सबसे बड़ा अस्पताल है, लेकिन उसका इस्तेमाल सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा होती है कि इनका इलाज ही सही तरीके से नहीं हो पाता। लोग एमवाय में जाने से डरते हैं। जरूरी है कि एमवाय जैसी बड़ी अस्पताल के बोझ को कम करने के लिए मोहल्लों में छोटे-छोटे अस्पताल खोले जाएं, यह प्रयोग अन्य देशों में सफर रहा है। यदि ऐसा हुआ तो लोगों को इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा।
अली असगर आरिफ, सेकेट्री, कैंसर केयर संस्था

नशा मुक्ति जरूरी
लोगों को नशे से मुक्त करना सबसे बड़ा दायित्व है। हमने इसके लिए प्रयास किए हैं। यह कैंसर जैसी बड़ी बीमारियों को जन्म देता है। कैंसर को रोकने और उसके कारण जानने की भी कोशिश की है। हमने नशा मुक्ति की मुहिम चलाई, लोगों से शपथ पत्र भी भरवाए। कई गांव ऐसे भी हैं, जहां पर लोगों ने शराब का भरपूर विरोध किया है। अन्य गांवों या स्थानों पर नशा विरोधी अभियान चलता है तो कई लोग इससे जागरूक होंगे और शहर नशा मुक्त हो सकेगा।
रानू गुप्ता, एनजीओ संचालक

सरकारी स्कूल पर नजर रखना हमारी जिम्मेदारी
सरकारी स्कूल में सरकारी शिक्षक का बेटा नहीं पढ़ता। सरकारी अस्पताल में काम करने वाला डॉक्टर कभी अपने परिजनों का इलाज सरकारी अस्पताल में नहीं करवाता। वर्तमान में जो भी बड़े पदों पर हैं वे सरकारी स्कूलों में ही पढ़े हैं। पहले अमीर-गरीब सब साथ में पढ़ते थे। अब यह खाली बहुत बड़ी हो गई है। गरीब सरकारी में पढ़ता है और अमीर निजी सीबीएससी स्कूलों में। हमारी जिम्मेदारी बनती है कि सरकारी स्कूल में मोटी वेतन लेने वाला शिक्षक आखिर बच्चों को उचित शिक्षा क्यों नहीं दे रहा।
शफी शेख, शांति मंच इंदौर

दिव्यांग रोड क्रास नहीं कर सकता
दूसरे देश से समानता इसलिए कर रहे हैं कि वे विकसित हो चुके हैं। पर्यावरण से लेकर साफ व स्वच्छ शहर उनकी पहली प्राथमिकता है। वहां छोटी से छोटी सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है। उदाहरण के तौर पर दिव्यांग व्यक्ति जिसकी आंखें नहीं है वह रोड क्रास नहीं कर सकता। जबकि दूसरे देश की व्यवस्था ऐसी है कि वहां पर दिव्यांग के सड़क पार करने के दौरान एक्सीडेंट नहीं होते।
ज्ञानेन्द्र पुरोहित, मूक बधिर संस्था संचालक

जैविक खेती स्वस्थ रहने का तरीका
जैविक खेती से स्वस्थ रहा जा सकता है। विचार करना होगा कि लोगों का खाना कैसे बदला जाए और उसे हेल्दी कैसे बनाया जाए। शहर का विकास इस बात पर भी निर्भर करता है कि वहां के लोगों की जीवन शैली कैसी है। कहते हैं जैसा अन्ना वैसा मन। सरकार को पहल करनी होगी कि जो किसान जैविक खेती कर रहे हैं, उन्हे उपभोक्ताओं से जोड़ा जाए, जिससे कि उन्हे सही दाम मिल सकें। रासायनिक सब्जी या अन्ना सस्ता तो मिलता है लेकिन हमारे शरीर में कई बीमारियां पैदा करता है।
अर्चना परसाई गहलोत, समाजसेवी

उद्योगपतियों को गोद दें कुएं-बावड़ी
इंदौर अब इस काबिल हो गया है कि वह अपने हक के लिए लड़ सकता है। शहर में आज भी कुएं और बावड़ी बड़ी संख्या में है। इन्हे संवारने की जरूरत है। यदि इन्हे संरक्षित कर लिया जाए तो पूरे शहर में पानी वितरण हो सकता है। प्रशासन इसके लिए प्रयास करे, साथ ही जो उद्योगपति इस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, उन्हे कुएं-बावड़ी दान दे दिए जाएं। नागरिक समिति बनना चाहिए और नई टाउन शिपों में खाद की व्यवस्था की जाए।
प्रमोद गुप्ता, अधिवक्ता

 

By Gaurav Tiwari