इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर 

बात जब भी शहर के विकास की होती है तो हमेशा इसे व्यवस्थित बनाने की कोशिश की जाती है। लेकिन, हमें यह सोचना चाहिए कि शहर को व्यवस्थित बनाने के बजाए पहले रहने के लिए बेहतर बनाना जरूरी है। विकास का केंद्र भी यही होना चाहिए। पार्किंग तो शहर में बहुत बनाई जा रही हैं, लेकिन पब्लिक स्पेस के नाम पर क्यों नहीं कुछ विकास करते। सड़कें चौड़ी कर लोगों को आमंत्रण देते हैं कि आप पैदल चलने के बजाए कार लेकर निकलें। इन चौड़ी सड़कों के साथ वॉकिंग स्पेस या फुटपाथ नहीं बनाते हैं।

यदि सड़क के साथ अच्छा वॉकिंग स्पेस हो तो लोग थोड़ी दूरी पर जाने के लिए वाहन के बजाए पैदल जा सकेंगे। इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर कई लाभ होंगे। शहर के विकास से जुड़े कुछ ऐसे ही सुझाव स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, समाजसेवा आदि क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर काम कर रहे शहर के विशेषज्ञों ने नईदुनिया की मुहिम 'माय सिटी माय प्राइड' के तहत शनिवार को आयोजित राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में कही। कॉन्फ्रेंस में कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए।

स्वच्छता के बाद स्वास्थ्य में नंबर वन बनें
इंदौर स्वच्छता में लगातार दो बार नंबर वन बना है और जब स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी शहर को नंबर वन बनने की जरुरत है। सरकारी अस्पतालों में अच्छे डॉक्टर हैं, लेकिन उनके ऊपर दबाव बहुत ज्यादा है। इसके लिए प्राइवेट सेक्टर को आगे आना होगा। मैंने रोजाना डेढ़ घंटे का नि:शुल्क ओपीडी शुरू की है। इसमें हम गरीब तबके के मरीजों का मुफ्त इलाज करते हैं । हर महीने में 2 से 3 सर्जरी फ्री करते हैं। इसी तरह थोड़ा-थोड़ा प्रयास सभी निजी अस्पताल मिलकर करेंगे तो सरकारी अस्पतालों पर दबाव कम होगा। दूसरी ओर सरकारी डिस्पेंसरी में स्टाफ होकर भी नहीं होने जैसा है। वहां का स्टाफ प्रशिक्षित ही नहीं है। उन्हें सही प्रशिक्षण मिले और जरुरी उपरकरण दिए जांए तो लोगों को इलाज के लिए हमेशा बड़े अस्पतालों का रुख नहीं करना होगा।
डॉ. विशाल जैन, लेप्रोस्कोपिक सर्जन

नेटवर्क बनाकर हों सीएसआर एक्टिविटी
शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाना है तो हमें जड़ों को सहेजना होगा। शुरुआती शिक्षा में गुणवत्ता की कमी रखकर कर हम अपने भविष्य को ही खोखला बना रहे हैं। एक ऐसा बड़ा तबका तैयार हो रहा है जो शिक्षित तो है, लेकिन नॉलेज के नाम पर उनके पास कुछ भी नहीं है। यह रोजगार के काबिल भी नहीं होते हैं। शिक्षा व्यवस्था की कमी का नुकसान अर्थव्यवस्था को उठाना है। समाज का ऐसा तबका जो एक अच्छे मुकाम पर है, उन्हें इसकी जवाबदारी लेना चाहिए। कॉर्पोरेट सेक्टर को अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉसिंबिलिटी एक नेटवर्क बनाकर करना चाहिए। जब कई कॉर्पोरेट्स एक साथ आएंगे तो यह विकास काफी व्यवस्थित तरीके से हो सकेगा। यदि कोई भी व्यक्ति थोड़े से भी प्रयास करे तो रोजाना एक से दो घंटे का समय समाज सेवा के लिए निकाला जा सकता है।
चांदनी यादव, आंत्रप्रेन्योर

सिस्टम में हो रहे बदलावों को अपनाएं
शिक्षा के क्षेत्र में अब पूरा सिस्टम, एप्रोच और एटीट्यूट बदल चुका है और इसे हमें स्वीकारना होगा। अब क्लासरूम टीचिंग का जमाना नहीं रहा है। बच्चों को क्लासरूम से निकाल कर इंडस्ट्री के बीच लेकर जाना होगा जिससे वे खुद को तैयार कर सकें। आज स्टूडेंट भेड़चाल में चल रहे हैं। एक विश्वविद्यालय कंप्यूटर साइंस में 600 सीटों पर एडमिशन दे रहा है। इसके अलावा कॉलेजों की सीटें अलग हैं। ऐसे में एक ही संकाय के कितने स्टूडेंट्स निकलेंगे और किस तरह उन्हें इंडस्ट्री जॉब दे पाएगी। सरकार को इस पर लगाम लगाना चाहिए जिससे गुणवत्ता बेहतर हो सके।

ग्रामीण अंचलों में बच्चों से जाकर पूछना होगा कि आखिर वे क्या करना चाहते हैं और फिर उन्हें उपलब्ध विकल्पों की जानकारी देना होगा। हमने कॉलेज 5 दिन का कर दिया है और स्टाफ हर शनिवार आसपास के ग्रामीण बच्चों को इसी तरह कांउसलिंग दे रहा है। 

अशोक कुमट, वाइस चेयरमैन, एक्रोपोलिस टेक्निकल कैंपस

एमएसएमई के जरिए दूर कर सकते हैं बेरोजगारी
शहर में लगभग 60 प्रतिशत रोजगार मध्यम व लघु उद्योगों के जरिए आता है। यदि एमएसएमई में 1 करोड़ का निवेश होता है तो इससे करीब 15 लोगों को रोजगार मिलता है, वहीं बड़े कॉर्पोरेट में एक करोड़ के निवेश पर महज 2 लोगों को रोजगार मिलता है। पिछले 15 सालों में इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हुआ है। सड़के हैं, परिवहन सुधरा है और उद्योगों को अब इसका लाभ लेकर खुद को बढ़ाना चाहिए।

आज युवा भी पैकेज के पीछे भाग रहे हैं। सरकार की कई योजनाएं हैं जिससे वे स्वरोजगार की ओर जा सकते हैं। सरकार मोटिवेट कर सकती है, लेकिन काम तो आपको ही करना होगा। हमें युवाओं में उद्यमिता की सोच विकसित करना चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र में भी सब्सिडी पर जमीन पाने वाले हॉस्पिटलों द्वारा रियायती दरों पर इलाज देने की मॉनीटरिंग होना चाहिए।
हेमंत मेहतानी, पूर्व प्रेसीडेंट, एआईएमपी

पौधों के साथ बनाएं रिश्ता

सरकारी डिस्पेंसरी का लोगों को पता ही नहीं होता है इसलिए हमने एप पर इसकी जानकारी उपलब्ध कराई। वहीं इनके स्टाफ पर भी चेक लगाया है। उपस्थिति से लेकर रोजाना ओपीडी में देखे जाने वाले मरीजों की जानकारी तक देने की जवाबदेही प्रशासन के साथ मिलकर तय की। अब हमें हरियाली की बात करना भी अहम हो गया है। लोगों को अपनी अन्य वेल्थ के साथ ग्रीन वेल्थ भी काउंट करना चाहिए।

पौधा लगाकर उसे एक नाम देना चाहिए। इससे पौधा रोपने वाले का उससे एक जुड़ाव होता है। समारोह में भी लोग बुके देने के बजाए हमारे एनजीओ को एक गिफ्ट कार्ड दे सकते हैं। इससे उस व्यक्ति का नाम एक पेड़ को दिया जाएगा। वह व्यक्ति ऑनलाइन एप के जरिए उस पेड़ की स्थिति कभी भी जान सकता है।
राकेश जैन, संचालक आईटी कंपनी व सिटीजनकॉप एनजीओ

बच्चों के साथ शिक्षकों को भी करना होगा जागरुक
भविष्य के लिए कोई भी निर्णय लेते समय रूचि और क्षमता दो महत्वपूर्ण पहलू होते हैं और इन्हें देखते हुए ही निर्णय लेना चाहिए। बच्चों के साथ शिक्षकों को भी जागरुक करने की जरूरत है। प्रतिशत देखकर बच्चे को विषय दे दिया जाता है। 85 प्रश्‍न अंक हैं तो साइंस दे दो और 65 प्रतिशत अंक हैं तो कॉमर्स। यदि किसी बच्चे के 65 प्रतिशत हैं, लेकिन टेक्नीकली वह साउंड है और उसकी रूचि इस विषय में है तो उसे भी साइंस विषय दिया जाना चाहिए।

रूचि का विषय ही नहीं मिलेगा तो उसका भविष्य बेहतर नहीं बन पाएगा और एक डमी बनकर रह जाएगा। यह बात शिक्षकों को समझना होगी। दूसरी ओर सही और गलत के बीच का फर्क समझाना भी बहुत जरूरी है। यह काम नेटवर्किंग के जरिए किया जा सकता है। वरिष्ठ लोग नेटवर्क बनाकर बच्चों को जोड़ें और उन्हें नैतिक मार्गदर्शन दें।
सचिन भटनागर, करियर काउंसलर

पब्लिक स्पेस से कम हो सकता है क्राइम
शहर में बगीचों, ग्रीन बेल्ट बहुत महत्वपूर्ण हैं। अब शहर में इमली, बरगद या पीपल के पेड़ों का स्थान कनेर ने ले लिया है। बगीचों को कॉस्मेटिक के रूप में विकसित किया जा रहा है जबकि यह पर्यावरण के लिहाज से होना चाहिए। खूबसूरत पौधों के बजाए ऐसे पौधे लगाने चाहिए जो हमारे फेफड़ों के ज्यादा शुद्ध हवा दे सकें।

अर्बन डेवलपमेंट के नाम पर पेड़ नहीं काटने चाहिए। आज ऐसे विकल्प हैं कि मशीन के जरिए आसानी से पेड़ को शिफ्ट किया जा सकता है, लेकिन सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काट देते हैं। पब्लिक स्पेस को भी यदि सही तरीके से डिजाइन किया जाए तो इससे अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है। इसके सोसाइटी को एक बड़े परिवार की तरह देखना चाहिए और उसी के अनुसार विकास होना चाहिए। शहर को सिर्फ सिस्टम के अनुसार डेवलप करने से कुछ नहीं होगा।
ऋतुराज भारती, आर्किटेक्ट

विकास के लिए विचारों के क्रियान्वयन की जरूरत
देश को यदि आगे बढ़ाना है तो इसमें हमें योगदान देना होगा। जीएसटी जैसे प्रावधान उद्योगों को अनुशासन में लेकर आ रहे हैं इसलिए ऐसे कदमों का स्वागत करना चाहिए। आज हम लोग दोहरा जीवन जी रहे हैं। जब सामाजिक मंच पर बोलना होता है तो सभी लोग बड़ी बातें करते हैं, लेकिन बातों और विचारों को अगले स्तर पर ले जाते हुए उस पर अमल करना चाहिए। उद्योगों के पास काफी सारी क्षमताएं हैं और वे विकास में बहुत योगदान दे सकते हैं। इसके लिए पहले सभी को एकजुट करते हुए समग्र प्रयास करने होंगे।
- प्रमोद डफरिया, उद्योगपति

 

By Krishan Kumar