भागीरथपुरा दूषित जलकांड का काला सच: शिकायतें मिलती रहीं, सिस्टम सोता रहा; 36 मौतों पर जांच रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 36 मौतों का कारण वर्षों की लापरवाही और ...और पढ़ें

भागीरथपुरा की गलियों में अभी भी ड्रेनेज का काम जारी है। (फोटो- जागरण)
HighLights
जांच आयोग ने 36 में से 22 मौतों को दूषित पानी से जोड़ा।
पेयजल और सीवर लाइनों की नजदीकी बनी त्रासदी का मुख्य कारण।
शिकायतों पर कार्रवाई में देरी और कमजोर निगरानी रही जिम्मेदार।
डिजिटल डेस्क, इंदौर। भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को जांच आयोग ने महज एक दिन की चूक का नतीजा नहीं माना है। हाई कोर्ट के आदेश पर गठित एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट में सामने आया है कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही, पेयजल और सीवरेज नेटवर्क की गलत प्लानिंग, कमजोर निगरानी, खराब रखरखाव और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने के कारण हालात बिगड़ते गए। आयोग के मुताबिक, समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाते तो इस त्रासदी को टाला जा सकता था।
भागीरथपुरा कांड में 36 लोगों की मौत हुई थी। आयोग ने अस्पताल रिकॉर्ड के आधार पर इनमें से 22 मौतों को दूषित पानी से फैली बीमारी से जुड़ा पाया है, जबकि बाकी मामलों में मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं हो सका।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट 18 अगस्त 2026 को तीन सीलबंद लिफाफों में हाई कोर्ट में प्रस्तुत की थी। कोर्ट के आदेश के बाद बुधवार, 30 सितंबर को रिपोर्ट हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड की गई। जांच में पानी की गुणवत्ता, पाइपलाइनों की स्थिति, शिकायतों, अस्पताल रिकॉर्ड, मौतों के कारण, अधिकारियों के बयान और पाइप बदलने की टेंडर प्रक्रिया समेत कई पहलुओं को शामिल किया गया।
दिसंबर में ही शुरू हो गए थे उल्टी-दस्त के मामले
रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह की शुरुआत में ही भागीरथपुरा क्षेत्र में उल्टी, दस्त और पेट दर्द के मरीज सामने आने लगे थे। स्थानीय लोग बदबूदार, काले और गंदे पानी की शिकायतें भी कर रहे थे। पार्षद कमल वाघेला ने अधिकारियों को इन शिकायतों की जानकारी दी, लेकिन समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
3 जनवरी 2026 को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी के 52 नमूने लिए। इनमें 50 नमूने टोटल कोलीफार्म पॉजिटिव मिले, जबकि 40 नमूनों में ई-कोलाई पाया गया। पीने के पानी में इन बैक्टीरिया की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए।
29 दिसंबर से 6 फरवरी के बीच लिए गए 24 नमूनों में 18 असंतोषजनक पाए गए। वहीं एमजीएम मेडिकल कॉलेज की जांच में 24 में से 19 नमूने पीने योग्य नहीं मिले।
आयोग ने यह भी पाया कि वर्ष 2025 में नगर निगम द्वारा जांचे गए 73 नमूनों में 54 मानकों पर खरे नहीं उतरे थे। इनमें 39 नमूनों में फीकल कोलीफार्म की मौजूदगी मिली थी।
36 मौतों में 22 को दूषित पानी से जोड़ा
आयोग ने अस्पताल रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद 36 मृतकों में से 22 की मौत को दूषित पानी से फैली महामारी से संबंधित माना है। रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मरीज उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे थे।
चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के रिकॉर्ड में 38 बच्चों के भर्ती होने का उल्लेख है। इनमें तीव्र गैस्ट्रोएंटेराइटिस, डिहाइड्रेशन और तीव्र दस्त के मामले सामने आए। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के रिकॉर्ड में 43 मरीजों के भर्ती होने और बाद में उनके गैस्ट्रोएंटेराइटिस से पीड़ित पाए जाने का उल्लेख है।
आयोग के समक्ष चिकित्सकों ने भी बताया कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में एक जैसे लक्षण दिखाई दे रहे थे और बड़ी संख्या में मरीज गैस्ट्रोएंटेराइटिस से पीड़ित थे।
रिपोर्ट में ई-कोलाई सहित अन्य रोगजनक बैक्टीरिया की मौजूदगी का भी उल्लेख है। आयोग ने कहा कि उपलब्ध चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्य दूषित पानी के सेवन और गैस्ट्रोएंटेराइटिस के बीच संबंध की संभावना को पुष्ट करते हैं।
सीवर और पेयजल लाइन की नजदीकी बनी बड़ा खतरा
जांच में भागीरथपुरा के कई हिस्सों में सीवर और पेयजल लाइनों के समानांतर चलने, क्रास होने और एक-दूसरे के ऊपर-नीचे से गुजरने की स्थिति सामने आई। कुछ स्थानों पर सीवर लाइन पेयजल पाइप के ऊपर भी पाई गई।
रिपोर्ट में सीपीएचईईओ मानकों का हवाला देते हुए दोनों नेटवर्क के बीच निर्धारित दूरी और सीवर लाइन को पेयजल लाइन से नीचे रखने की आवश्यकता बताई गई है। नगर निगम के इंजीनियरों ने भी माना कि कई जगह निर्धारित दूरी का पालन नहीं हुआ।
आयोग के अनुसार, सीवर में रिसाव और ओवरफ्लो के साथ पेयजल लाइन में निगेटिव प्रेशर ने दूषित पानी को पेयजल नेटवर्क में पहुंचने का रास्ता दिया।
शिकायतें मिलती रहीं, लेकिन सिस्टम नहीं जागा
आयोग ने पुराने प्रोजेक्ट की डिजाइन और निर्माण से जुड़े तकनीकी अधिकारियों के साथ-साथ रखरखाव से जुड़े अधिकारियों की भूमिका को भी जांच के दायरे में लिया।
नगर निगम के कार्यपालन यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव 2013 से 2026 तक जलप्रदाय विभाग में कार्यपालन यंत्री रहे। रिपोर्ट के अनुसार, उनके जिम्मे जर्जर पाइप, लीकेज और नेटवर्क की स्थिति पर निगरानी तथा प्रिवेंटिव मेंटेनेंस सुनिश्चित करना था।
इसी तरह सहायक यंत्री सरोज कुमार प्रजापति अगस्त 2017 से जून 2025 तक जोन-4 और भागीरथपुरा के प्रभारी रहे। आयोग के मुताबिक, उन्हें लीकेज, पाइप क्षति, अनधिकृत कनेक्शन, सीवर-पेयजल लाइन की नजदीकी, बदबू और पानी की गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों की जानकारी थी, लेकिन समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
पाइपलाइन का काम पूरा होने में दो साल की देरी
जांच आयोग ने नई पाइपलाइन बिछाने की प्रक्रिया में हुई देरी को भी गंभीर माना है। रिपोर्ट के अनुसार टेंडर जारी होने से लेकर एमआईसी के समक्ष मामला पहुंचने, स्वीकृति और अनुबंध तक की प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर देरी हुई।
नई पाइपलाइन का काम मई 2024 तक पूरा होना था, लेकिन इसे पूरा होने में करीब दो वर्ष की देरी हुई। आयोग ने ठेकेदार एजेंसी मालवा इंजीनियरिंग और तत्कालीन कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं।
आयोग ने दिए जल नेटवर्क सुधार के कई सुझाव
आयोग ने भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए पेयजल और सीवर नेटवर्क में पर्याप्त दूरी रखने, क्रासिंग वाले स्थानों पर प्रोटेक्टिव केसिंग और कंक्रीट शील्डिंग, जीआईएस मैपिंग तथा पुराने पाइपों को चरणबद्ध तरीके से बदलने की सिफारिश की है।
इसके अलावा नियमित सुरक्षा ऑडिट, रियल टाइम लीकेज और प्रेशर मॉनिटरिंग तथा नियमित बैक्टीरियोलॉजिकल जांच की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है।
बदबूदार या संदिग्ध पानी की शिकायत मिलने पर 24 घंटे के भीतर सैंपल लेने, लैब टेस्ट कराने, जरूरत पड़ने पर संदिग्ध पाइप या बोरवेल बंद करने, सुरक्षित पानी के टैंकर और वाटर प्वाइंट उपलब्ध कराने, फ्लशिंग व क्लोरीनेशन कराने और क्रास-कनेक्शन ठीक करने की व्यवस्था भी सुझाई गई है। साथ ही प्रभावित क्षेत्र में मेडिकल टीम भेजने और लोगों को तत्काल सूचना देने की अनुशंसा की गई है।
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शहरी जल आपूर्ति प्राधिकरण बनाने की सिफारिश
आयोग ने प्रदेश में शहरी जल आपूर्ति प्राधिकरण गठित करने की अनुशंसा भी की है। इसके अध्यक्ष के लिए सेवानिवृत्त हाई कोर्ट जज या सेवानिवृत्त मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी का सुझाव दिया गया है।
प्रभावित परिवारों के लिए आयोग ने कई स्तरों पर राहत की अनुशंसा की है। इसमें मृतकों के स्वजन को 10 लाख रुपये, अंतिम संस्कार के लिए 50 हजार रुपये, बच्चों की शिक्षा के लिए पांच लाख रुपये तक, गंभीर बीमारी की स्थिति में दो लाख रुपये, स्थायी नुकसान पर तीन लाख रुपये और मामूली बीमारी पर 50 हजार रुपये तक सहायता शामिल है।
इसके साथ चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति, प्रभावित परिवारों को पांच वर्ष तक मुफ्त चिकित्सा सुविधा और नियमित स्वास्थ्य शिविर आयोजित करने की भी सिफारिश की गई है।
