यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 06, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
मध्य प्रदेश से कांग्रेस की संसद में भागीदारी हुई शून्य, जीतू पटवारी के खिलाफ उबरने लगा असंतोष; हाईकमान को कार्यकर्ता लिख रहे चिट्ठी
आम चुनाव में पूरे प्रदेश में हुई करारी हार के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के प्रति उनके गृह ...और पढ़ें

जेएनएन, इंदौर। आम चुनाव में पूरे प्रदेश में हुई करारी हार के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के प्रति उनके गृह क्षेत्र के कार्यकर्ताओं में ही असंतोष पनपने लगा है। इंदौर से कार्यकर्ता कह रहे हैं कि एक ही चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में जीतू पटवारी की यह दूसरी हार है।
प्रदेश से कांग्रेस की संसद में भागीदारी भी शून्य
पहले अपने ही घर की सीट पर पटवारी कांग्रेस को उम्मीदवार विहीन होने से नहीं रोक पाए और अब उन्हीं के कार्यकाल में इंदौर में न केवल भाजपा की सबसे बड़ी जीत हुई बल्कि प्रदेश से कांग्रेस की संसद में भागीदारी भी शून्य हो गई। ऐसे में आगे इंदौर से प्रदेश कांग्रेस में बड़े बदलाव की मांग बुलंद होने लगे तो हैरानी नहीं होगी।पटवारी की कार्यशैली पर कांग्रेसी कार्यकर्ता सवाल खड़े कर रहे हैं।
उम्मीदवारों को संगठन का समर्थन नहीं मिला
आरोप लगाया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों को संगठन का समर्थन नहीं मिला। इंदौर से घोषित उम्मीदवार अक्षय कांति बम को भी संगठन का सहयोग नहीं मिला। डमी उम्मीदवार का फार्म दाखिल करने की जिम्मेदारी भी पटवारी ने अपने करीबी लोगों को दी, उसमें भी वे फेल हो गए।
नोटा के पक्ष में कांग्रेस के परंपरागत वोट भी नहीं डलवा सके। और तो और आखिरी समय यानी मतगणना में भी प्रदेश अध्यक्ष की विधानसभा क्षेत्र की टेबल ही सूनी रही। इन सब बिंदुओं को लेकर कार्यकर्ताओं ने शिकायतें दिल्ली भेजने की तैयारी भी शुरू कर दी हैं।
कांग्रेस के आधे वोटर भी नहीं निकले
उम्मीदवार नहीं होने के बाद कांग्रेस ने नोटा को समर्थन देने की घोषणा की। इसके बाद अब जब परिणामों का आकलन किया जा रहा है तो इंदौर में कांग्रेस के परंपरागत वोट भी नहीं डल सके। दरअसल नोटा को कुल दो लाख 18 हजार से कुछ ज्यादा वोट मिले। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के अनुसार कुछ महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के वोटों की कुल संख्या करीब सात लाख थी।
बीते लोकसभा में पंकज संघवी को भी पांच लाख से ज्यादा वोट मिले थे। यानी नोटा के समर्थन में कांग्रेस अपने परंपरागत वोटरों में से आधे वोटरों को बाहर नहीं निकाल सकी। कांग्रेस का चुनाव मैनेजमेंट भी फेल हो गया। मतदान वाले दिन न तो कांग्रेसी कार्यकर्ता बूथों में दिखे, न टेबलें लगीं। मतगणना वाले दिन भी निर्दलीय उम्मीदवार के नाम से पास बनवाकर अन्य विधानसभा की टेबलों पर तो कांग्रेसी पहुंचे, लेकिन राऊ विधानसभा की टेबलें खाली रहीं।
बम को नहीं किया सहयोग
इस बीच कुछ कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम चिट्ठी लिखी है। इसमें आरोप लगाया गया है कि इंदौर में कांग्रेस उम्मीदवार के पाला बदलने के पीछे भी प्रदेश अध्यक्ष की लापरवाही जिम्मेदार है। कार्यकर्ता पहले मांग कर रहे थे कि इंदौर से खुद पटवारी को चुनाव लड़ना चाहिए, लेकिन वे मैदान में नहीं आए।
इसके बाद घोषित उम्मीदवार अक्षय बम की मांग पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यालय से स्टार प्रचारकों की सूची भी तय नहीं हो सकी। एक बार सचिन पायलट इंदौर एयरपोर्ट पर घंटों बैठे रहे। बम ने तब प्रदेश अध्यक्ष से मांग की कि खाली समय का लाभ उठाकर इंदौर में उनकी नुक्कड़ सभा ही करवा दी जाए। इसके बावजूद पटवारी ने पायलट से तब के कांग्रेस उम्मीदवार की मुलाकात तय नहीं करवाई।
नेता प्रतिपक्ष भी हुए फेल
कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की नाराजगी के बीच प्रदेश में संगठन की अंदरूनी गुटबाजी भी साफ नजर आ रही है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के गृह क्षेत्र वाले धार और रतलाम की सीटों पर भी कांग्रेस कुछ नहीं कर सकी। इन दोनों सीटों पर दो लाख से ज्यादा की हार कांग्रेस के हिस्से आई। ऐसे में अब कांग्रेस आलाकमान के सामने सवाल खड़ा हो रहा है कि बदलाव भी होता है तो आखिर कौन होगा, जो संगठन को खड़ा कर सके और प्रदेश में नेतृत्व भी दे सके।
