ग्वालियर, नईदुनिया रिपोर्टर। स्व. आलोक द्वारा लिखी गईं पुस्तकें दुर्लभ हैं। उन्हें आज की युवा पीढ़ी को पढ़ना चाहिए। न पढ़ने की वजह से वे अच्छा लिख भी नहीं पा रहे हैं। साफ बात है, जब तक अच्छा नहीं पढ़ा जाएगा, तब तक अच्छा नहीं लिखा जाएगा। ग्वालियर में जीवाजी विश्वविद्यालय सबसे बड़ा शैक्षणिक संस्थान है, जिसमें पत्रकारिता विभाग भी है। ऐसे में जेयू को स्व. आलोक तोमर के नाम से हर साल श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले युवा को मेडल दिया जाना चाहिए।

इससे वह स्व. आलोक को जानेगा, उन्हें पढ़ेगा और उसके मन में नए विचार जन्म लेंगे। यह कहना था 'नईदुनिया' के समूह संपादक आनंद पांडे का। वे रविवार को आलोक तोमर स्मृति न्यास और जीवाजी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययन केन्द्र द्वारा गालव सभागार में स्व. आलोक तोमर की याद में आयोजित ...यादों में आलोक कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सदस्यों को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में श्री पांडे की मौजूदगी मुख्य अतिथि के रूप में थी। कार्यक्रम में सहभागिता जी न्यूज नई दिल्ली के दिलीप तिवारी और एबीपी न्यूज भोपाल के ब्रजेश राजपूत की रही। वहीं विशेष सानिध्य नई दिल्ली से आईं सुप्रिया रॉय तोमर का रहा।

महत्वाकांक्षा जागने से भूले पत्रकारिता के मायने

मुख्य अतिथि श्री पांडे ने कहा कि लोगों की सोच है, मीडिया बाजार बन गया है, जबकि ऐसा नहीं है। कुछ वजहों से ये विचार आ रहे हैं। पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों को खुद तय करना होगा, किस रास्ते पर चलना है और किस पर नहीं। उन्होंने अपनी बात तो साफ करने के लिए कहा, 1947 के बाद मीडिया के क्षेत्र में काफी बदलाव आए। 1947 से लेकर 75 तक टारगेट पर फोकस किया गया है।

1975 से 91 के बीच पत्रकारिता को खड़ा किया गया और 1991 के बाद टारगेट, कॅरियर और इंक्रीमेंट पर बात आकर टिक गई। महात्वाकांक्षाएं जागीं और लोग पत्रकारिता के मायने भूलने लगे। बदलाव के लिए सभी को सामूहिक प्रदर्शन करना होगा। किसी एक के प्रयासों से देश की तस्वीर नहीं बदल सकती। आज की तारीख में अखबार प्रॉडक्ट बन गया है। कुछ लोग पत्रकारिता को पेशा मानते हैं, जबकि इस क्षेत्र से समाज को काफी उम्मीदें हैं।

तेजी से बदल रहा दौर

एबीपी न्यूज भोपाल से आए ब्रजेश राजपूत ने कहा पूर्व में परिवर्तन धीरे-धीरे होता था, लेकिन आज तेजी से परिवर्तन सामने आ रहे हैं। उथल-पुथल बनी हुई है, जरा-जरा सी बात पर रिश्ते टूट रहे हैं और बन रहे हैं, कारण हर हाथ में मोबाइल का आना। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी है। इससे हर दूसरा और तीसरा आदमी पत्रकार बन गया है। ऐसा लगता है, आने वाले समय में कुछ लोग होंगे और करोड़ों पत्रकार। आप किसी से अगर एक बात छिपाते हो तो उसे बताने के लिए 10 लोग सामने आ जाएंगे। कहा जा सकता है, पत्रकारिता टेक्नोलॉजी की चुनौतियां झेल रही है।

खामियां दूर करनी होंगी

जी न्यूज नई दिल्ली के दिलीप तिवारी ने कहा माना कि मीडिया की कई खामियां सामने आ रही हैं, लेकिन इन्हें हमें ही दूर करना होगा। सही शब्दों में कहा जाए तो पत्रकारिता को उसकी जगह पर खड़े रखने के लिए युवाओं को अपनी जिम्मेदारी पूरी शिद्दत के साथ निभानी होगी। इसी क्रम में जेयू के प्रो. एसके सिंह ने भी विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम संचालन पत्रकार जयंत तोमर ने किया। वहीं आभार पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययन केन्द्र के डॉ. शांतिदेव सिसौदिया ने व्यक्त किया। 

Posted By: Bhupendra Singh

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