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चंबल की गहराइयों में कितनी डॉल्फिन? हाईटेक तकनीक से हो रही गिनती, 7 दिन में 110 से ज्यादा की पहचान

By Hariom GourEdited By: Ravindra Soni
Published: Mon, 12 Oct 2026 08:07 PM (GMT+05:30)

सात अक्टूबर से शुरू हुआ सर्वे मुरैना-धौलपुर क्षेत्र के डांग बसई घाट से शुरू होकर उत्तर प्रदेश की सीमा में ...और पढ़ें

चंबल नदी में भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) देहरादून का दल तरंगों के माध्यम से डॉल्फिन की गणना करते हुए। (फोटो- जागरण)

चंबल नदी में भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) देहरादून का दल तरंगों के माध्यम से डॉल्फिन की गणना करते हुए। (फोटो- जागरण)

HighLights

  1. चंबल में डॉल्फिन की आधुनिक तकनीक से गिनती जारी।

  2. सात दिनों में 110 से अधिक डॉल्फिन की पहचान।

  3. अल्ट्रासोनिक तरंगों और हाईटेक उपकरणों का उपयोग।

हरिओम गौड़, मुरैना। चंबल नदी की गहराइयों में छिपी गंगा डॉल्फिन की वास्तविक आबादी का पता लगाने के लिए इस बार आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। पानी की सतह पर महज दो-तीन सेकंड के लिए दिखाई देने वाले इस दुर्लभ जलीय जीव की पहचान के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून की टीम अल्ट्रासोनिक तरंगों और हाईटेक उपकरणों का इस्तेमाल कर रही है। सात दिन के सर्वे में अब तक 110 से अधिक डॉल्फिन की पहचान होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, इनकी अंतिम संख्या 15 अक्टूबर को सर्वे पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

चंबल नदी में गंगा डॉल्फिन की आबादी का आकलन करने के लिए दूसरी बार विशेष सेंसस कराया जा रहा है। वर्ष 2022 में हुए पहले सेंसस में 250 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। इस बार का सर्वे 7 अक्टूबर से शुरू हुआ है। इसके तहत मध्य प्रदेश के मुरैना और राजस्थान के धौलपुर क्षेत्र के डांग बसई घाट से लेकर उत्तर प्रदेश के इटवा और जालौन क्षेत्र के पचनदा घाट तक करीब 250 किलोमीटर लंबे नदी क्षेत्र को कवर किया जा रहा है।

सात दिन में 130 किलोमीटर नदी क्षेत्र का सर्वे

डब्ल्यूआईआई के डॉल्फिन विशेषज्ञ डॉ. अमित कुमार के नेतृत्व में 22 सदस्यीय टीम इस अभियान में जुटी है। सर्वे में चंबल घड़ियाल अभयारण्य के दो दर्जन से अधिक कर्मचारी भी सहयोग कर रहे हैं। अभियान शुरू होने से पहले कर्मचारियों को एक दिन का प्रशिक्षण दिया गया था।

टीम प्रतिदिन औसतन 18 से 20 किलोमीटर नदी क्षेत्र का सर्वे कर रही है। सात दिनों में करीब 130 किलोमीटर क्षेत्र का सर्वे पूरा किया जा चुका है। अब तक 110 से अधिक डॉल्फिन की पहचान की जानकारी मिली है। पूरी नदी का सर्वे समाप्त होने के बाद ही आबादी का अंतिम आंकड़ा सामने आएगा।

डॉल्फिन की संख्या में इतना अंतर क्यों?

चंबल में गंगा डॉल्फिन की संख्या को लेकर अलग-अलग सर्वे में अंतर देखने को मिला है। वर्ष 2022 के विशेष डॉल्फिन सेंसस में इनकी संख्या 250 दर्ज की गई थी। इसके विपरीत, चंबल घड़ियाल अभयारण्य और डब्ल्यूआईआई की ओर से हर साल फरवरी में की जाने वाली जलीयजीव गणना में इनकी संख्या कम रही।

  • 2022: विशेष डॉल्फिन सेंसस में 250 डॉल्फिन दर्ज।
  • 2025: वार्षिक गणना में करीब 116 डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज की गई।
  • 2026: फरवरी की वार्षिक गणना में 155 डॉल्फिन दर्ज की गईं।

इन आंकड़ों में अंतर का अर्थ यह जरूरी नहीं कि डॉल्फिन की आबादी में उसी अनुपात में कमी या बढ़ोतरी हुई हो। सर्वे की तकनीक और गणना के तरीके भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।

चंबल घड़ियाल अभयारण्य के डीएफओ एचसी बघेल के अनुसार, वार्षिक जलीयजीव गणना में मुख्य रूप से उन्हीं जीवों को दर्ज किया जाता है, जो सर्वे के दौरान दिखाई देते हैं। पानी के भीतर मौजूद डॉल्फिन उस प्रक्रिया में छूट सकती हैं। इसी वजह से वार्षिक गणना और विशेष सेंसस के आंकड़ों में अंतर सामने आता है।

पानी में डॉल्फिन की मौजूदगी ऐसे पकड़ते हैं उपकरण

गंगा डॉल्फिन की गिनती करना आसान नहीं है। यह सांस लेने के लिए कुछ मिनट के अंतराल पर पानी की सतह पर आती है और थोड़े ही समय में फिर गहराई में चली जाती है। ऐसे में केवल आंखों से देखकर उसकी सटीक गणना करना चुनौतीपूर्ण होता है।

इस चुनौती से निपटने के लिए डब्ल्यूआईआई की टीम अल्ट्रासोनिक तरंगों पर आधारित तकनीक का इस्तेमाल कर रही है। सर्वे में एप-पोट और ए-टेग जैसे आधुनिक उपकरणों की मदद ली जा रही है। इनके जरिए पानी के भीतर डॉल्फिन की गतिविधियों का पता लगाने और उनकी मौजूदगी की पहचान करने में सहायता मिलती है। उपकरणों की सीमा में डॉल्फिन आने पर उसकी गतिविधि कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देती है, जिसके बाद सर्वेयर पहचान की पुष्टि कर उसे दर्ज करते हैं।

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ध्वनि तरंगों से पहचानती है रास्ता

गंगा डॉल्फिन की देखने की क्षमता बेहद कमजोर होती है। वह पानी के भीतर दिशा पहचानने, आसपास की वस्तुओं का पता लगाने और संभावित खतरे को भांपने के लिए ध्वनि तरंगों का सहारा लेती है। उसकी इसी प्राकृतिक विशेषता से जुड़ी ध्वनि-आधारित तकनीक पानी में उसकी मौजूदगी का पता लगाने में मददगार साबित होती है।

इस बार के सर्वे से उम्मीद है कि चंबल में गंगा डॉल्फिन की आबादी का अधिक सटीक आकलन हो सकेगा। 15 अक्टूबर को सर्वे पूरा होने के बाद सामने आने वाले आंकड़े यह समझने में भी मदद करेंगे कि नदी में इस दुर्लभ जलीय जीव की स्थिति कैसी है और उसके संरक्षण के लिए आगे किन प्रयासों की जरूरत है।

चंबल में गंगा डॉल्फिन की गणना के लिए डब्ल्यूआईआई की ओर से दूसरा डॉल्फिन सेंसस कराया जा रहा है। इसमें आधुनिक तकनीक से सर्वे किया जा रहा है। हमारी वार्षिक जलीयजीव गणना में आंखों से दिखाई देने वाले जीवों को दर्ज किया जाता है, इसलिए पानी के भीतर मौजूद डॉल्फिन की गिनती नहीं हो पाती। इस सर्वे से उनकी संख्या की अधिक सटीक जानकारी सामने आने की उम्मीद है। सर्वे 15 अक्टूबर को पूरा होगा।
- एचसी बघेल, डीएफओ, चंबल घड़ियाल अभयारण्य, मुरैना।