सद्गुरु शरण। यह आत्मविश्वास से उपजा नैतिक साहस है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दृढ़ता दिखाते हुए नगर निकाय चुनाव में भाजपा के उन कई दागी उम्मीदवारों के टिकट कटवा दिए, जो जोर-जुगाड़ के जरिए टिकट हथियाने में सफल हो गए थे। पार्टी का झंडा-डंडा उठाने में तत्पर रहने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करके धनबली-बाहुबली और आपराधिक पृष्ठभूमि के कई उम्मीदवारों को टिकट मिल जाने से पार्टी में असंतोष और मायूसी थी, पर इसे बड़े नेताओं का फैसला मानकर कार्यकर्ता मुखर नहीं हो रहे थे। इसके बावजूद इस आशय का फीडबैक मिलने पर शिवराज सिंह सख्त हो गए और सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि भाजपा एक भी दागी को चुनाव नहीं लड़ाएगी। मुख्यमंत्री का संकेत मिलते ही प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने उम्मीदवारों की सारी सूचियों की सफाई कर डाली। जिनकी छुट्टी हुई, उनमें भोपाल और इंदौर नगर निगम चुनाव के भी कुछ उम्मीदवार शामिल थे। शिवराज के इस स्टैंड पर पार्टी कार्यकर्ता गद्गद् हैं।

विधानसभा चुनाव से करीब सवा साल पहले हो रहे निकाय और पंचायत चुनाव भाजपा के लिए किस कदर महत्वपूर्ण हैं, समझा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में भी पिछले विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले इसी तरह पंचायत और निकाय चुनाव हुए थे जिनमें भाजपा की बड़ी सफलता ने विधानसभा चुनाव के लिए मजबूत जमीन तैयार कर दी थी। विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सारी अटकलों एवं अनुमानों को गलत साबित करते हुए बड़ी जीत हासिल की थी। मध्य प्रदेश में भी पार्टी यही उदाहरण दोहराना चाहती है, पर शिवराज सिंह इसके लिए कोई शार्टकट नहीं अपनाना चाहते। राजनीतिक समीक्षक दागियों के सवाल पर मुख्यमंत्री के सख्त स्टैंड को उनके उच्च आत्मविश्वास का संकेत मानते हैं।

शिवराज सिंह भाजपा के इतिहास में सर्वाधिक अवधि तक मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड बना चुके हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनके चार कार्यकालों का योग 15 वर्ष से अधिक हो चुका है। बेशक यह उनके लिए गर्वपूर्ण उपलब्धि है, यद्यपि इसका एक पहलू चुनावी राजनीति का एंटी इनकंबेंसी फैक्टर भी है जो पिछले विधानसभा चुनाव में अपना असर दिखा भी चुका है। उस नतीजे से सबक लेकर मुख्यमंत्री प्रदेश के चप्पे-चप्पे की न सिर्फ खाक छान रहे हैं, बल्कि सामूहिकता के अलावा अलग-अलग भी सामाजिक वर्गो के साथ संवाद कर रहे हैं।

ये चुनाव कांग्रेस के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में सफलता पाने के बाद सिर्फ 15 महीने चलाकर सरकार गंवा देने वाली कांग्रेस 2023 में किसी भी कीमत पर दोबारा सत्ता पाने के लिए छटपटा तो रही है, पर उसे इस मंजिल की राह की दुश्वारियां भी मालूम हैं। पिछले चुनाव में शिवराज सिंह सरकार के एंटी इनकंबेंसी फैक्टर के अलावा आदिवासियों के लगभग एकतरफा समर्थन और किसानों के कर्ज माफ करने जैसे वादों ने चुनाव परिणाम का रुख बदल दिया था, जबकि इस बार हालात किसी हद तक अलग हैं। पिछले चुनाव में किसानों के कर्ज माफ करने के जिस वादे ने कांग्रेस का लक्ष्य आसान कर दिया था, वह 15 महीने के कार्यकाल में पूरा न होना अब कांग्रेस की राह में बड़ी बाधा है।

वादा खुद राहुल गांधी ने किया था। इसे पूरा करने के लिए 15 महीने की अवधि कम नहीं थी। जाहिर है, अगले चुनाव में कम से कम किसानों के बीच कांग्रेस को विश्वसनीयता के संकट का सामना करना पड़ सकता है। इस बीच मोदी और शिवराज सरकार ने आदिवासियों के लिए विभिन्न रूपों में जो काम किया है, उसके बाद कांग्रेस को इस वोटबैंक से भी ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। आदिवासी पृष्ठभूमि की द्रौपदी मुमरू को राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनाकर राजग ने चुनावी राजनीति की दृष्टि से मास्टर स्ट्रोक खेला है। समीक्षक मानते हैं कि राज्यों से लेकर अगले लोकसभा चुनाव तक इस फैसले का गहरा प्रभाव महसूस किया जाएगा। कांग्रेस के पास फिलहाल विकल्प नहीं दिखते।

स्वाभाविक है कि हालात को भांपते हुए कांग्रेस भी नगर निकाय और पंचायत चुनाव में पूरी ताकत झोंक रही है। खुद कमल नाथ और दिग्विजय सिंह जैसे बड़े नेता अलग-अलग अंचलों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी की तरह कांग्रेस ने भी उम्मीदवारों के चयन में खासी माथापच्ची की है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता स्वीकार करते हैं कि पिछले कुछ वर्षो में उत्तर प्रदेश समेत अधिकतर राज्यों के विधानसभा चुनावों में पराजय और हाल में नेशनल हेराल्ड घोटाला प्रकरण में राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ जैसी घटनाओं से हर स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बहुत नीचे गिर चुका है। इस पृष्ठभूमि में मध्य प्रदेश में हो रहे निकाय और पंचायत चुनाव कांग्रेस के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। यदि इन चुनावों में कांग्रेस औसत प्रदर्शन न कर पाई तो उसके लिए अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव का सफर अधिक मुश्किल हो जाएगा।

[संपादक, नई दुनिया, मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़]

Edited By: Sanjay Pokhriyal