यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 18, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
चंबल के बीहड़ में रंग लाई किसानों की हिम्मत, लहलहाई मोसंबी की फसल, एक बीघा में पांच गुना अधिक कमाई
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में फलों की खेती एक चुनौती है लेकिन जौरा तहसील के चैना गांव के किसानों ...और पढ़ें

हरिओम गौड़, मुरैना: चंबल का नाम आते ही लोगों को बीहड़ की याद आती है। चारो तरफ रेतीली मिट्टी के टीले। ऐसे में अगर कोई कहे कि चंबल की बीहड़ में मोसंबी की फसल किसानों का आर्थिक स्वास्थ्य सुधार रही है, तो सहसा आपको विश्वास नहीं होगा, लेकिन यह सच है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में फलों की खेती एक चुनौती है, लेकिन जौरा तहसील के चैना गांव के किसानों ने इस चुनौती को पार कर दिखाया है। किसानों ने पहले तो बीहड़ों को समतल किया, जिनमें सालों तक बाजरा, गेहूं या सरसों जैसी फसल होती रही। जब अधिक लाभ नहीं हुआ तो परंपरागत खेती के अलावा अन्य फसलों में हाथ आजमाने की सोची। एक किसान ने हिम्मत की और अब इस गांव में मोसंबी (मौसमी) के बाग लहलहा रहे हैं।
आ रहा जीवन में बदलाव:
जब किसानों को पारंपरिक खेती की तुलना में पांच गुना लाभ हुआ तो हर साल यहां मोसंबी उगाने वाले किसानों की संख्या और खेती का रकबा बढ़ रहा है। चैना के खेतों में मोसंबी की बंपर पैदावार देख आस-पड़ोस के गांवों में भी किसान इसे अपना रहे हैं। चैना गांव की मोसंबी ग्वालियर, आगरा के अलावा दिल्ली तक बिक रही है। मोसंबी की कमाई से अब इस गांव के किसानों के जीवन स्तर में संतोषजनक बदलाव आ रहा है।
पांच साल पहले हुई शुरुआत:
पांच साल पहले गांव के किसान मुरारीलाल ने शौकिया तौर पर घर के पास एक ही बगिया बनाई और उसमें नागपुर से लाकर मोसंबी के कुछ पौधे रोप दिए। मुरारीलाल बताते हैं कि मैं तो सिर्फ प्रयोग करना चाहता था इसलिए न तो मैंने किसी से ज्यादा पूछताछ की, न किसी जानकार की सलाह ली। पहली ही बार में उन्होंने महज 18 बिस्वा (इस क्षेत्र में एक बीघा में 20 बिस्वा होते हैं) जमीन से 80 हजार रुपये की मोसंबी बेची। जबकि गांव के किसान एक बीघा में 12-15 हजार रुपये की अन्य फसल ले पा रहे थे। दूसरी बार में मुरारीलाल ने इसी बाग से 1.40 लाख और तीसरे बार में 1.70 लाख रुपये की मोसंबी बेची। एक बार के खर्च में साल दर साल बढ़ती आमदनी को देखकर ही किसानों ने पारंपरिक खेती छोड़कर, मोसंबी की खेती को अपनाना शुरू किया।
27 किसान 95 बीघा में ले रहे फसल:
गांव में वर्तमान में 27 से ज्यादा किसानों ने लगभग 95 बीघा जमीन को मोसंबी के बागों में परिवर्तित कर दिया है। यहां के किसान महाराष्ट्र के नागपुर से 35 रुपये प्रति पौधे के हिसाब से पौधे लाते हैैं। पहले ही साल में इस पौधे से मोसंबी आना शुरू हो जाती हैं। उद्यानिकी जानकारों के अनुसार सामान्य काली, दो फिट तक गहरी रेतीली मिट्टी मोसंबी की फसल के लिए उपयुक्त होती है।
इसलिए बढ़ रहा रुझान:
हर साल मोसंबी की खेती करने वाले किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है। एक बीघा में गेहूं, सरसों या बाजरा की फसल करने पर किसानों को सारे खर्च काटकर 12 से 14 हजार रुपये बचते हैं, जबकि एक बीघा में लगाए गए मोसंबी के पौधों से एक साल में सभी खर्चे काटकर 1.25 से 1.30 लाख रुपये तक की आमदनी होती है, यानी पांच गुना अधिक लाभ। एक बार पौधा लगाने पर वह पांच से छह साल तक अच्छी पैदावार देता है। महिला किसान गीताबाई बताती हैं कि बाजरा-गेहूं की फसल को मवेशी से बचाने के लिए एक व्यक्ति हर समय खेत पर चाहिए, लेकिन इस फसल को मवेशी कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। मोसंबी से हुए लाभ के कारण बेटे को जौरा में जनरल स्टोर खुलवा दिया है।
ताजा होने से दाम अच्छा मिलता :
इन किसानों से मोसंबी खरीदने वाले आगरा के थोक फल व्यापारी विजय कुमार बताते हैं कि महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश से आने वाली मौसमी सात से 10 दिन पहले टूटी होती है। जबकि मुरैना की मोसंबी एक या दो दिन पहले टूटकर आती है। मुरैना की मोसंबी में नागपुर की मोसंबी जैसी मिठास है, इसलिए मांग बढ़ रही है। किसान ही मोसंबी लेकर आते हैं जिससे उन्हें मंडी में दाम भी अच्छा मिल जाता है।
कथन-1
- मोसंबी मुरैना के चैना गांव के किसानों के जीवन में भी मिठास घोल रही है। साटा व किशनपुर गांव के कुछ किसानों ने मौसमी के बाग लगाना शुरू कर दिया है।
डा. एएस यादव
उद्यानिकी विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र, मुरैना
कथन- 2
- पहले गांव में बाजरा, गेहूं या सरसों की खेती होती थी। अब 27 से ज्यादा किसानों के खेतों में मौसमी के बाग हैं। एक बीघा में सवा लाख रुपये तक का लाभ एक सीजन में होता है।
ज्ञानसिंह यादव
किसान, चैना गांव
