ग्वालियर, जेएनएन। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि संगीत समाज को उन्नत करता है और उन्नत समाज ही देश का भाग्य बदल सकता है। यह सतत और लंबी प्रक्रिया है। संघ इसी कार्य में जुटा है। संघ कोई संगीतशाला, व्यायामशाला या पैरा मिलिट्री फोर्स नहीं है। संघ कौटुंबिक वातावरण वाला समूह है। जिसका कार्य ऐसे गुणवत्ता वाले आयोजनों से उन्नत समाज को तैयार करना है। गांव-गांव और शहर के हर मोहल्ले में ऐसे गुणवत्ता वाले लोग खड़े किए जाएंगे, जो समाज की चिंता करेंगे तो समाज में परिवर्तन आएगा। संघ प्रमुख रविवार को संघ के मध्य भारत प्रांत के स्वर साधक संगम (घोष शिविर) के समापन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। यहां केदारधाम में 25 नवंबर से आरंभ हुए घोष शिविर के समापन अवसर पर 451 घोष वादकों ने उत्कृष्ठ वादन किया। संघ प्रमुख ने रविवार सुबह शहर के संगीत साधकों और रंगकर्मियों से संवाद किया और शाम को उस्ताद हाफिज अली खां स्मृति सरोदघर भी पहुंचे।

देश का भविष्य बदलने के लिए करना होगा श्रेष्ठ समाज का निर्माण

घोष वादकों के प्रदर्शन के बाद संघ प्रमुख ने अपने दृष्टिबोधन में कहा कि देश का भविष्य बदलना है तो श्रेष्ठ समाज का निर्माण करना होगा। श्रेष्ठ समाज श्रेष्ठ लोगों से बनता है। संघ यही कार्य करता है। संघ प्रमुख ने कहा कि हमें ठेकेदारों पर निर्भर नहीं रहना है। लोग धर्म को सिर्फ पूजा मानते हैं। जबकि धर्म चार पुरुषार्थों में से एक है जिसका अनुशरण करने से दोनों लोकों में सुख मिलता है। कार्यक्रम के मंच पर मध्य क्षेत्र के संघचालक अशोक सोहनी, मध्य भारत के संघचालक अशोक पांडे और ग्वालियर के विभाग संघचालक विजय गुप्ता मौजूद रहे।

शांति देता है भारतीय संगीत

मोहन भागवत ने कहा कि जब संघ में घोष की शुरुआत हुई तो उसमें बजाई जाने वाली सभी रचनाएं अंग्रेजों द्वारा बनाई गई होती थीं। इन्हें बजाते समय स्वयंसेवकों में देशभक्ति का भाव नहीं आता था। स्वयंसेवकों ने काफी मेहनत और परिश्रम के बाद भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित रचनाओं का निर्माण किया। संघ द्वारा तैयार की गई रागेश्वरी रचना जिसे धवजरोपण के समय बजाया जाता है, उसे 1945 में पहली बार बजाया गया। संघ प्रमुख ने कहा कि भारतीय संगीत पर आधारित रचनाएं मन को शांत करती हैं, जबकि पश्चिम के संगीत के मूल में रोमांच है।

Edited By: Sachin Kumar Mishra