MP के गांधी सागर में रहस्य और रोमांच के साथ प्रकृति पढ़ाती है इतिहास, चट्टानों पर है 20 हजार साल पुरानी कहानी
मध्य प्रदेश का गांधी सागर अभयारण्य हजारों साल पुराने शैलचित्रों, वन्यजीवों और ऐतिहासिक स्थलों का संगम है। यह स्थान प्रकृति, ...और पढ़ें

रहस्य और रोमांच के साथ यहां प्रकृति पढ़ाती है इतिहास
HighLights
गांधी सागर में 20 हजार साल पुराने शैलचित्र मौजूद हैं।
अभयारण्य में तेंदुए, चीते और 225 प्रजातियों के पक्षी हैं।
जलाशय में नौका विहार और मगरमच्छ देखने का रोमांच मिलता है।
आलोक शर्मा, मंदसौर। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में गांधी सागर सिर्फ जंगल और जलाशय का नाम नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने मानव जीवन की खुली किताब भी है। अभयारण्य में जंगल की पगडंडी पर चलते हुए यकायक सामने चट्टान आती है। नजर चट्टान पर पड़ती है तो वहां हजारों साल पुराना एक चित्र दिखाई देता है।
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कहीं पशु तो कहीं मानव की आकृति और कहीं ऐसी रेखाएं, जिनका अर्थ आज भी रहस्य बना हुआ है। कुछ देर बाद यही रास्ता गांधी सागर के विशाल जलाशय तक ले जाता है, जहां पानी के किनारे धूप सेंकते मगरमच्छ दिखाई देते हैं। ऊपर नजर उठाएं तो पेड़ों के बीच पक्षियों की आवाजें सुनाई देती हैं।

गांधी सागर की यह यात्रा इसलिए भी अलग है, क्योंकि यहां घूमना सिर्फ प्रकृति को देखना नहीं, बल्कि हजारों साल पीछे जाकर मानव सभ्यता के निशान तलाशना भी है। एक ओर घना जंगल और वन्यजीव हैं तो दूसरी ओर चट्टानों पर उकेरी गई हजारों साल पुरानी मानव कल्पना। यही इतिहास, पुरातत्व और प्रकृति का संगम गांधीसागर को एक अलग तरह की यात्रा का अनुभव बनाता है।
चतुर्भुजनाथ नाला - पत्थरों की खुली किताब
यात्रा की शुरुआत चतुर्भुजनाथ नाले से करें। यहां करीब पांच किमी क्षेत्र में शैलचित्रों की प्राकृतिक गैलरी फैली है। इन चट्टानों पर बने चित्र करीब पांच से 20 हजार वर्ष पुराने बताए जाते हैं। मानव, पशु, पक्षी और अलग-अलग आकृतियां उस समय के जीवन और कल्पना की झलक देती हैं।

इन चित्रों को देखते हुए यह कल्पना करना रोचक है कि जिस चट्टान के सामने आज पर्यटक खड़ा है, उसी के सामने हजारों वर्ष पहले कोई शिकारी या मानव समूह बैठा होगा। यहां मध्याश्म, शिकारी-संग्राहक, नवपाषाण और ताम्रपाषाण काल से जुड़े चित्र भी बताए जाते हैं।
पक्षी प्रेमियों के लिए खास है यह क्षेत्र
शैलचित्रों के बाद अभयारण्य का जंगल यात्रा को बिल्कुल अलग रंग देता है। यहां तेंदुए सहित कई वन्यजीवों को देखने का अवसर मिल सकता है। चीतों की मौजूदगी ने भी गांधीसागर को देश के नए वन्यजीव पर्यटन स्थलों में शामिल किया है। सुबह जंगल की ओर निकलें तो पेड़ों के बीच पक्षियों की अलग-अलग आवाजें सुनाई देती हैं। यहां 225 प्रजातियों के पक्षी हैं। इसलिए पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह क्षेत्र खास है।

मगरमच्छ और नौका विहार
करीब 60 वर्ग किमी में फैला गांधीसागर जलाशय इस यात्रा का सबसे शांत पड़ाव है। नौका विहार करते हुए दूर तक फैले पानी और आसपास की पहाड़ियों को देख सकते हैं। जलाशय के किनारों पर धूप सेंकते मगरमच्छ नजर आ जाएं तो रोमांच और बढ़ जाता है। सुबह की सुनहरी धूप या शाम के समय पानी पर पड़ती सूरज की किरणें यहां कुछ देर ठहरने के लिए मजबूर करती हैं।
एक यात्रा में चार और ठिकाने
हिंगलाजगढ़ किला- घने जंगल के बीच स्थित यह प्राचीन किला इतिहास प्रेमियों के लिए खास है। यहां हिंगलाज माता का मंदिर भी है।
धर्मराजेश्वर- गांधीसागर से करीब 50 किमी दूर एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया प्राचीन मंदिर है। आसपास करीब 51 बौद्धकालीन गुफाएं भी हैं।
तक्षकेश्वर- कुंड, मंदिर और प्राकृतिक झरना, प्रकृति और आस्था का सुंदर मेल यहां दिखता है। इसका संबंध तक्षक नाग से जोड़ा जाता है।
पशुपतिनाथ मंदिर- मंदसौर की ओर लौटते समय इस प्रसिद्ध मंदिर को यात्रा में शामिल किया जा सकता है।
क्या खाएं?
मंदसौर और आसपास दाल-बाफले, मालवी भोजन, पोहा, कचौरी और जलेबी का स्वाद जरूर लें। अभयारण्य क्षेत्र में निकलते समय पर्याप्त पानी और हल्का भोजन साथ रखना उपयोगी रहेगा।
कहां ठहरें?
गांधीसागर और आसपास पर्यटन विभाग के ठहरने के विकल्प, स्थानीय होटल और रिसार्ट उपलब्ध हैं। परिवार के साथ आ रहे हैं तो सप्ताहांत या छुट्टी के दिनों के लिए पहले से बुकिंग करना बेहतर रहेगा।
कैसे पहुंचे?
इंदौर से सड़क मार्ग- करीब 250 किमी। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से यात्रा आसान हुई है। नीमथुर एक्सचेंज से गांधीसागर पहुंचा जा सकता है।
रेल मार्ग- भवानी मंडी करीब 45 किमी, रामगंजमंडी 40 किमी और शामगढ़ करीब 60 किमी दूर है।
हवाई मार्ग- इंदौर और उदयपुर हवाई अड्डे करीब 250 किमी दूर हैं।
