भोपाल, जागरण डिजिटल डेस्‍क। लंकाधिपति रावण से युद्ध में विजय होकर प्रभु श्रीराम अपने भाई लक्ष्‍मण के साथ जबलपुर के नर्मदा तट पर आए थे। हालांकि, इससे पहले भी वह पहले एक बार यहां आ चुके थे। उनका पहला जबलपुर आगमन वनवास अवधि से, जबकि दूसरा ब्रह्महत्या के दोष से निवृत्ति की साधना से संबंधित था।

इस संबंध में स्कंदपुराण के रेवाखंड में रोचक कथा वर्णित है, जिसके अनुसार श्रीराम-लक्ष्मण ने हनुमान के अधिक समय तक अज्ञातवास में रहने का कारण पूछा। इस पर हनुमान ने बताया कि वह नर्मदा तट पर प्रकृति हत्या व ब्रह्महत्या के दोष का निवारण करने के लिए साधना में लीन थे।

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नंदी ने हनुमान को कैलाश में जाने से रोका

रुद्रावतार होने के कारण जब वह हिमालय स्थित शिवधाम कैलाश पहुंचे, तो द्वार पर नंदी ने उन्‍हें रोककर कहा कि रावण की अशोक वाटिका उजाड़ने के साथ लंका दहन करने और महापंडित रावण के वंशजों की हत्या के कारण उन पर प्रकृति व ब्रह्महत्या का दोष लगा है, जिससे निवृत्ति के लिए उन्‍हें सिद्धिदात्री नर्मदा के तट पर साधना करना होगा।

इसके बाद ही वह शिवधाम में प्रवेश के अधिकारी होंगे। इसलिए नंदी के परामर्श के अनुरूप हनुमान ने नर्मदा किनारे एक शांत और सुंदर स्थान खोजकर वहां साधना शुरु कर दी, जिसके बाद उन्‍हें दोनों दोषों से मुक्ति मिल गई। इसके बाद जब वह कैलाश पहुंचे तो नंदी ने उनका स्वागत-सत्कार कराया और भगवान शिव का दर्शन भी कराया।

हनुमान से पूरी बात सुनकर श्रीराम और लक्ष्‍मण भी पहुंचे यहां

हनुमान से सारी कथा सुनकर श्रीराम-लक्ष्मण ने भी ब्रह्महत्या के दोष से निवृत्ति का संकल्प लिया। वे हनुमान के साथ उसी स्थान पर पहुंचे, जहां साधना करके उन्होंने प्रकृति व ब्रह्महत्या के दोष का निवारण किया था। जबलपुर में नर्मदा नदी के किनारे लम्हेटाघाट में पहुंचकर श्रीराम-लक्ष्मण ने सर्वप्रथम बालुका (रेत) से एक-एक शिवलिंग निर्मित किया।

दोनों शिवलिंगों की प्राण प्रतिष्‍ठा की गई। यहां राम द्वारा निर्मित शिवलिंग आकार में बड़ा, जबकि लक्ष्मण का शिवलिंग छोटा है। वर्तमान में एक प्राचीन मंदिर में ये शिवलिंग स्थापित हैं। इस स्थान को अब श्रीरामेश्वर-लक्ष्मणेश्वर-कुंभेश्वर कपितीर्थ के नाम से जाना जाता है।

अपनी तरह का यह एकमात्र जुड़वां शिवलिंग

त्रेता के महानायक विष्णु-अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और शेषनाग के अवतार अनुज लक्ष्मण द्वारा त्रिपुरारी शिव का पूजन करने के लिये स्थापित किये गये जुड़वा शिवलिंग अस्तित्व में आने के साथ ही शिव-भक्तों की आस्था के केंद्र बन गये थे। त्रेतायुग से शुरू हुई उनके पूजन की परम्परा कलयुग में भी अनवरत जारी है। इस तीर्थ-स्थल के आसपास नीलगिरी पर्वत, सूर्य कुंड, शनि कुंड, इंद्र गया कुंड, ब्रह्मा विमर्श शिला, बलि यज्ञ स्थली सहित काफी संख्या में आस्था के प्रतीक स्थल विद्यमान हैं।

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Edited By: Arijita Sen

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