बुरहानपुर, संदीप परोहा । कमला चारण ने 2015 में समाज से इस कुरीति को दूर कर गांव की बेटियों को उच्च शिक्षित बनाने का संकल्प लिया और लगातार लोगों को जागरूक करना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने अपनी दो बेटियों को शहर के स्कूल में भेजकर लोगों के सामने उदाहरण पेश किया। मालूम हो कि हिंदू संस्कृति में हमेशा से महिलाएं न सिर्फ पूज्यनीय रही हैं, बल्कि समाज में कई तरह के बदलाव भी महिलाओं के कारण ही आए हैं। शहर से लगे आदिवासी बहुल झांझर गांव में भी एक महिला के प्रयासों से बालिका शिक्षा के क्षेत्र में इतना बड़ा परिवर्तन हुआ है कि यह गांव बालिका शिक्षा का रोल माडल बन गया है।

आदिवासी समाज में बेटियों की शिक्षा को लेकर फैली थी भ्रांति

जानकारी हो कि अब से दो दशक पहले तक इस गांव की अधिकांश बेटियां पांचवीं कक्षा से ज्यादा शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाती थीं। इसका कारण आदिवासी समाज में शहरी वातावरण और बेटियों की शिक्षा को लेकर फैली भ्रांति थी। आदिवासी समाज को जागरूक कर यह परिवर्तन लाने वाली कमला राजू चारण खुद सिर्फ पांचवीं पास हैं। इसके चलते गांव के स्कूल में पांचवीं के बाद वे बेटियों को घरेलू कामकाज में लगा देते थे और बाद में शादी कर देते थे।

बेटियों को उच्च शिक्षित बनाने का लिया संकल्प

मालूम हो कि कमला चारण ने 2015 में समाज से इस कुरीति को दूर कर गांव की बेटियों को उच्च शिक्षित बनाने का संकल्प लिया और लगातार लोगों को जागरूक करना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने अपनी दो बेटियों को शहर के स्कूल में भेजकर लोगों के सामने उदाहरण पेश किया। धीरे-धीरे लोगों को उनकी बातों पर भरोसा होने लगा और वे अपनी बेटियों को भी शहर के बड़े स्कूलों में पढ़ने भेजने लगे।

पचास साल के इतिहास में यह यह पहली बार हुआ

जानकारी के अनुसार पचास साल के इतिहास में यह यह पहली बार हुआ है जब गांव की 50 बेटियां आसपास व शहर के स्कूलों में पढ़कर बारहवीं कक्षा तक पहुंचीं हैं। वर्तमान में स्थिति यह है कि गांव की सौ से ज्यादा बेटियां शहर के स्कूल, कालेजों में पढ़ाई कर रही हैं। पचास साल में पहली बार चालीस बेटियां बारहवीं तक पहुंचीं इतनी ही बेटियों ने आगे की पढ़ाई के लिए कालेजों में दाखिला लिया है।

समाज की सोच बदलकर बेटियों की पढ़ाई का मार्ग प्रशस्त

जानकारी के अनुसार झांझर गांव की नींव सन 1969 में जीवा नारायण चारण ने रखी थी। तब गांव में आदिवासियों के पांच-छह परिवार ही थे। समय के साथ आबादी बढ़ती गई और अब गांव की आबादी 38 सौ के पार पहुंच गई है। इसमें 84 प्रतिशत आबादी बारेला और भिलाला समाज की है, जबकि शेष ओबीसी वर्ग के हैं। पूरे आदिवासी समाज को इस कुरीति से उबारने का बीड़ा उठाया। इस बदौलत वे समाज की सोच बदलकर बेटियों की पढ़ाई का मार्ग प्रशस्त कर पाईं। 

Edited By: Priti Jha

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