भोपाल , जेएनएन । समूचे देश में जहां दशहरे के पर्व पर बुराई के प्रतीक रावण का दहन किया जाता हैं, देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में एक परिवार ऐसा भी है जो रावण का दहन नही बल्कि रावण को अपना आराध्य मानकर दशानंद की पूजा करता हैं। शहरभर में दशहरे पर 15 अक्टूबर रावण दहन किया जाएगा। लेकिन शहर के मध्यक्षेत्र स्थित परदेशीपुरा में लोग रावण को प्रकांड विद्वान मानकर पूजन करेंगे। पूजन होगा शहर के एक मात्र रावण मन्दिर में।

हर साल इंदौर में दशहरे के दूसरे दिन गौहर परिवार बकायदा रावण के लिये अर्चना और हवन यज्ञ कर समाज की मान्यताओं को दरकिनार कर रावण को प्रकांड विद्वान और महान योद्धा मानकर आराधना करता है। दरअसल, इंदौर के परदेशीपुरा इलाके के अर्जुन गौहर नगर में रावण का एक मंदिर है, दशहरे के दूसरे दिन इंदौर में हवन, पूजन और आरती कर लंकापति रावण की भक्ति की जाती है। ये श्रद्धा आज की नहीं बल्कि लगभग चालीस साल पुरानी है और इसी परंपरा को इंदौर का गौहर परिवार निभा रहा है। पूरा परिवार रावण को ही अपना आराध्य मानकर उसकी पूजा करता चला आ रहा है। परिवार का मानना है कि रावण को बुराई के स्वरुप में देखने वाले लोगो को रावण की अच्छाई और प्रकाण्डता को भी देखना चाहिए।

हालांकि इस बार कोरोना संक्रमण के चलते छोटे कद के ही सही पर जगह-जगह दहन के लिए रावण के पुतले बनाए जा रहे हैं। इससे अलग परदेशीपुरा स्थित रावण मंदिर में रावण की महापूजा की तैयारियां चल रही । इस अवसर पर सन्तान की कामना से लोग रावण पूजन करेंगे। यज्ञ-हवन के साथ लंकापति को महाभोग लगाया जाएगा।

रावण को जमाई राजा मानकर करते हैं पूजा

मंदसौर शहर की घनी बस्ती वाले पुराने क्षेत्र खानपुरा में 400 साल पुरानी रावण की प्रतिमा है। रावण को जमाई राजा मानकर दशहरे को नामदेव छीपा समाज पूजा-अर्चना करता है । ऐसी मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी का पीहर मंदसौर में ही था। इसके चलते खानपुरा क्षेत्र में रावण को जमाई राजा मानकर ही पूजा जाता है। समाज के लोग ढोल बाजे के साथ धूमधाम से रावण प्रतिमा के सामने पहुंचते हैं और फिर पूजा-अर्चना कर पैर में लच्छा बांधते हैं। शाम को माफी मांगकर प्रतीकात्मक वध भी करते हैं।

रावण को जमाईराजा मानने की मान्यता के कारण ही नामदेव समाज सहित कुछ अन्य समाज की बुजुर्ग महिलाएं आज भी रावण की प्रतिमा के सामने से निकलने समय घूंघट निकालती है। 

Edited By: Priti Jha