ग्वालियर, जेएनएन । गुरुपुष्यामृत योग [आज] 25 नवंबर को बन रहा है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार गुरुपुष्यामृत योग आज सुबह 5:45 बजे से शाम 06:15बजे तक रहेगा। इन दिनों शादियों की खरीददारी भी जोरों पर है। गुरुपुष्य पर सर्वार्थसिद्धि व अमृतसिद्धि योग भी बन रहा है, जिस कारण स्वर्ण आभूषण, वस्त्र, वाहन, जमीन जायदाद खरीदना अतिशुभ हाेगा। इन वस्तुओं को खरीदने पर इनका स्थायित्व बना रहेगा। नवंबर माह के 5 शुभ मुहूर्त 25 से 30 नवंबर तक लगातार रहेंगे। इसके बाद 1 दिसंबर से 13 दिसंबर के बीच 6 विवाह मुहूर्त रहेंगे। 14 दिसंबर से खरमास का आरंभ होगा, जिससे सभी मांगलिक कार्यो पर अंकुश लग जाएगा।

मालूम हो कि इस बार खरमास 14 दिसंबर से शुरू होकर 14 जनवरी तक रहेगा। जिसमे मांगलिक कार्य शादी, सगाई, यज्ञोपवीत, गृह प्रवेश, मुंडन, नए घर का निर्माण एवं नया व्यापार आदि मांगलिक कार्यों पर भी रोक लग जाएगी। मार्गशीर्ष और पौष माह के बीच खरमास पड़ता है। इस दरमियान सूर्य देव धनु राशि में प्रवेश करते हैं, इसके साथ ही खरमास आरंभ हो जाता है और एक माह बाद जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह समाप्त होता है। यह माह भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की विशेष पूजा का माह माना गया है। इन दिनों में गीता का पाठ व विष्णु सहस्त्रनाम पढ़ें और श्रीकृष्ण और विष्णु भगवान के मंत्रों का जाप करें। खरमास का महीना दान और पुण्य का महीना होता है, इस माह में बिना किसी स्वार्थ के दान करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

जानकारी हो कि मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी 30 नवंबर मंगलवार को उत्पन्ना एकादशी के नाम से मनाई जाएगी। उत्पन्ना एकादशी का हिंदू धर्म में बेहद महत्व है। मान्यता है कि जो उत्पन्ना एकादशी का व्रत नियम और निष्ठा से पूरा कर लेता है, वह जीवन में सभी सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो भक्तगण एकादशी के लिए सालाना उपवास रखना चाहते हैं, उन्हें इसे उत्पन्ना एकादशी से ही शुरू करना चाहिए। यह दिन विष्णुजी की शक्तियों में से एक देवी एकादशी के सम्मान में मनाया जाता है।ज्योतिषाचार्य के अनुसार इस दिन विधि-विधान के साथ भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। उत्पन्ना एकादशी तिथि का आरंभ 30 नवंबर मंगलवार प्रातः 04:13 बजे से शुरु होकर 1 दिसंबर बुधवार मध्यरात्रि 02: 13 बजे तक रहेगा। व्रत खोलने का समय 1 दिसंबर, बुधवार को सुबह 7 बजकर 40 मिनट से सुबह 9 बजे तक रहेगा।

उत्पन्ना एकादशी व्रत नियम दशमी तिथि से ही शुरू हो जाते हैं। द्वादशी पर करीब 36 घंटे बाद पारण के साथ खत्म होता है। एकादशी व्रत रखने वालों को दशमी तिथि पर सूर्यास्त से पहले भोजन कर लेना चाहिए, इस बात का ध्यान रखें कि सिर्फ सात्विक और हल्का आहार ही लें। मान्यता है कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखने का फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या और तीर्थ स्थानों में स्नान दान करने से मिलने वाले फलों से भी अधिक होता है। उत्पन्ना एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु जी की पूरे भक्ति भाव से पूजा करने का विधान है।  

Edited By: Priti Jha