भोपाल [संजय मिश्र]। कहते हैं कि वक्त से जो सबक नहीं लेता है वह पीछे छूट जाता है। मध्य प्रदेश में उपचुनाव के जरिये सत्ता में पुनर्वापसी का सपना देख रही कांग्रेस की स्थिति ऐसी ही हो गई है। विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी कांग्रेस को जोड़तोड़ से सत्ता तो मिल गई, लेकिन समय की चाल को न पहचान पाने के कारण बमुश्किल डेढ़ साल भी वह इसे संभाल नहीं पाई। 

आपसी झगड़े ने कांग्रेस की ऐसी गति कर दी कि बैठे बैठे ही सत्ता हाथ से निकल गई। यह सार्वजनिक तथ्य है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को न संभाल पाने के कारण ही कमल नाथ की सरकार का पतन हुआ। सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के बाद माना जा रहा था कि कांग्रेस खुद को उबारने के लिए वैसे ही सारे उपाय करेगी जैसे दूध का जला छांछ भी फूंककर पीता है, लेकिन हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि उसके नेता सबक लेने को तैयार नहीं हैं। सत्ता से हटे अभी चार माह ही हुए हैं कि कांग्रेस दोराहे पर खड़ी हो गई है। उसे सूझ ही नहीं रहा कि जाना कहां है।

राज्य विधानसभा की 24 सीटों पर वह जैसे-जैसे उपचुनाव का माहौल बनाने की कोशिश करती है, वैसे ही उसे झटका लगने लगता है। उपचुनाव वाले क्षेत्रों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। यह झटका उसे अपने ही दे रहे हैं। पिछले एक माह के अंदर तीन विधायकों प्रद्युम्न सिंह, सुमित्र देवी एवं नारायण पटेल ने इस्तीफा देकर साफ कर दिया है कि कांग्रेस के अंदर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।

आखिर सत्ता परिवर्तन के समय कांग्रेस के पक्ष में मजबूती से खड़े रहे इन तीन विधायकों के साथ ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने पार्टी को अलविदा कहने के साथ विधायक पद से भी इस्तीफा दे दिया। किसी भी नेता के लिए पार्टी छोड़ना उतना कठिन नहीं होता जितना विधायक पद छोड़ देना। जाहिर है कि इन विधायकों ने सोच-समझकर ही ऐसा कदम उठाया होगा।

भारतीय जनता पार्टी में शामिल होते समय उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर जो तोहमत मढ़ी वह नेताओं को आईना दिखाने वाली है। हाल ही में विधायक प्रद्युम्न के कांग्रेस छोड़ने पर पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ और दिग्विजय सिंह ने दावा किया था कि जिन्हें जाना था वे जा चुके हैं, अब जो हैं वे चट्टान की तरह पार्टी के साथ खड़े रहेंगे। आखिर इन दोनों नेताओं ने यह दावा किस आधार पर किया था, यह तो वे ही जानते हैं, लेकिन यह बड़ी सच्चाई है कि राज्य में कांग्रेस का ढांचा चरमराने लगा है। युवा नेतृत्व की खोज हो ही नहीं रही है और जो जमे जमाए वरिष्ठ नेता हैं, उन्होंने पार्टी को गुटों में बांट लिया है। वे अपनों को ही समायोजित करने में लगे हैं। इससे पार्टी में बिखराव स्पष्ट दिख रहा है।

पुरानी गलतियों को दोहराव : 

कांग्रेस की वैचारिक और व्यावहारिक मजबूरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस नेता का हनी ट्रैप मामले में शामिल महिला आरोपी के साथ वीडियो वायरल हुआ था, उसे फिर एक जिले के जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी गई। राज्य में मजबूत मानी जाती रही कांग्रेस के नेतृत्व का अब आम कार्यकर्ताओं से जुड़ाव वैसा नहीं रह गया है जैसा पहले हुआ करता था। हाल ही में इस्तीफा देने वाले विधायकों ने साफ कहा है कि कांग्रेस में रहकर वे क्या करते, कमल नाथ से मिल पाना भी उनके लिए मुश्किल था। मिलने पर भी नेतृत्व का व्यवहार कुलीन जैसा था।

मतलब साफ है कि कांग्रेस नेतृत्व भरोसे के संकट से गुजर रहा है। पार्टी ने अपने विधायक दल की कमजोर कड़ियों पर नजर रखने के लिए अनौपचारिक रूप से वरिष्ठ विधायकों की टीम बनाई है, जिसमें कमल नाथ के नजदीकी विधायक ज्यादा हैं। इसमें शामिल अनेक विधायक सिर्फ बयानबाजी तक ही सिमट गए हैं। हाल ही में त्यागपत्र देने वाले विधायक नारायण पटेल के बारे में जब तक टीम को पता लगा तब तक वह पाला बदल चुके थे। यदि स्थिति ऐसी ही रही तो उपचुनाव आते-आते पार्टी को इससे भी कठिन स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।

पुरानी गलतियों से कोई सीख नहीं ले रही कांग्रेस :  

राज्य में नेतृत्व को लेकर कांग्रेस की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इतनी दुर्गति के बाद भी प्रदेश अध्यक्ष एवं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर एक ही आदमी का चेहरा सामने रखा जा रहा है। इस संबंध में विचारणीय सवाल यह भी है कि 74 साल के कमल नाथ के अलावा पार्टी एक अदद ऐसा युवा चेहरा नहीं खोज पा रही है, जिसे नेता प्रतिपक्ष बनाकर पार्टी को सदन के अंदर धार दी जाए। हालांकि ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन सवाल नेतृत्व के विश्वास का है। कांग्रेस की लाइन से हटकर बयानबाजी करने वाले नेताओं पर भी अंकुश नहीं लग पा रहा है। 

कांग्रेस के कई नेताओं की दूर नहीं हो रही नेतृत्व से नाराजगी : 

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह समन्वय के खिलाड़ी माने जाते हैं, लेकिन हालत यह है कि वह अपने छोटे भाई और वरिष्ठ विधायक लक्ष्मण सिंह को नहीं समझा पा रहे हैं। लक्ष्मण सिंह कई बार पार्टी लाइन को पार कर चुके हैं। कभी वे हाईकमान को चुनौती देते हैं तो कभी प्रदेश नेतृत्व के फैसलों पर सवाल खड़े करते हैं।

कमल नाथ सरकार में मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज रहे केपी सिंह की शिवराज सरकार के मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र से मुलाकात के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। हालांकि केपी सिंह ने क्षेत्र के विकास के नाम पर अपनी मुलाकात को उचित बताकर विरोधियों पर निशाना साधा है, लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी में फूट रहे असंतोष के बुलबुले बड़ा गुल खिला सकते हैं। (स्थानीय संपादक, नवदुनिया)  

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