भोपाल [संजय मिश्र]। लंबे सियासी संग्राम के बाद शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन अब तक उनकी सरकार अधूरी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के योगदान से बनी भाजपा की सरकार के वे एकमात्र चेहरे हैं। शपथ लेने के लगभग आधा महीना बीतने बाद भी उनकी कैबिनेट का गठन न हो पाना अपने आप में कई सवाल खड़े कर रहा है।

कोरोना संकट से जूझती राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए कैबिनेट का होना बहुत ही जरूरी है। राज्य के हित में लिए जाने वाले फैसलों पर कैबिनेट की मुहर संवैधानिक अनिवार्यता भी है। ऐसे में काम चलाने के लिए सरकार को कार्योत्तर अनुमोदन की प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ रहा है।

यद्यपि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद वह कैबिनेट का गठन कर लेंगे, पर जो मौजूदा हालात दिख रहे हैं उसमें यह कहना मुश्किल है कि 14 अप्रैल को लॉकडाउन की अवधि बीतते ही परिस्थितियां सामान्य हो जाएंगी।

फिलहाल तो मध्य प्रदेश दूसरे राज्यों की तरह ही कोरोना संकट से जूझ रहा है। ऐसे में पूर्ण सरकार का होना बहुत ही आवश्यक है। शिवराज सरकार बन तो गई, लेकिन पूरी व्यवस्था अफसरों के भरोसे ही चल रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता, उनके अनुभव और पारदर्शितापूर्ण कार्यशैली भले ही संकट से निपटने में अफसरशाही को दिशा दे रही हो, लेकिन यह भी सच है कि कोई एक व्यक्ति पूरी व्यवस्था पर हमेशा बारीक नजर नहीं रख सकता।

प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं सुचारू रूप से चलें, कानून व्यवस्था का संकट खड़ा न हो, लॉकडाउन में घरों में रह रहे लोगों को कोई दिक्कत न हो, खाद्य आपूर्ति की व्यवस्था बनी रहे, इसके लिए सघन निगरानी की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को योग्य व अनुभवी मंत्रियों की टीम चाहिए, जो कोरोना संकट से निपटने के लिए योजना बनाएं और उसका क्रियान्वयन भी कराएं। निश्चित रूप से शिवराज एक अनुभवी मुख्यमंत्री हैं। वह सभी मोर्चों पर अकेले डटे हुए भी हैं।

पुलिस, स्वास्थ्य और सफाई कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाने के लिए कोरोना के संक्रमण के खतरे की परवाह किए बगैर उनके बीच पहुंच जाते हैं। उनका हौसला बढ़ाते हैं। छात्र-छात्राओं का हाल जानने के लिए छात्रावासों में पहुंच जाते हैं। प्रतिदिन सारे अफसरों के साथ कोरोना नियंत्रण की समीक्षा करते हैं। जहां अफसर लापरवाही करते हैं, वहां फटकार लगाते हैं और आवश्यकता पड़ी तो उन्हें हटाते भी हैं। उनकी पूरी कोशिश यही है कि कोरोना पर जीत हासिल की जाए।

सभी जिलों के कलेक्टरों से बातचीत कर प्रतिदिन का अपडेट लेते हैं, पर यदि कैबिनेट होती तो सरकार की यही कार्यक्षमता कई गुना बढ़ जाती। कांग्रेस अनायास ही इस बात की खिल्ली नहीं उड़ा रही कि संकट के दौर में भी शिवराज अपनी कैबिनेट का गठन नहीं कर पा रहे हैं। निश्चित रूप से इस मुद्दे पर भाजपा और शिवराज दोनों ही गंभीरता से विचार भी कर रहे होंगे, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि कैबिनेट के गठन में विलंब के पीछे भाजपा क्षत्रपों के बीच की रस्साकसी भी एक कारण हो सकती है।

कैबिनेट का गठन न हो पाने का एक बड़ा कारण सिंधिया समर्थकों का समायोजन का पेच भी हो सकता है। उनके साथ भाजपा किस तरह संतुलन बनाती है, यह देखने वाली बात होगी। माना जा रहा है कि शिवराज की कैबिनेट में एक तिहाई से ज्यादा चेहरे सिंधिया समर्थकों के होंगे। उनके 22 समर्थक विधायकों ने कमल नाथ सरकार के खिलाफ हल्ला बोलकर इस्तीफा दिया था। इसके कारण ही कांग्रेस की 15 महीने पुरानी सरकार गिर सकी। यह भी विचारणीय है कि भाजपा जैसे- तैसे सिंधिया के साथ संतुलन बनाकर कैबिनेट का गठन कर लेती है तो भी उसकी दुश्वारियां कम होने वाली नहीं हैं।

शिवराज व भाजपा के ऊपर सिंधिया समर्थक पूर्व विधायकों को विधानसभा उपचुनाव में जिताने की जिम्मेदारी भी आने वाली है। 230 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में पहले से ही दो सीटें खाली हैं। इस तरह 24 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है। उपचुनाव में जीत का गणित शिवराज और सिंधिया की जोड़ी को ही निकालना है। ज्यादातर 16 सीटें सिंधिया के गढ़ ग्वालियर और चंबल से ही हैं।

उपचुनाव में जनता का फैसला सरकार के भविष्य पर मुहर लगाएगा। कांग्रेस को इन सीटों पर कमतर आंकना भाजपा की बड़ी भूल हो सकती है। कांग्रेस इस कोशिश में है कि वह जनता के सामने सिंधिया समर्थकों को सत्ता की खातिर सरकार गिराने और उनके मताधिकार का दुरुपयोग करने का आरोप मढ़े। उपचुनाव में अपने कार्यकर्ताओं, नेताओं को संभालकर रखना भी भाजपा के लिए कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगा। (स्थानीय संपादक, नवदुनिया, भोपाल) 

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