भोपाल, जेएनएन। केंद्र सरकार का एक हलफनामा बीते मंगलवार इंदौर हाई कोर्ट पहुंचा। इसमें कहा गया है कि ‘मध्य प्रदेश बीमारियों का गढ़ है, इसलिए यहां बीमारियों को नियंत्रित करने में परेशानी आती है। केंद्र सरकार ने प्रदेश में कई जगह अलर्ट भी घोषित कर रखा है।’ चिकनगुनिया, स्वाइन फ्लू, डेंगू जैसी बीमारियों से मध्य प्रदेश में लगातार होती मौतें और बढ़ते प्रकोप के चलते वर्ष 2017 में यह याचिका लगाई गई थी।

इसका जवाब आने में साल भर का समय लग गया, लेकिन चुनाव के ठीक पहले स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोलता जो उत्तर आया है, वह प्रदेश सरकार से प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त है। मध्य प्रदेश में चुनाव की कमान संभाल रहे कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ‘40 दिन- 40 सवाल’ की पहली किस्त में ही लचर-लाचार स्वास्थ्य सेवाओं का आरोप लगा चुके हैं।

आरोप-प्रत्यारोप से अलग हटकर यदि जमीनी हकीकत टटोलें तो भी मध्य प्रदेश की स्थिति चिंताजनक है। नीति आयोग द्वारा इसी साल फरवरी में जारी देश की पहली व्यापक स्वास्थ्य सूचकांक रिपोर्ट स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत (जो विश्व में अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है) प्रदेश सरकार को बदतर और बेहाल स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में आगाह कर चुकी है। इसमें विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति व प्रगति का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट के कुछ तथ्य इस तरह हैं।  

बड़े राज्यों में नवजात मृत्यु दर के मामले में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा सबसे कमजोर तीन राज्यों में रहे। पांच वर्ष से कम आयु में शिशु मृत्यु दर के मामले में भी ओडिशा, असम और मध्य प्रदेश सबसे कमजोर तीन राज्यों में रहे। संपूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य पाने में जम्मू-कश्मीर, मिजोरम और अंडमान निकोबार ने शत-प्रतिशत परिणाम दिया। लेकिन मध्य प्रदेश, दादरा-नगर हवेली और नगालैंड सबसे कमजोर राज्यों में रहे। 

 अब नजर डालते हैं यूएनडीपी (यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम) और ओपीएचआइ (ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव) की एक रिपोर्ट पर। इस रिपोर्ट में बताया गया कि है देश के 29 राज्यों में, गरीबी के मामले में मध्य प्रदेश चौथे नंबर पर है। इनमें भी देश का सबसे गरीब जिला मध्य प्रदेश का आलीराजपुर है। यही नहीं, इस मामले में झारखंड से बराबरी करते हुए मध्य प्रदेश के 20 फीसदी लोग गरीबी की कगार पर हैं। रिपोर्ट को बनाते समय जो पैमाने लिए गए हैं, उनमें सेहत और जीवन स्तर, पोषण, बाल मृत्युदर, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता जैसे अधिकांश पैमाने प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं से ही जुड़े हुए हैं।

 बीते पांच-दस साल में डेंगू, चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का प्रकोप छोड़ दें तो भी मध्य प्रदेश अभी ठीक तरीके से मलेरिया से ही नहीं लड़ पाया है। वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में मलेरिया के मामलों में भारत की हिस्सेदारी छह प्रतिशत है। वर्ष 2016 में देश में मलेरिया के लगभग 10.6 लाख मामले सामने आए थे। स्वास्थ्य मंत्रालय ने वर्ष 2030 तक देश को मलेरिया मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया है, जबकि मध्य प्रदेश के सभी जिलों में आज भी इसका प्रकोप है।

 स्वास्थ्य मंत्रालय की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश का मंडला जिला मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों की सूची में विश्व में नंबर एक पर पहुंच गया था। तब जिले के 610 गांव मलेरिया की चपेट में थे। यह संख्या विश्व में सबसे ज्यादा थी। ऐसे चिंताजनक आंकड़ों के बाद ही जबलपुर स्थित राष्ट्रीय जनजाति स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने मंडला में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया। संस्थान के निदेशक डॉ. अपरूप दास बताते हैं, ‘इसी प्रकोप को कम करने के लिए हम राज्य सरकार और दवा कंपनी के साथ मिलकर मंडला जिले के 1,233 गांवों में अभियान चला रहे हैं। इसके तहत घर-घर जाकर खून की जांच करना, मलेरिया की आशंका होने पर तुरंत इलाज शुरू करवाना, बचाव के तरीके आदि काम प्रमुख हैं।

 मच्छरों में पाए जाने वाले पांच में से चार परजीवी (पैरासाइट्स) मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं। इनमें सबसे खतरनाक है प्लाज्मोडियम फॉल्सीपेरम। इससे मौत तक हो सकती है और प्रदेश में इसी का सबसे ज्यादा प्रकोप है। बीमारियों का प्रकोप प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी है। जैसे देशभर में औसतन टीबी के जितने मरीज हैं, ग्वालियर-चंबल इलाके में पाए जाने वाली सहरिया जनजाति में उसकी तुलना में 10 गुना ज्यादा पीड़ित हैं।’ 

 केंद्र सरकार के राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में वर्ष 2015 से 31 सितंबर 2018 तक डेंगू से 9,156 मरीज मिले और अब तक 27 की मौत भी हो चुकी है। इस साल देशभर में चिकनगुनिया के सबसे ज्यादा मामले कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश में ही हैं। जब सरकारी आंकड़ा ही यह है, तो समझा जा सकता है कि मैदानी स्तर पर स्थिति कितनी विकट होगी। स्वाइन फ्लू को लेकर जबलपुर हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी अब तक इंदौर में लैब स्थापित नहीं हो पाई। डॉक्टरों की कमी, बदहाल सरकारी अस्पताल, संसाधनों की कमी पर बात न भी की जाए, तो भी प्रदेश के मौजूदा हालात को देखते हुए देश के दिल की ‘सेहत’ ठीक नहीं कही जा सकती।

 स्वास्थ्य एक गंभीर मसला है। इसे ऐसा चुनावी मुद्दा नहीं बनना चाहिए जो सरकारों के आने-जाने के बीच हाशिए पर ही पड़ा रहे। करीब 15 साल सत्ता में रहने वाली भाजपा सरकार को तो इसका जवाब देना ही चाहिए, लेकिन उससे पहले लगातार 10 साल कुर्सी पर काबिज रही कांग्रेस को भी यह तो बताना ही चाहिए कि प्रदेश की बिगड़ती सेहत का उसने कितना ख्याल रखा था? 

 बढ़ने लगा राजनीतिक तापमान 

 मध्य प्रदेश में चुनावी सरगर्मी धीरे-धीरे जोर पकड़ रही है। भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की प्रदेश में आवाजाही के बीच सीटों के बंटवारे की कवायद भी शुरू हो गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता मध्य प्रदेश में स्क्रीनिंग कर रहे हैं तो कांग्रेस में सारा मंथन दिल्ली में ही हो रहा है। दोनों राजनीतिक दलों के पास ही अपने-अपने फॉरमूले हैं। भाजपा डेंजर जोन में आने वाले सीटों की पहचान कर रही है। बताया जा रहा है कि 70 से 80 विधायकों की सीट कट सकती है। वहीं कांग्रेस बीते विधानसभा चळ्नाव में 20 हजार से ज्यादा वोटों से हारने वाले विधायकों को बाहर करने के मूड में है। चूंकि अब लगभग एक सप्ताह ही शेष है, इसलिए प्रदेश का राजनीतिक तापमान बढ़ने लगा है।

 

Posted By: Tanisk