नई दिल्ली, [प्रशांत मिश्र]। खंबात की खाड़ी से लेकर बंगाल की खाड़ी तक मोदी सुनामी ने कांग्रेस को नेस्तनाबूद कर दिया। संप्रग सरकार के कुशासन और मंत्रियों के दंभ से उपजे आक्रोश को नरेंद्र दामोदरभाई मोदी ने न सिर्फ दिशा दी, बल्कि खुद की पैदा की इस लहर पर सवार होकर दिल्ली की सत्ता के शिखर तक भाजपा को पहुंचा दिया। नतीजे जितने ऐतिहासिक और चौंकाने वाले हैं, उससे कहीं ज्यादा इस चुनाव का प्रभाव दूरगामी होने जा रहा है। मोदी की ऐतिहासिक जीत ने राजनीति और खासकर चुनाव की तासीर बदल दी है। सियासत का रुख परिवर्तित कर दिया है। एक मील का पत्थर स्थापित कर दिया है जो आने वाले संभवत: हर चुनाव पर हावी दिख सकता है। साथ ही यह संदेश भी स्पष्ट कर दिया कि विकास को नजरअंदाज कर जातिवाद और सांप्रदायिकता का मुद्दा अब लोगों को नहीं भरमा सकता।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर तक पहुंच गई हो और बसपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी खाता खोलने में भी असफल रही हो, वामदल और पीछे चले गए हों, समाजवादी पार्टी केवल अपना कुनबा बचाने में सफल रही हो तो संदेश बहुत सहज है। जनता ने उन मुद्दों और तौर-तरीकों को खारिज कर दिया जिसके आधार पर मोदी को घेरने की कोशिश हो रही थी। जनता ने यह बता दिया कि उन्हें नफरत की राजनीति रास नहीं आती। दरअसल, जीत विकास की राजनीति की हुई है। मोदी खुलकर यह कहने से नहीं चूके कि उनकी राजनीति में तुष्टीकरण नहीं सबका विकास होगा। वह यह संदेश देने में सफल रहे कि लड़ाई दो संप्रदाय के बीच नहीं बल्कि गरीबी के खिलाफ होनी चाहिए। कांग्रेस का दंभ ध्वस्त हो गया तो क्षेत्रीय दलों को सबक मिल गया। जनता ने यह भी जता दिया कि केंद्र की राजनीति में वह क्षेत्रीय सोच से ऊपर उठकर वोट करना चाहती है। वरना कोई कारण नहीं था कि जिस सपा को ढ़ाई साल पहले उत्तर प्रदेश की जनता ने सिर आंखों पर उठा लिया था उसे लोकसभा चुनाव में क्यों हाशिए पर खड़ा कर दिया? बिहार में जदयू के साथ भी ऐसा ही हुआ और कांग्रेस की सहयोगी रालोद को भी यही संदेश मिला। तीन दशक बाद किसी पार्टी को संसद में पूर्ण बहुमत मिला है। जाहिर है कि इसके साथ ही गठबंधन की राजनीति पर फिर से चर्चा छिड़ सकती है। लेकिन, सही मायनों में सवाल गठबंधन और क्षेत्रीय पार्टियों के अस्तित्व को लेकर कम, दबाव की राजनीति से मुक्ति का ज्यादा है। जिस तरह मनमोहन सिंह सरकार पर दबाव का जिक्र करते हुए कई अहम मामलों से अपना पल्ला छुड़ाते रहे, जनता केंद्र सरकार को उससे मुक्त देखना चाहती है। यही मुक्ति अब मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती भी होगी।

पूरे चुनाव का रोचक हिस्सा हाईप्रोफाइल अभियान भी था। मोदी यूं तो तकनीक के प्रेमी हैं, लेकिन इस चुनाव में होलोग्राम 3डी, सोशल मीडिया, चाय पर चर्चा जैसे कार्यक्रम के जरिये जनता से संवाद स्थापित कर उन्होंने यह भी स्थापित कर दिया कि अब पारंपरिक चुनाव प्रचार से आगे बढ़ना हर पार्टी के लिए जरूरी होगा। जिस तरह से मोदी ने शुरुआत से जाति व संप्रदाय की तुलना में युवाओं और महिलाओं के साथ-साथ लोगों की नौकरी और पेशे के साथ अपने चुनाव अभियान को जोड़ा, वह भी एक साहसिक प्रयोग था। ऐसा नहीं था कि मोदी ने जातीय कार्ड नहीं खेला, लेकिन वह सिर्फ जातीय पहचान या अस्तित्व नहीं, बल्कि उसे समर्थ और समृद्ध भारत की पहचान के साथ जोड़कर आगे बढ़े। इसका ही नतीजा था कि चौतरफा हुए हमलों के बावजूद मोदी अपने गुजरात मॉडल और साख के बूते भारतीय जनमानस का भरोसा जीतने में कामयाब रहे। निश्चित रूप से यह खांचों और सींखचों में समाज को बांटकर राजनीति करने वालों के लिए बड़ा सबक होगा।

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