हालात बदलने को बदला काम, फिर भी नहीं मिला आराम

शायद ही कभी किसी को गुमान रहा होगा कि जीवन में ऐसे दिन भी आएंगे जब एक पल में सब कुछ बेगाना हो जाएगा। अपने ही किनारा कर लेंगे और दशकों तक जिस काम के सहारे परिवार पला वहीं काम बेगाना हो जाएगा।

By JagranEdited By: Publish:Mon, 25 May 2020 11:29 PM (IST) Updated:Mon, 25 May 2020 11:29 PM (IST)
हालात बदलने को बदला काम, फिर भी नहीं मिला आराम
हालात बदलने को बदला काम, फिर भी नहीं मिला आराम

बुलंदशहर, जेएनएन। शायद ही कभी किसी को गुमान रहा होगा कि जीवन में ऐसे दिन भी आएंगे जब एक पल में सब कुछ बेगाना हो जाएगा। अपने ही किनारा कर लेंगे और दशकों तक जिस काम के सहारे परिवार पला वहीं काम बेगाना हो जाएगा। जी हां, ऐसी तमाम दर्द भरी कहानियां इन दिनों बाहर से आए प्रवासी श्रमिकों की जुबां पर हैं जो दशकों पहले अच्छे जीवन की उम्मीद में अपने गांव में छोड़ चुके थे। प्रवासी श्रमिकों का गांव तो वही है, लेकिन हालात जुदा हो चुके हैं और काम भी बदल चुका है।

स्याना कस्बे के मोहल्ला नंदपुरी निवासी नानक चंद्र दस साल पहले दिल्ली गए थे और वहीं के होकर रह गए। परिवार भी साथ गया और रोजी-रोटी का जुगाड़ भी एक कपड़ा कंपनी हो गया। सब कुछ ठीक-ठाक था कि कोरोना रूपी खलनायक ने जीवन में दखल दिया और सब कुछ बिखर गया। फैक्टरी बंद हो गई और मालिक ने भी साथ छोड़ दिया। किसी प्रकार पदयात्रा कर अपने घर पहुंचे तो यहां भी सब कुछ जुदा-जुदा दिखा। बाद में हिम्मत बटौरी और परिवार को पालने के लिए कपड़े सीलने का काम शुरू किया। लेकिन लॉकडाउन के कारण सब कुछ बंद होने के कारण काम ज्यादा नहीं मिल पा रहा है। ऐसे ही ऊचांगांव निवासी सोनम की कहानी है। सोनम का ब्यूटीपार्लर लॉकडाउन से पहले खूब चल रहा था। लेकिन हालात बदले और आज सोनम महिलाओं के कपड़ों की सिलाई कर अपने परिवार का पालन कर रही है।

हलवाई से बने सब्जी विक्रेता

गांव मडैयां कला निवासी कुंवरपाल का हलवाई का बड़ा काम था। जनपद के बाहर से भी आर्डर पर काम होता था। अब लॉकडाउन हुआ तो सब बिखर गया। ऐसे में कुंवरपाल ने काम बदला और मिठाई बनाने वाले हाथ अब सब्जी बिक्री कर रहे हैं। लेकिन सब्जी की मांग भी सीमित होने के कारण स्थिति अधिक बेहतर नहीं है।

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टूट रही अर्थव्यवस्था

बाहर से आए जनपद में मूल निवासी किसी न किसी काम में पारंगत हैं और यहां भी अपने हाथ के हुनर से परिवार की परवरिश करना चाहते हैं। लेकिन स्थिति कंट्रोल में न होने के कारण काम ही नहीं मिल पा रहा है और मांग भी न के बराबर है। उधर, गांवों में आए लोगों ने पहले गेहूं की कटाई कर कुछ अनाज जमा किया, अब गन्ने की फसल को तैयार करने में मजदूरी करने को मजबूर है। लेकिन किसानों की भी खराब अर्थव्यवस्था के कारण यहां भी काम कम ही मिल पा रहा है।

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