सुपर कॉप गिल की मां की आंखें हुईं नम, हमेशा रहेगा न मिल पाने का गम

सुपरकॉप केपीएस गिल को याद कर उनकी सौतेली मां डॉक्टर सतवंत कौर की आंखें नम हो गईं। गिल हर साल गर्मियों में मां से मिलने आते थे।

By Kamlesh BhattEdited By: Publish:Sun, 28 May 2017 12:39 PM (IST) Updated:Sun, 28 May 2017 12:40 PM (IST)
सुपर कॉप गिल की मां की आंखें हुईं नम, हमेशा रहेगा न मिल पाने का गम
सुपर कॉप गिल की मां की आंखें हुईं नम, हमेशा रहेगा न मिल पाने का गम

जेएनएन, चंडीगढ़। सुपरकॉप केपीएस गिल को याद करके चंंडीगढ़ में रह रही उनकी सौतेली मां डॉ. सतवंत कौर गिल की आंखें नम हो गई। हर वर्ष वह हमेशा गर्मियों में उनसे मिलने के लिए आते थे, लेकिन इस बार बेटे को देखने के लिए उनकी निगाहें तरसती रह गईं, क्योंकि उनके मिलने से पहले ही मां के पास उनकी मौत की खबर पहुंच गई।

उन्होंने कहा कि मेरा ईमानदार व बहादुर बेटा हमेशा के लिए दूर चला गया। उन्होंने कहा कि पहले हमेशा वह महीने में एक बार उनसे मिलने जरूरत आते थे। लेकिन पिछले कुछ दिनों से वह समाज सेवा के कार्यों से ज्यादा जुड़ गए थे, जिसके चलते नहीं आ पाए। बेटे ने इस बार भी मिलने आना था, लेकिन उन्होंने सोचा ना था कि उनके आने से पहले ही ऐसा कुछ हो जाएगा।

डॉ. गिल ने कहा कि वह इन दिनों समाज सेवा के कार्यों में भी लगे हुए थे और इसके लिए देश में काम कर रही एक अमेरिकन महिला की सहायता कर रहे थे, इसलिए भी वह पिछले वर्ष अप्रैल के बाद से उनसे मिलने नहीं आ पाए। उन्होंने बताया कि 1957 में पहले प्रयास में ही वह इंडियन पुलिस सर्विस (आईपीएस) के लिए चुने गए थे। इसके बाद दूसरे प्रयास में वह आइएएस के लिए भी चुने गए थे, लेकिन वह पुलिस विभाग में रह कर ही देश के लिए कुछ करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने आइपीएस को ही चुना।

यही कारण है कि उन्होंने ऑपरेशन ब्लैक थंडर को सफलता पूर्वक अंजाम दिया और गोल्डन टेम्पल पर कोई आंच नहीं आने दी। उन्होंने कहा कि गिल की माता की मृत्यु के बाद उनके पिता आरएस गिल ने उनसे शादी की थी। आरएस गिल इंजीनियर थे और भाखड़ा डैम बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा था।

उर्दू में कविता पढ़ना और लिखना पसंद था

डॉ. सतवंत कौर गिल ने बताया कि उन्हें उर्दू में कविता लिखने व पढऩे का शौक था। हमेशा अपने खाली वक्त में किताबें पढ़ते रहते थे व कविता लिखते थे। घर में उन्होंने पूरी लाइब्रेरी बना रखी थी और उसमें नई व पुरानी किताबें पढऩे के लिए जमा करते रहते थे। वह संगीत के भी शौकीन थे और ज्यादातर शास्त्री संगीत सुनते थे।

घर का नॉन-वेज खाना था पसंद

डॉ. गिल ने बताया कि घर का बना हुआ नॉन-वेज खाना ही उनकी पसंद था। इसके अलावा उनका बहुत ही पॉजिटिव स्वभाव था। कम बोलते थे व ज्यादा सुनते थे और किसी से लड़ाई नहीं करते थे। नौकरी के दौरान हमेशा उन्होंने अपने निचले स्तर के कर्मचारियों का साथ दिया और उन्हें प्रोत्साहित किया।

साथी अफसरों में था उनका दबदबा

केपीएस गिल के छोटे भाई बरिंद्र सिंह गिल ने बताया कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि वह बोलते कम थे, लेकिन अपने साथी अफसरों में उनका इतना दबदबा था कि उनकी नजर से ही वह सब समझ जाते थे। उन्हें स्पोर्टस का काफी शौक था। अगर वह घर में बच्चों को खेलते हुए देखते थे, तो उनके साथ खेलना शुरू कर देते थे। चाहे वह कैरम हो या चैस, वह हमेशा ऐसे खेलों में भाग लेते थे।

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