Shravani Mela 2019: शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था रावण...भक्त बैजू के नाम से शिव हुए बैद्यनाथ

Shravani Mela 2019 Baba Baidyanath Dham Deoghar. लंका नरेश रावण से जुड़ी है देवघर की पौराणिक कहानी। भगवान शिव ने उसकी तपस्‍या से खुश होकर ऐसा वरदान दिया कि.....

Alok ShahiPublish:Wed, 17 Jul 2019 10:25 AM (IST) Updated:Wed, 17 Jul 2019 10:25 AM (IST)
Shravani Mela 2019: शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था रावण...भक्त बैजू के नाम से शिव हुए बैद्यनाथ
Shravani Mela 2019: शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था रावण...भक्त बैजू के नाम से शिव हुए बैद्यनाथ

देवघर, [राजीव]। पौराणिक कथाओं के मुताबिक ब्रह्मा के पौत्र एवं पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की तीन पत्नियां थीं। पहली पत्नी के गर्भ से धनपति कुबेर, दूसरी पत्नी से रावण तथा कुंभकरण, जबकि तीसरी पत्नी से हरि भक्त विभीषण का जन्म हुआ। चारों पुत्रों में से रावण अत्यंत बलवान और बुद्धिमान था। एक बार रावण कैलाश पर्वत पर जाकर शिवजी की तपस्या करने लगा। लेकिन बहुत समय बीत जाने के बाद भी शिवजी प्रसन्न नहीं हुए।

अब रावण यहां से हटकर हिमालय पर्वत पर पुन: उग्र तपस्या करने लगा, फिर भी उसे भगवान के दर्शन नहीं हो सके। इस पर रावण ने अपने शरीर को अग्नि में भेंट करने की ठानी। उसने दस मस्तकों को एक-एक कर काटकर अग्नि में डालने लगा। नौ मस्तक अग्नि में समर्पित कर रावण जब दसवें को काटने के लिए तैयार हुआ तो शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हुए। शिवजी ने रावण का हाथ पकड़कर वर मांगने को कहा।

शिव की कृपा से उसके सभी मस्तक अपने-अपने स्थान से जुड़ गए। हाथ जोड़ कर प्रार्थना करते हुए रावण ने वर मांगा 'हे प्रभो! मैं अत्यंत पराक्रमी होना चाहता हूं। आप मेरे नगर में चल कर निवास करें। यह सुन कर शिवजी बोले, 'हे रावण! तुम मेरे लिंग को उठा कर ले जाओ और इसका पूजन करना, ध्यान रहे मार्ग में कहीं भी इसे रखा तो वहीं स्थापित हो जाएगा।

रावण शिवलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा। कुछ दूर चलने के बाद उसे लघुशंका की इच्छा हुई। उसने वहां एक चरवाहा को देखकर कुछ देर के लिए लिंग को हाथ में रखने की गुहार लगाई। चरवाहे ने उत्तर दिया कि यदि वह जल्दी लौटकर नहीं आएगा तो शिवलिंग को वहीं पर रख देगा। इतना सुनकर रावण उसे शिवलिंग देकर लघुशंका करने गया। रावण के अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान वरूण ने उसका मूत्र इतना अधिक बढ़ा दिया वह काफी देर तक निवृत नहीं हो सका।

इधर चरवाहे ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। पृथ्वी पर रखते ही शिवलिंग उसी स्थान पर दृढ़ता पूर्वक जम गया। लघुशंका से लौटने के बाद रावण ने शिवलिंग को उठाने का अथक प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो सका। आखिर में वह निराश होकर घर लौट गया। रावण के चले जाने पर सभी देवताओं ने वहां आकर शिवलिंग की पूजा की। शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें अपने दर्शन दिए और वर मांगने को कहा।

देवताओं ने प्रार्थना करते हुए उनसे कहा 'हे स्वामी! आप हमें अपनी भक्ति प्रदान करें और सदैव यहीं स्थित रहें। वहीं वह चरवाहा जिसने रावण के कहने पर शिवलिंग उठाकर रखा था, नित्य उसकी पूजा करने लगा। उसका नाम बैजू था, वह जब तक शिवलिंग की पूजा नहीं कर लेता भोजन नहीं करता था। अनेक प्रकार के विघ्न आने पर भी उसने कभी भी अपना नियम नहीं तोड़ा।

उसकी दृढ़ भक्ति को देख एक दिन शिवजी ने उसे दर्शन दिया और वर मांगने को कहा। बैजू ने उनसे मांगा कि आपके चरणों में मेरा प्रेम बढ़ता रहे और आप मेरे नाम से प्रसिद्ध हों। शिवजी वरदान स्वीकार कर शिवलिंग में प्रवेश कर गए। उस समय से बाबा बैद्यनाथ को 'बैजनाथ' के नाम से भी जाना जाने लगा।