यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 08, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सालिहा शब्बीर ने कश्मीर में हब्बा खातून को फिर किया जीवंत, इंडिया वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज
Kashmir Author Soliha Shabir कश्मीर के साहित्य और लोक जीवन में हब्बा खातून (1553-1605) अपनी काव्य प्रतिभा के लिए बहुत ...और पढ़ें

श्रीनगर, राज्य ब्यूरो: 'जब मैं छोटी थी तो घरवाले अक्सर ससुराल में प्रताडऩा का शिकार होने वाली कुछ महिला रिश्तेदारों के सब्र की तारीफ करते हुए कहते थे कि यह भी 'हब्बा खातून' है। मैं उस समय हब्बा खातून के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी। स्कूल में एक बार हब्बा खातून का नाटक खेला जाना था, तो मैंने तुरंत उसमें हिस्सा लेने का फैसला किया। मैंने हब्बा खातून की भूमिका निभाई तो मुझे उनके बारे में कुछ पता चला।
कई बार मैं खुद को उनकी स्थिति में महसूस करने का प्रयास करती और मेरे ख्यालों और मेरी लेखनी पर उसका असर होने लगा।' हब्बा खातून के बारे में कविताएं, गीत और तीन कविता संग्रह लिखकर इंडिया वल्र्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाली जम्मू कश्मीर की पहली और सबसे छोटी (22) उम्र की कवियित्री सालिहा शब्बीर ने दैनिक जागरण के साथ बातचीत में अपने अनुभव बांटे। सालिहा ने कहा कि मैंने एक तरह से हब्बा खातून की रचनाओं को नए सिरे से, नए शब्दों के साथ, नए परिवेश में फिर से रचा है।
डल झील के किनारे रहने वाली सालिहा उन गिने-चुने लेखकों, साहित्यकारों और कवियों में एक है, जिन्होंने हब्बा खातून को समझा और उसके बारे में लिखा है। अंग्रेजी में एमए लिट्रेचर की छात्रा सालिहा के तीन कविता संग्रह : इन द लान आफ डार्क, ओबसलीट-द पोयम माॢकट तथा जून द हार्ट ऑफ हब्बा खातून प्रकाशित हो चुके हैं।
नौंवी कक्षा से कविताएं लिख रहीं सालिहा ने कहा कि मैंने हब्बा खातून के बारे में उपलब्ध साहित्य को पढ़ा, यहां के कई लेखकों और कवियों से बातचीत की। अफसोस की बात है कि हब्बा खातून ने जो लिखा है, उसका बहुत कम हिस्सा आज सही तरीके से सहेज कर रखा गया है।
मेरी रचनाएं, कविताएं और गीत हब्बा खातून से प्रभावित : हब्बा खातून की कविताएं प्रेम, विरह, नियती पर आधारित हैं। उन्हेंं कश्मीर की कोयल भी कहते हैं। सालिहा ने कहा कि मेरी कविताएं और गीत हब्बा खातून की रचनाओं से, उनकी लिखने से प्रभावित हैं। मैंने उनकी रचनाओं का कोई अनुवाद नहीं किया है, जैसे अन्य कवियों ने किया है। मेरी अपनी मूल रचनाएं हैं, लेकिन भाव और उनका थीम वही है, जो हब्बा खातून का है। हब्बा खातून ने जिस त्रासदी को जिया है, वह कश्मीर में कई औरतें आज तक जी रही हैं।

इंडिया वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज होने पर खुदा का शुक्रिया अदा करते हुए सालिहा ने कहा कि यह गिनीज बुक आफ विश्व रिकार्ड की तरह ही है। मैंने इसमें आवेदन किया था और उन्होंने मेरी रचनाओं को पूरी तरह मौलिक पाया।
परिवार ने पहले किया विरोध : परिजनों के बारे में पूछे जाने पर सालिहा ने हंसते हुए कहा कि परिवार वाले मुझे डाक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन मेरी रूचि नहीं थी। परिजनों ने पहले विरोध किया, लेकिन बाद में सब मेरेे साथ हो गए।
पिता बोले-इससे ज्यादा और क्या चाहिए : सालिहा के पिता शब्बीर डग्गा ने कहा कि मेरी दो बेटियां हैं, बड़ी का नाम फरहाना है। मेरी यही दुआ है कि यह जो करें, अच्छा करें। मेरा अपना एक होटल है और चाहता था कि वह डाक्टर बने। आज मुझे सभी मुबारक दे रहे हैं, यह तो सालिहा के कारण ही है। इससे मुझे ज्यादा क्या चाहिए।
कौन थीं हब्बा खातून : कश्मीर के साहित्य और लोक जीवन में हब्बा खातून (1553-1605) अपनी काव्य प्रतिभा के लिए बहुत लोकप्रिय हैं। उनका मूल नाम जून था। वह बहुत ही खूबसूरत थीं। उनका जन्म पांपोर के पास चंद्रहारा गांव में हुआ था। उनकी शादी एक किसान अजीज लोन से हुई थी। पति और ससुराल के लोग हब्बा खातून पर जुल्म करते थे। उसका विवाहित जीवन बहुत कष्टदायक था। ससुराल में जुल्म को हब्बा खातून सहती रहीं और अपनी पीड़ा को वह कविताओं और गीतों में व्यक्त करतीं। एक दिन वह अपनी मीठी आवाज में गीत गा रही थीं तो शिकार खेलने आए कश्मीर के बादशाह यूसुफ शाह चक उनपर मोहित हो गए। उन्होंने हब्बा खातून को अपनी रानी बना लिया। यूसुफ शाह के साथ शादी के बाद हब्बा खातून ने जो कविताएं लिखीं, उनमें प्रेम की झलक साफ मिलती है। मुगल बादशाह अकबर ने इसी दौरान कश्मीर पर हमला किया। उन्होंने यूसुफ शाह चक को बंदी बना लिया और पहले दिल्ली, फिर बिहार ले गया। यूसुफ शाह से जुदाई हब्बा खातून के लिए एक बड़ा आघात साबित हुई। उन्होंने यूसुफ शाह की याद में, उससे पुनॢमलन की आस में कई हृदय विदारक गीत लिखे।
