स्वच्छता के मामले में क्यों लगातार नंबर-1 पर है इंदौर का नाम? दिलचस्प है 'डोर-टू-डोर' मॉडल की कहानी
साफ-सफाई के मामले में क्यों लगातार अव्वल नंबर पर बना हुआ है MP का इंदौर शहर, आज विश्व स्वच्छता दिवस पर बता रहे हैं इंदौर से अरविंद दुबे...

इंदौर ने कैसे हर घर की चौखट से बदली भारत में सफाई की परिभाषा? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अरविंद दुबे, इंदौर। एक समय था, जब इंदौर की गलियों में सफाई बड़ी चुनौती हुआ करती थी। पहले स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर 25वें पायदान पर था। इसके बाद शहर ने तय किया कि साफ-सफाई को केवल नगर निगम की जिम्मेदारी मानकर नहीं चला जा सकता। सड़क पर झाड़ू लगाना जरूरी था, लेकिन असली बदलाव घर की चौखट के भीतर होना था। कचरा सड़क तक पहुंचे ही नहीं, घर से ही अलग निकले और तय व्यवस्था के तहत अपने ठिकाने तक पहुंचे।
यहीं से कहानी ने करवट ली। 2017 में स्वच्छ सर्वेक्षण का परिणाम आया तो देश ने पहली बार इंदौर का नाम सबसे ऊपर सुना। 434 शहरों और कस्बों के बीच इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर बना। 25वें पायदान से पहले पायदान तक की यह छलांग केवल रैंक बदलने की कहानी नहीं थी। शहर के काम करने का तरीका बदल चुका था।
पहली जीत के बाद असली परीक्षा
पहली जीत के साथ ही सवाल सामने था, क्या यह सफाई टिकेगी? इंदौर ने इसका जवाब किसी एक अभियान या समारोह में नहीं दिया। जवाब रोज दिया गया। घर-घर कचरा संग्रहण व्यवस्था मजबूत हुई। लोगों को समझाया गया कि कचरा डिब्बे में डाल देना ही पर्याप्त नहीं, उसे घर से ही अलग करना भी उतना ही जरूरी है। 2018 के स्वच्छ सर्वेक्षण के दस्तावेज में शहर के सभी 85 वार्डों में डोर-टू-डोर कलेक्शन और स्रोत पर 90 प्रतिशत से अधिक कचरा पृथक्करण की व्यवस्था दर्ज की गई थी। एकत्र कचरे को प्रसंस्करण केंद्रों तक पहुंचाने पर भी जोर रहा।
कचरा आखिर सिर्फ कचरा क्यों रहे?
पहले सवाल था, कचरा कहां जाएगा? धीरे-धीरे सवाल बदलने लगा, कचरे से क्या बनाया जा सकता है? कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उसके उपचार और प्रसंस्करण की व्यवस्था विकसित की गई। संग्रहण वाहनों में भी अलग-अलग हिस्से बनाए गए और उनके संचालन की निगरानी तकनीक के जरिए होने लगी। गीले कचरे से कंपोस्ट और बायोमिथेनेशन (गीले कचरे से बायोगैस बनाने की प्रक्रिया) के जरिए ऊर्जा तैयार करने जैसी व्यवस्थाओं ने यह सोच मजबूत की कि कचरा केवल फेंकने की चीज नहीं, इस्तेमाल किए जा सकने वाला संसाधन भी है।
छह साल तक सबसे ऊपर
फिर सफाई घर की चौखट से निकलकर बाजारों, सार्वजनिक स्थानों और शहर की सामूहिक जिंदगी का हिस्सा बन गई। नागरिक भागीदारी बढ़ी और स्वच्छता किसी खास दिन का अभियान न रहकर रोज की जिम्मेदारी बनती गई। 2017 में शुरू हुई यह यात्रा लगातार छह साल तक जारी रही। 2022 में इंदौर ने लगातार छठी बार देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब अपने नाम किया। छह साल तक शीर्ष पर बने रहना इस बात का प्रमाण था कि पहली जीत महज संयोग नहीं थी। इंदौर ने एक बार साफ होने के बाद खुद को फिर-फिर साफ रखा। यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
नंबर वन से आगे
2023 में तस्वीर बदली। छह साल तक अकेले शीर्ष पर रहने के बाद इस बार इंदौर और सूरत संयुक्त रूप से देश के सबसे स्वच्छ शहर बने। यहां कहानी खत्म नहीं हुई, बस मंजिल का अर्थ बदल गया।
2024-25 में स्वच्छ सर्वेक्षण के स्वरूप में भी बदलाव आया। लगातार बेहतर प्रदर्शन करने वाले शहरों के लिए ・सुपर स्वच्छ लीग・बनाई गई और इंदौर इसमें शामिल हुआ। अब चुनौती हर साल नंबर वन बनने की नहीं, बल्कि उस स्तर को बनाए रखने की है, जहां पहुंचने में शहर ने वर्षों लगाए हैं।
किसी शहर को एक बार साफ करना मुश्किल है, लेकिन उसे वर्षों तक साफ रखना उससे कहीं कठिन। सड़क पर पड़ा एक कागज, खुले में फेंका गया प्लास्टिक, नाली में पहुंचा कचरा या घर से बिना अलग किया गया कचरा・छोटी दिखने वाली ऐसी चूकें पूरी व्यवस्था पर असर डाल सकती हैं।
अब सफाई की अगली मंजिल
अब इंदौर के सामने सवाल यह है कि कितना कचरा उठाया गया, उससे आगे बढ़कर कितना कचरा पैदा होने से रोका गया, कितना दोबारा इस्तेमाल हुआ और कितना संसाधन में बदला गया। प्लास्टिक और ई-कचरे का बेहतर प्रबंधन, कचरे को कम करना, सफाईकर्मियों की सुरक्षा और सम्मान तथा नई पीढ़ी में स्वच्छता की आदत बनाए रखना। आने वाले वर्षों की असली चुनौतियां यही हैं।
इंदौर की कहानी केवल नंबर वन की ट्राफियों की कहानी नहीं है। यह उस शहर की कहानी है जिसने पहले सफाई का लक्ष्य तय किया, फिर उसके लिए व्यवस्था खड़ी की, व्यवस्था पर भरोसा बनाया और उस भरोसे को लोगों की आदत में बदल दिया।
अब मंजिल किसी अगली ट्राफी से बड़ी है। असली जीत उस दिन होगी, जब सुबह कचरा गाड़ी आए या न आए, हर नागरिक अपने हिस्से की सफाई को अपनी जिम्मेदारी समझे और स्वच्छ इंदौर किसी सर्वेक्षण का परिणाम नहीं, उसकी रोज की जिंदगी का स्वभाव बन जाए।
