प्राचीन शहर उज्जैन शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। उज्जैन मंदिरों की नगरी है। यहां हर 12 वर्ष पर सिंहस्थ कुंभ मेला लगता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिगों में एक महाकालेश्वर मंदिर (महाकाल) इस नगरी में स्थित है। महाकाल के अलावा यहां कई मंदिर है। उज्जैन मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर से 55 किमी की दूरी पर है। उज्जैन का प्राचिन नाम अवंतिका, उज्जयनी, अमरावती, सुवर्णगंगा आदि है। यह शहर भारत के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में जाना जाता है। पवित्र शिप्रा नदी के दाहिने तट पर स्थित इस नगर को भारत की सप्तपुरियों में से एक माना जाता है। उज्जैन विक्रमादित्य के राज्य की राजधानी थी। इसे कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है।

पर्यटन:-
महाकलेश्वर मंदिर
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर भारत के प्रमुख बारह ज्योतिर्लिंगों में एक है। महाकालेश्वर मंदिर का माहात्म्य विभिन्न पुराणों में विस्तृत रूप से वर्णित है। महाकवि तुलसीदास से लेकर संस्कृत साहित्य के अनेक प्रसिद्ध कवियों ने इस मंदिर का वर्णन किया है। महाकालेश्वर की प्रतिमा दक्षिणमुखी है। तांत्रिक परंपरा में प्रसिद्ध दक्षिणमुखी पूजा का महत्व बारह ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकालेश्वर को ही प्राप्त है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिग तीन खंडों महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर और श्री नागचंद्रेश्वर में विभाजित है। महाकालेश्वर मंदिर के मुख्य आकर्षणों में भगवान महाकाल की भस्म आरती, नागचंद्रेश्वर मंदिर, भगवान महाकाल की शाही सवारी आदि है। कहा जाता है कि प्रतिदिन सुबह होने वाली महाकाल की भस्म आरती नहीं देखी तो आपका महाकालेश्वर दर्शन अधूरा है।
श्री बडे़ गणेश मंदिर
श्री महाकालेश्वर मंदिर के निकट हरसिद्धि मार्ग पर बडे़ गणेश की भव्य मूर्ति प्रतिष्ठित है। मंदिर परिसर में सप्तधातु की पंचमुखी हनुमान प्रतिमा के साथ-साथ नवग्रह मंदिर तथा कृष्ण यशोदा आदि की प्रतिमाएं भी विराजित हैं।
मंगलनाथ मंदिर
पुराणों के अनुसार उज्जैन नगरी को मंगल की जननी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए यहां पूजा-पाठ करवाने आते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। हर मंगलवार के दिन इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
हरसिद्धि मंदिर
उज्जैन नगर के प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में हरसिद्धि देवी का मंदिर प्रमुख है। चिन्तामण गणेश मंदिर से थोड़ी दूर और रूद्रसागर तालाब के किनारे स्थित इस मंदिर में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा हरसिद्धि देवी की पूजा की जाती थी। हरसिद्धि देवी वैष्णव संप्रदाय की आराध्य रही। शिवपुराण के अनुसार दक्ष यज्ञ के बाद सती की कोहनी यहां गिरी थी।
शिप्रा घाट
उज्जैन नगर के धार्मिक स्वरूप में शिप्रा नदी के घाटों का प्रमुख स्थान है। घाटों पर विभिन्न देवी-देवताओं के नए-पुराने मंदिर भी है। शिप्रा के इन घाटों का गौरव सिंहस्थ के दौरान देखते ही बनता है, जब लाखों-करोड़ों श्रद्धालु यहां स्नान करते हैं।
गोपाल मंदिर
गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर नगर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित है। मंदिर का निर्माण महाराजा दौलतराव सिंधिया की महारानी बायजा बाई ने 1833 के आसपास कराया था। मंदिर में कृष्ण (गोपाल) प्रतिमा है। मंदिर के चांदी के द्वार यहां का एक अन्य आकर्षण हैं।
गढ़कालिका देवी
गढ़कालिका देवी का मंदिर कालिका देवी को समर्पित है। महाकवि कालिदास गढ़कालिका देवी के उपासक थे। सातवीं शताब्दी के दौरान महाराजा हर्षवर्धन द्वारा इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था। माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना महाभारत काल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सत्य युग की है। मां कालिका के इस मंदिर में दर्शन के लिए हजारों भक्तों की भीड़ एकत्र होती है। देवी कालिका तांत्रिकों की देवी मानी जाती हैं। इस मंदिर की भव्यता को देखते हुए ग्वालियर के महाराजा ने भी इसका पुनर्निर्माण कराया था। इस मंदिर के पास से ही शिप्रा नदी बहती है।
भतर्ृहरि गुफा
ग्यारहवीं सदी के एक मंदिर के अवशेष को भतर्ृहरि की गुफा कहा जाता है जिसका समय-समय पर जीर्णोद्धार होता रहा। शिप्रा तट के ऊपरी भाग में भतर्ृहरि की गुफा है। एक संकरे रास्ते से गुफा के अंदर जाना पड़ता है। यह स्थान गढ़कालिका मंदिर के पास स्थित है। इन गुफाओं के बारे में कहा जाता है कि यहीं पर भतर्ृहरी रहा करते थे और तपस्या करते थे। भतर्ृहरी महान विद्वान और कवि थे। उनके द्वारा रचित श्रृगांरशतक, वैराग्यशतक और नीतिशतक बहुत प्रसिद्ध हैं। इनका संस्कृत साहित्य में बहुत ऊंचा स्थान है।
काल भैरव
काल भैरव मंदिर शिप्रा नदी के तट पर स्थित है जो अत्यंत प्राचीन एवं चमत्कारिक है। यह मंदिर शिव जी के उपासकों के कापालिक सम्प्रदाय से जुड़ा हुआ है। आज भी मंदिर के अंदर काल भैरव की एक विशाल प्रतिमा है। प्राचीन काल में इस मंदिर का निर्माण राजा भद्रसेन ने कराया था। पुराणों में वर्णित अष्ट भैरव में काल भैरव का महत्वपूर्ण स्थान है।
सिंहस्थ (कुंभ मेला)
सिंहस्थ उज्जैन का महान स्नान पर्व है। बारह वर्षो के अंतराल से यह पर्व तब मनाया जाता है जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित रहता है। पवित्र शिप्रा नदी में पुण्य स्नान की विधियां चैत्र मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होती हैं और पूरे मास में वैशाख पूर्णिमा के अंतिम स्नान तक भिन्न-भिन्न तिथियों में संपन्न होती है। उज्जैन के महापर्व के लिए पारंपरिक रूप से दस योग महत्वपूर्ण माने गए हैं। देश भर में चार स्थानों पर कुं भ का आयोजन किया जाता है। प्रयास, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में लगने वाले कुंभ मेलों के उज्जैन में आयोजित आस्था के इस पर्व को सिंहस्थ के नाम से पुकारा जाता है। उज्जैन में मेष राशि में सूर्य और सिंह राशि में गुरू के आने पर यहां महाकुंभ मेले का आयोजन किया जाता है जिसे सिंहस्थ के नाम से देशभर में पुकारा जाता है। सिंहस्थ आयोजन की एक प्राचीन परंपरा है। इसके आयोजन के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित है। अमृत बूंदे छलकने के समय जिन राशियों में सूर्य, चंद्र, गुरू की स्थिति के विशिष्ट योग के अवसर रहते हैं वहां कुंभ पर्व का इन राशियों में गृहों के संयोग पर आयोजन होता है।
कैसे जाएं
उज्जैन सड़क, हवाई और रेल सेवा से जुड़ा है। उज्जैन के सबसे नजदीक हवाई अड्डा इंदौर है। इंदौर, भोपाल, रतलाम, ग्वालियर आदि से बस और ट्रेन की सुविधा उपलब्ध है।


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