जमशेतजी। जी हां, यही नाम है इस शहर के संस्थापक का। अक्सर लोग उन्हें जमशेतजी कह देते हैं। पर उनका पूरा नाम था जमसेतजी नसरवानजी टाटा। यहां आने के बाद आप देखेंगे कि उन्होंने बड़े ही प्यार से इस शहर को बसाया। यहां की साफ-सुथरी गलियां और सड़कें बताती हैं कि यह सचमुच किसी बड़ी प्रबंधकीय क्षमता वाले शख्सियत की देन होगी। यूं तो यह पूरा क्षेत्र कुदरत की नायाब कारीगरी से भरा पड़ा है लेकिन आप देखेंगे कुदरती खूबूसरती को सहेजे हुए इसे आधुनिक कलेवर दिया गया है। यही वजह है कि हरे-भरे व खूबसूरत झरने-पहाड़, पर्यटन स्थलों की भरमार के चलते हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक यहां सुकून के पल गुजारने और आनंद लेने आते हैं। जमशेदपुर में आप बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात से लेकर दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल तक केलोगों और उनकी संस्कृति को देख सकते हैं। यह एक बड़ा कारण है जिसके कारण यहां एक लघु भारत नजर आता है। इस रमणीक स्थल में देशभर की विभिन्न संस्कृतियों का संगम तो देखने को मिलता ही है, जमशेदपुर शहर के अलावा आसपास के कई स्थल भी अपनीखूबसूरती के कारण पर्यटकों को लुभाते रहे हैं।

सोहराय कला की मुरीद दुनिया

जमशेदपुर आधुनिक व्यवस्थित शहर है लेकिन अपनी प्राचीन परंपरा पर इसे गर्व है। यहां ग्रामीण क्षेत्र में आदिवासी कला-संस्कृति के सुंदर दर्शन आप कर सकते हैं। मिट्टी से बने तरह-तरह के रंगों से रंगे और दीवारों पर बने चित्र तो आपको बरबस अपनी ओर खींचने लगेंगे। यहां आदिवासियों की सोहराय कला खूब प्रसिद्धि पा रहीहै। वहीं बांस से बनी कलाकृतियां यहां की खासियत हैं। इसे चाहें तो आप अपने साथ उपहारस्वरूप या यादगार के तौर पर ले जा सकते हैं।

छऊ नृत्य से भी है पहचान

जमशेदपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित सरायकेला छऊ नृत्य के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। यहां छऊ के मुखौटों के निर्माण कला को बढ़ावा दिया जा रहा है। पर्यटक यहां से बने मुखौटे सजाने के लिए ले जाते हैं। दरअसल, देश-विदेश में प्रसिद्धि पा चुकी भारत की प्राचीन नृत्यकला 'छऊ' की सरायकेला शैली की शुरुआत इसी क्षेत्र से हुई है। सरायकेला शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है। यहीं स्थित है सरायकेला छऊ कला केंद्र, जो कि इस प्राचीन नृत्य विधा को संवारने, आगे बढ़ाने का काम कर रहा है। यहां से अब तक छह कलाकारों को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म पुरस्कार मिल चुका है। यहां छऊ नृत्य सीखने दूसरे देशों से भी लोग आते हैं और जाहिर है यहां के कलाकार भी अपनी नायाब कला का प्रदर्शन करने दूसरे देशों में जाते रहते हैं। शुभेंदु नारायण सिंहदेव, केदारनाथ साहू, श्यामाचरण पति, मंगलाचरण पति, मकरध्वज दारोघा और पंडित गोपाल प्रसाद दुबे नामक कलाकारों को पद्मश्री से नवाजा गया है। छऊ के बेहतरीन कलाकार शुभेंदु नारायण सिंहदेव सरायकेला राजघराने से थे। सरायकेला राजघराने की बहू रानी अरुणिमा सिंहदेव छऊ की ड्रेस डिजाइनर हैं। छऊ महोत्सव का आयोजनयहां स्थित राजभवन में छऊ से जुड़ी ऐतिहासिक तस्वीरें मौजूद हैं। आज भी राजभवन में हर वर्ष छऊ महोत्सव का आयोजन भी होता है। सरकार ने महोत्सव को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिया है। प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने भी कुलचरण महापात्रा से छऊ नृत्य सीखा था। ओडिशा के मुख्यमंत्री भी सरायकेला राजपरिवार की ओर से आयोजित छऊ महोत्सव में हमेशा भाग लेने आते थे। इन नृत्यकला का आनंद लेना हो तो जनवरी में सरायकेला आएं जब सरकार के सहयोग से छऊ नृत्य महोत्सव का आयोजन एक सप्ताह तक चलता है। देश-विदेश से लोग इस समारोह को देखने आते हैं। सरकार की ओर से पर्यटकों को झारखंड के प्रमुख शहरों से लाने-ले जाने और ठहराने का समुचित प्रबंध भी किया जाता है।

शहर की शान जुबिली पार्क 

दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के मशहूर मुगल गार्डन और विश्र्व प्रसिद्ध मैसूर गार्डन की तर्ज पर 500 एकड़ में बने जुबिली पार्क की खूबसूरती देखने दुनियाभर के लोग आते हैं। दिसंबर-जनवरी में बिहार, बंगाल, ओडिशा सहित अन्य जगहों के पर्यटकों की भीड़ उमड़ती है। देश में ऐसे शहर कम ही होंगे, जहां शहर के बीचोंबीच इतना विशाल पार्क बनवाया गया हो। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण सीढ़ीदार पार्क में सबसे ऊंची जगह पर टाटा स्टील के संस्थापक जमसेतजी टाटा की मूर्ति लगी है। इसके बीचोंबीच बने मुगल गार्डन व रोज गार्डन अलग ही छटा बिखेरते नजर आते हैं। एक ओर दो चिल्ड्रेंस कॉर्नर हैं जिसमें बच्चों के खेलने-कूदने के तमाम उपकरण मौजूद हैं, तो दूसरी ओर 40 एकड़ में जयंती सरोवर में बोटिंग करते सैलानी नजर आएंगे। किनारों पर एंगलिंग क्लब के सदस्य पूरे दिन मछली पकडऩे का शौक पूरा करते नजर आते हैं। जुबिली पार्क से ही सटा टाटा स्टील जूलोजिकल गार्डेन है। सरोवर के किनारे-किनारे दूर तक तरह-तरह के जानवरों के दीदार करते चले जाएं। अंदर एक छोर पर छोटा सफारी भी है। इसमें बारहसिंगा, हिरण, कोटरा सहित अन्य जानवर खुले में विचरण करते हैं। सैलानियों को वाहन में बैठाकरइस छोटे से सफारी का भ्रमण करना होता है। जुबिली पार्क का उद्घाटन हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1956 में किया था। उन्होंने यहां एक पौधा भी लगाया था, जो आज विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है।

जमशेतजी के नाम पर कालीमाटी गांव बना जमशेदपुर

हावड़ा-मुंबई रेलमार्ग पर छोटे से स्टेशन कालीमाटी के समीप साकची नाम का छोटा सा गांव हुआ करता था। पारसी व्यवसायी जमसेतजी नसरवानजी टाटा के प्रयासों से यहां 1907 में देश की पहली स्टील फैक्ट्री स्थापित की गई। दरअसल, जंगल-पहाड़, आदिवासी बहुल इलाके में लौह अयस्क का अकूत भंडार होने की जानकारी मिलने पर इस जगह को स्टील उत्पादन के लिए मुफीद पाया गया। बाद में बड़े शहर का रूप ले चुके कालीमाटी गांव का नाम जमशेतजी टाटा के नाम पर जमशेदपुर और रेलवे स्टेशन का नाम कालीमाटी से बदलकर टाटानगर रखा गया।

जानें अपने ट्रैवल डेस्टिनेशन का मौसम

 

Posted By: Priyanka Singh