भारत के सुंदर, स्वच्छ और शांत शहर चंडीगढ़ से केवल 21 किमी. दूर अंबाला-शिमला राजमार्ग पर कालका और चंडीगढ़ के मध्य स्थित पिंजौर गार्डन के आकर्षण को शब्दों में बयां कर पाना थोड़ा मुश्किल है। इस खूबसूरत गार्डन को उत्तरी भारत का नंदन-कानन कहें, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाने वाला पिंजौर घग्घर नदी की सहायक कौशल्या और झज्जर नदी के संगम स्थल पर स्थित है।

राजा विराट की नगरी

पिंजौर राजा विराट की नगरी थी और पहले इसका नाम पंचपुर था, जो बाद में पिंजौर के नाम से मशहूर हुआ। राजा विराट प्रजापालक, धर्मात्मा और दयालु प्रकृति के शासक थे। यहां 365 बावडि़यां बनी हुई थी, जो बाद में लुप्त हो गई। प्राचीन हिंदू मंदिरों, जलकुंडों के चिह्नों और धरती के नीचे से निकली देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से प्रतीत होता है कि यह एक पवित्र एवं दर्शनीय धर्मस्थल रहा होगा। ऐतिहासिक दृष्टि से पिंजौर का संबंध आर्यों के समय से है, जब इस गांव में भीमा देवी मंदिर का निर्माण हुआ था। यह पांडवों के वनवास का समय था। इतिहासकार बताते हैं कि तभी यह जगह पंचपुरा कहलाई थी। पिंजौर का द्रोपदी कुंड भी बहुत ही मशहू है। कहा जाता है कि द्रोपदी इसी कुंड में स्नान किया करती थी। 13वीं शताब्दी के मध्य पिंजौर सिरमौर के राजा के अधीन था। शमसुद्दीन इल्तुमिश इस स्थान के सौंदर्य से इतने प्रभावित हुए कि उसने सिरमौर के राजा से यह क्षेत्र छीन लिया। बाद में यह राजा रत्‍‌नसेन के पास चला गया। लेकिन जब जनवरी 1399 ई. में तैमूर दिल्ली से वापस जा रहा था, तो उसने राजा रत्‍‌नसेन से यह क्षेत्र छीन कर वहां खूब लूटमार की। इस तरह पिंजौर और आस-पास का क्षेत्र बहुत सालों तक जीत-हार तथा लूट-खसोट का क्षेत्र बना रहा।

औरंगजेब के भाई फिदाई खान ने 1661 ई. में पिंजौर पर अधिकार कर लिया। फिदाई खान शिल्पकारी और भवन निर्माण कला में सिद्धहस्त था। उसने लाहौर के शालीमार बाग के नमूने पर पिंजौर मुगल गार्डन बनवाया और कई भवन भी निर्मित करवाए, जो 400 साल गुज़र जाने पर भी अपनी सुंदरता को बरकरार रखे हुए हैं। कहा जाता है कि फिदाई खान प्रकृति और सौंदर्य के पुजारी थे। उन्हें पिंजौर के झरने इतने भा गए थे कि उसने इस पहाड़ी क्षेत्र में ही अपना आमोद स्थल बनाने का इरादा कर लिया, निर्माण कार्य पूरा होने के बाद नवाब और उसकी बेगम यहां रहने आ गए। लेकिन सिरमौर के राजा को नवाब का बसना रास नहीं आया। उसने नवाब को भगाने की एक तिकड़म सोची। राजा ने घेंघा रोग से पीडि़त कुछ स्त्रियों को फल बेचने के बहाने बेगम के पास भेजा। बेगम ने उनसे उनके सूजे हुए गलों के बारे में पूछा तो उन स्त्रियों ने झूठ-मूठ में कह दिया कि इस इलाके का पानी दूषित है। उसी से उन्हें यह बीमारी लगी हैं। बेगम यह सुनकर इतनी घबरा गई कि तुंरत महल छोड़ने की तैयारी कर डाली।

राजा ने उद्यान और महलों पर कब्जा कर लिया, लेकिन कुछ ही समय बाद ये उद्यान पटियाला के महाराजा के अधिकार में आ गए। बाद में इनका नवीनीकरण किया गया। पिंजौर गार्डन पहले संयुक्त पंजाब का अंग था, परंतु पंजाब के बंटवारे के बाद यह हरियाणा राज्य में सम्मिलित हो गया। उद्यान का रख-रखाव हरियाणा के पर्यटन विकास निगम के जिम्मे है। इसका नाम भी पटियाला के महाराणा के नाम पर 'यादविन्द्रा उद्यान पिंजौर' रखा गया है। यह उद्यान लगभग 65 एकड़ भू-क्षेत्र में फैला हुआ है। यह एक पुरानी पहाड़ी की ढलान पर सात पट्टियों में निर्मित है। जब कोई भी पर्यटक इसके विशाल मुख्यद्वार से प्रवेश करता है, तो इसकी प्राकृतिक खूबसूरती को निहार कर पहली नजर में ही आनंद विभोर हो उठता है।

चार मंजिलों में बंटा है उद्यान

यह सीढ़ीनुमा उद्यान चार मंजिलों में बंटा हुआ हैं। थोड़ी-थोड़ी दूर पर बने फव्वारों वाली सात-आठ फीट चौड़ी नहर इन चारों मंजिलों में से गुजरती है। यहां के फव्वारे और पटियाला नरेश द्वारा बनवाए गए एकांत विलास-गृह सौलानियो का मन मोह लेते हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के वृक्ष, देश विदेश की विविध प्रजातियों के पुष्प, जल-प्रपात, मखमली घास, लता कुजं और पक्षियों का कलरव सौलानियों को मंत्रमुग्ध कर देता है। पहले यह बाग गुलाब के फूलों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था। पिंजौर उद्यान में रंग महल, शीश महल और जलमहल 'चार बाग' शैली में निर्मित हैं। इस गार्डन में निर्मित रंग महल और शीश महल पर्यटकों के विश्राम के लिए खोल दिए गए हैं। जलमहल को एक खुले रेस्तरां का रूप दे दिया गया हैं। उद्यान में एक लघु चिडि़याघर है, जिसमें अनेक तरह के जीव जंतु देखने को मिलते हैं। रात को रंग बिरंगी रोशनी में इसका आकर्षण और भी बढ़ जाता हैं। इस गार्डन में फिल्मों की शूटिंग भी होती रही हैं। उद्यान के अलावा पिंजौर व उसके आसपास अनेक मंदिर, गुरूद्वारा एवं मस्जिद भी दर्शनीय हैं।

कैसे पहुंचें

पिंजौर पहुंचने के लिए चंडीगढ़ व कालका से यातायात की अच्छी सुविधा है। चंडीगढ़-शिमला राजमार्ग पर बसे इस शहर तक बसों और टैक्सियों से पहुंचा जा सकता है। पंचकूला का अपना हवाईअड्डा नहीं है। चंडीगढ़ से फ्लाइट उपलब्ध होती है। चंडीगढ़-पंचकूला सीमा पर स्थित चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन का एक निकासद्वार पंचकूला की ओर भी है। कई रेलगाडि़या दिल्ली और चंडीगढ़ के लिए उपलब्ध है। रोडवेज अच्छी तरह से विकसित है और सड़क परिवहन के अच्छे नेटवर्क की सहायता से इसे चंडीगढ़ और हरियाणा के अन्य शहरों से जोड़ता है। श्यामसुंदर जोशी

 

Posted By: Priyanka Singh

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